‘क्षण’ से ‘अनंत’ को पाने भारत का जीवन-मंत्र – चरैवेति-चरैवेति

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यात्राएँ जोड़ती हैं, मोहती हैं, माँजती हैं. यात्राएँ दरिया हैं, पता नहीं कब सागर से मिला दें और अखण्ड के, कुल के एहसास से सराबोर कर जाए.

यात्राएँ मन-मस्तिष्क पर छाए वे स्मृति-बादल हैं जो बरस कर आपका पोर-पोर भिगो जाते हैं. और यात्रा वह भी भारत के गाँवों-कस्बों, गली-मोहल्लों की… अद्भुत-अनिर्वचनीय.

सोचता था कि आदिगुरु शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद और अन्य तमाम मनीषियों ने अपने छोटे-से जीवन में भारत-भ्रमण कर कितना कुछ पाया और दिया.

हर बार यात्रा के पश्चात अनुभव-जगत को पहले से ज्यादा समृद्ध पाता हूँ और फिर यक़ीन पुख़्ता हो जाता है कि यदि खुशबू की तरह फैलना चाहते हैं, आकाश-सा विस्तार चाहते हैं, सागर-सी गहराई चाहते हैं तो निकल पड़िए.

निकल पड़िए तमाम लोभ-मोह-अहम का आवरण उतारकर, ‘क्लास’ के नकली सलमे-सितारे जो आपने अपने सीने से चिपका रखे हैं, उसे उतार फेंकिए, घुलिए-मिलिए-जुड़िए.

भूल जाइए कि लोग क्या कहेंगे, यदि आप स्नेह देंगे तो स्नेह पाएँगे, चंदन-सी शीतलता बांटेंगे तो आपके जीवन का भी शाप-ताप कटेगा.

बाँटने वाला ही सुखी रह सकता है, सिमटा-सिकुड़ा-आत्ममुग्ध एक दिन सूख कर ठूँठ हो जाएगा, हरा-भरा रहना है तो बाँटना सीखिए, सिमटना नहीं, फैलना सीखिए, जटिलता नहीं, सरलता अपनाइए, जो तथाकथित सभ्य समाज में बहुत कम देखने को मिलती है… हाँ, वह मिलेगी आपको भारत की यात्राओं में, गाँवों-कस्बों-कूलों-कछारों में.

और याद रहे, यात्रा अपने पाँव चलना है, बाकी सब कदमताल है, देखना अपनी आँखों देखना है बाकी झलकन-उलझन-परसेप्शन है और बोलना हृदय का बोलना है बाकी वाग्जाल है.

भारत की किसी नदी, किसी पहाड़, किसी गाँव, किसी जंगल से गुजरते हुए आपके मन-मस्तिष्क में किसी पौराणिक संदर्भ या प्रेरणा-पुरुषों की स्मृतियाँ कौंध जाएँगीं, किसी पर्वत-श्रृंखला को देख-निहार पहाड़ों का सीना चीर धरती पर गंगा उतार लाने वाले पौरुष-प्रतीक भागीरथ याद आएँगे तो कहीं किसी अरण्य से गुजरते हुए पांडवों के पांडव बनने या श्रीराम के श्रीराम बनने की व्यथा-कथा याद आएगी..

फिर उनकी कहानी-कहानी कहाँ रहती, आपके जीवन का हिस्सा हो जाती है, उनकी व्यथा केवल उनकी कहाँ रहती, आपकी हो जाती है, सरयू में डुबकी लगाकर प्राणप्यारी सीता के चिर वियोग में जल-समाधि लेते राम याद आते हैं तो यमुना का स्पर्श करते ही राधा-कृष्ण के आत्मिक प्रेम की सुध हो आती है.

यों कहिए संपूर्ण प्रकृति से ही एक गहरा रिश्ता, गहरा रागात्मक संबन्ध जुड़ जाता है और फिर ‘मैं’ की यात्रा ‘हम’ में रूपांतरित हो जाती है, फिर आप ‘खंड’ नहीं रहते ‘कुल’ का हिस्सा बन जाते हैं बल्कि ‘कुल’ हो जाते हैं, फिर आप ‘क्षण’ नहीं ‘अनंत’ को जीते और प्राप्त होते हैं.

स्पेस और स्मृतियों का गहरा रिश्ता होता है और इसीलिए भारत के किसी स्थान से गुजरते हुए, किसी पत्थर-पहाड़ को छूते हुए, किसी नदी में डुबकी लगाते हुए आप अनायास पवित्रता के एहसास से भर उठते हैं, फिर डगर-नगर तीर्थस्थल हो जाता है, कंकड़-कंकड़ शंकर हो उठता है, बूँद-बूँद गंगा-जल हो उठता है, सामान्य क्रिया-कलाप भी पुण्य संचित करने और बाँटने का जरिया बन जाता है!

किसी राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही गगनचुंबी और अभ्रभेदी क्यों न हो… वह अपने-आप में पूर्ण और समाप्त नहीं है, असली सौंदर्य तो उसके पार जाने में है, इसलिए रुकिए नहीं, भारत के इस जीवन-मंत्र को सही मायने में चरितार्थ कीजिए… चरैवेति-चरैवेति….!

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