हिन्दी के खिलाफ अँग्रेजी नव-साम्राज्यवाद के षडयंत्र को असफल करने समर्थन दें इस याचिका को

save hindi
हिंदी बचाओ

हिन्दी, दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसे उसको बोलने वालों ने ही सब से अधिक छला है. हमने और हमारे देश के कर्णधारों ने, अंग्रेजों के खिलाफ इतनी बड़ी और लंबी लड़ाई, हिन्दी मे ही लड़ी. लेकिन लड़ाई जीतने के बाद, हिन्दी को इस्तेमाल कर के फेंक दिये गए, एक हथियार की तरह दूर रख दिया गया और सत्ता और राजकाज मे अंगेजी को ही चलाया और बढ़ावा दिया. बावजूद इसके चूंकि ये भाषा, भारत के खून में थी, वो ज़िंदा रही. और आज वह, दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है. और, इसी कारण वह अँग्रेजी की आँख में सबसे बड़ी शत्रु है. क्योंकि अपने सबसे ‘अधिक बोली जाने वाली भाषा’ के आंकड़ों के बलबूते पर हिन्दी, कहीं ‘वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम’ की पावरफुल लैड्ग्वेज के शिखर पर ना चढ़ जाये.

अँग्रेजी के नव-साम्राज्यवाद ने, इसके लिए एक युक्ति निकाली कि हिन्दी का संख्या-बल का आंकड़ा कम कर दिया जाए. इसके लिए इसकी ‘बोलियों को इसके खिलाफ’ खड़ा कर के, इसका विखंडन कर दिया जाये. इसलिए आंदोलन खड़े किए जा रहे हैं कि हम हिंदीभाषी नहीं हैं. हम तो भोजपुरी, राजस्थानी, छतीसगढ़ी, मालवी, निमाडी, हरियाणवी, मैथैली, बुंदेलखंडी, बघेलखंडी भाषा बोलते हैं. हमारी मातृभाषा हिन्दी नहीं, ये बोलियाँ ही हैं. कहा जा रहा है कि जनगणना में भी बोली को ही अपनी मातृभाषा बता कर लिखाईये. इसीलिए इन बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने कि मांग उठ रही है.

इससे होगा ये कि एक दिन भारत सरकार से, हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या का आधिकारिक आंकड़ा पूछा जाएगा तो पता चलेगा कि एक अरब बीस करोड़ के देश में, हिन्दी बोलने वाले लोग तो बस कुछ करोड़ लोग ही हैं. हिन्दी बोलने वाले लोग इतने नगण्य हैं कि इनके आधार पर, कैसे हिन्दी को ‘वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम’ की, विश्व की शक्तिशाली भाषा की सूची मे शामिल कर लें…?
बोलियों को, मुख्य भाषा से लड़ा कर, वहाँ की मुख्य भाषा को खत्म करने की तरकीब को, अँग्रेजी के उपनिवेशवादी ताकतों ने अफ्रीकी उप-महाद्वीप मे आजमाया और वहाँ की भाषाओं को खत्म कर दिया. अब ये तरकीब यहाँ भी इस्तेतमाल कर रहे है. और हमारे यहाँ के संकीर्ण समझ के राजनीतिक लोग इस झांसे मे आ कर, ये मांग करने में जुट गए हैं.

इस भ्रम को दूर कर के, हिन्दी को वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की ‘पावर लैंग्वेज’ की सूची से बाहर करने के, इस षड्यंत्र को रोकने के लिए ही एक ऑनलाइन याचिका लगाई है, पुनर्वसु जोशी ने, अमेरिका के ऐरिजोना स्टेट युनिवर्सिटी से नैनो-टेक्नालजी में पी.एचडी॰ की है और पंद्रह बरस रह कर वहाँ उच्च -अध्ययन किया है. उन्होने, अपनी इस ऑनलाइन याचिका में, भारत के प्रधान मंत्री और भारत सरकार के केंद्रीय गृहमंत्री को निवेदन किया है कि, संसद के शीतकालीन सत्र में, आठवीं अनुसूची की यथास्थिति को बनी रहने दें. अब और किसी भी अन्य बोली को उसमे शामिल ना किया जाए.

प्रभु जोशी

इस याचिका को समर्थन की मांग करते हुए, हिन्दी के तमाम अखबारों में भी, अधिकतम लोगों से अधिकतम समर्थन का आग्रह भी किया है. ‘हिन्दी बचाओ मंच’ जैसी देश की, हिन्दी के हित से जुड़ी सभी संस्थाएं भी आगे आए तो निश्चय ही, ये षडयंत्र असफल हो जाएगा. लोग इसको whatsapps पर तथा फ़ेस बुक पर भी चलाएँ. ये लिंक है, ऑनलाइन याचिका का – https://goo.gl/NUMDjD इस से क्लिक कर के जब याचिका का पृष्ठ खुले तो दाहिनी तरफ हाशिये पर अपना नाम, ई मेल, देश, और पिन कोड के बाद नीचे दिखाई देने वाले लाल बटन को क्लिक करें.

याचिका को, आपका समर्थन मिल जाएगा. यदि इसमें आप चाहते हैं कि आपका नाम दिखायी ना दें तो इसकी भी सुविधा इस में है. लाल बटन के पहले छोटे अक्षरों में निजता संबन्धित नोट पर से ‘सही’ का निशान हटा दें. आपका नाम सार्वजनिक नहीं होगा. अगर कोई उनसे इस विषय के बारें में, कुछ संवाद करने का इच्छुक हो तो डॉ॰पुनर्वसु जोशी का नंबर पर संपर्क भी कर सकता है. नंबर है – 9575712989, जिससे तथ्यात्मक सूचना और जानकारी मिल सकेगी.

– चित्रकार प्रभु जोशी (Producer at Doordarshan National (DD1)

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY