गंगा का अस्तित्व बचाना : एक चुनौती

पूजनीय ग्रन्थ स्कन्दपुराण के एक प्रसंगानुसार सूर्यवंश के महातेजस्वी, परम धार्मिक राजा भगीरथ अपने पूर्वजों का उद्धार करने की इच्छा से, हिमालय पर्वत पर तपस्या करने गए. उनके कठिन तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मद्रवा गंगाजी पृथ्वी पर आयीं.

भगीरथ के प्रयास से स्वर्ग से पृथ्वी पर पृथ्वीवासियों का उद्धार करने हेतु उतरी गंगा समाज के हर वर्ग की आस्था एवं उपासना का केंद्र रही है. गोमुख से चलकर गंगा अनेक दुर्गम रास्तों को पार करती हुई हरिद्वार आती हैं.

गोमुख से हरिद्वार का मार्ग दुर्गम होने के साथ-साथ बहुत सुरम्य भी है, यहाँ अनेकानेक दुर्लभ औषधियां, वनस्पतियाँ एवं बूटियाँ जड़ रूप में विद्यमान है. इनके संपर्क में आने से गंगाजल औषधीय गुणों से भी भरपूर हो जाता है. अनेक वैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हुआ कि गंगाजल में जीवाणुभोजी (बैक्टीरियोफैज) तत्व मौजूद रहते हैं. जिनके चलते गंगाजल कभी सड़ता नहीं है और अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन, यदि गंगाजल के साथ किया जाय, तो लाभ कई गुणा मिलता है.

परन्तु आज स्थिति कुछ और हो गयी है, मनुष्य जो कि गंगाजी को “मैया” संबोधन से पुकारता है, माँ के आनंददाई आँचल को, माँ के जीवनदायी को वह छिन्न-भिन्न करने पर लगा हुआ है.

गंगा में प्रदूषण रोकने के प्रयास

गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए यदि निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाय तो संभव है कि कुछ सार्थक परिणाम मिलें-

1. गंगा के किनारे बसे शहरों, कस्बों तथा ग्रामों में उच्च क्षमतावाले एसटीपी(सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) लगवाये जाएं ताकि गंगा में पड़नेवाले प्रदूषक पानी इन यंत्रों द्वारा शोधित किया जा सके.

2. कस्बों एवं शहरों का गंदा पानी सीधे नदी जल में डालने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए, आवश्यकतानुसार क़ानून का भी सहारा लेना चाहिए.

3. जीव तथा वनस्पतिशास्त्रियों का योगदान लेना चाहिए कि वे ऐसे जीव तथा वनस्पति विकसित करें, जिनसे जल-प्रदूषण को कम किया जा सके.

4. जन साधारण को जागरूक किया जाए कि वे नदी में अपशिष्ट यथा-पॉलिथीन, अधजले शव, खराब हो चुकी सामग्री, गली-सड़ी वनस्पति तथा रसायन न डालें. प्राय: देखने में आता है कि गंगा के आसपास के क्षेत्रों में शवदाह की क्रिया गंगातट पर की जाती है. शवदाह क्रिया में प्राय: दो से तीन घंटे लग जाते हैं, वहां से लोगों को घर वापसी की चिंता रहती है. अत: शीघ्रतावश आधे-अधूरे शव नदी में ही प्रवाहित कर देते हैं. इस पर प्रतिबन्ध लगाना ज़रूरी है.

5. नगर पंचायतों, ग्राम पंचायतों, विद्यालयों तथा सामूहिक संगठनों के माध्यम से लोगों को महत्त्व, स्थिति एवं सुधार के विषय में सर्वांग रूप से समझाया जाए तथा उन्हें संकल्प कराया जाए कि व्यक्तिगत रूप से गंगा को प्रदूषित नहीं करेंगे.

6. वैज्ञानिक शोधों से ये सिद्ध हो चुका है कि बालू अनेक प्रदूषकों को सोख लेती है. तथा जल को स्वच्छ कर देती हैं. इसलिए बालू के खनन पर प्रतिबन्ध लगाया जाए.

7. सरकार अपने साथ जन साधारण को जोड़ कर अपने विशेष प्रयास करें.

8. नदी के जल का वेग बढाया जाए ताकि प्रदूषक तत्वों का तन्वीकरण प्राकृतिक रूप से हो सके.

– श्री नरेन्द्र कुमार जी शर्मा (गीताप्रेस गोरखपुर के कल्याण के गंगा अंक से )

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