गीतों के मामले में पिछली पीढ़ी से गरीब है नई पीढ़ी

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यदि फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स को पैमाना बना दिया जाए तो फ़िल्मी संगीत के बारे में देश की पसंद सहज ही समझ में आ जाती है.

बीते पांच दशक में गुलज़ार, आनंद बख्शी, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, शकील बदायूनी, शैलेंद्र जैसे गीतकारों का बोलबाला रहा है.

आज के दौर में इरशाद कामिल और प्रसून जोशी बेहतर कर रहे हैं. इरशाद कामिल भारत के संगीत प्रेमियों की नब्ज पर बेहतर पकड़ रखते हैं. रांझणा और प्रेम रतन धन पायो के गीतों से वे ये बात साबित कर चुके हैं.

कहते हैं आनंद बख्शी ‘काफ़िये’ के बादशाह थे, उनके जैसा अहसासों का गीतकार दूजा नहीं हुआ.

आज के दौर में गीतों की मिठास साल में एकाध बार ही फैलती महसूस होती है. आज का गाना गुनगुनाया नहीं जा रहा बल्कि देखा जा रहा है.

गाना तो वो होता है जो कई दिन लगातार आपके साथ घूमता-फिरता रहे. आपकी कार से लेकर, बाथरूम और ड्राइंग रूम में बजता रहे. आप उसे गुनगुना सके क्योंकि उसे आसान शब्दों से रचा गया है.

1950 से 2017 तक फ़िल्मी संगीत का ये शाश्वत नियम रहा है कि आसान भाषा लोगों की जुबान पर चढ़ती है.

पिछले साल रहमान हिमेश रेशमिया से इसी बात पर मार खा गए थे. रहमान की तमाशा के गाने कनेक्ट नहीं कर पाए और हिमेश की प्रेम रतन धन पायो के गाने गली-गली सुने गए.

आज की पीढ़ी को आनंद बख्शी जैसे गीतकार चाहिए. मुझे लगता है नई पीढ़ी गीतों के मामले में हमारी पीढ़ी से गरीब रही है.

जाते जाते आपको आनंद बख्शी के लिखे एक गीत के टुकड़े के साथ छोड़े जा रहा हूँ. फ़िल्म पराया धन का गीत जिसे किशोर कुमार ने गाया था और संगीत राहुल दा का था.

सोचिए आज के दौर में ऐसा कौन लिख सकता है –

आँख तेरी जो उठी बादशाहों के सर झुक गए
चाल ऐसी तू चली लोग राहों में ही रुक गये
जान हाय मेरी जान, ये जहान, आसमान हिल गया

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