सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर ले जायेगा ये भ्रम

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स्वामी विवेकानंद जी के यात्रा विवरणों पर रामकृष्ण मिशन, वेलूर मठ, कोलकाता से प्रकाशित एक किताब पढ़ रहा था. किताब में स्वामी जी के कश्मीर भ्रमण प्रसंग पर लिखा है-

एक बार स्वामी विवेकानंद कश्मीर की अपनी यात्रा के दौरान माँ खीर भवानी के दर्शनार्थ यहाँ पहुँचे और माँ की विधिवत पूजा अर्चना की तभी पूजा अर्चना करते समय मंदिर की क्षतिग्रस्त अवस्था देख कर उन्होंने कहा कि कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने यहाँ कितनी क्षति पहुचाई है अगर मै उस काल में जीवित होता तो अन्य हिन्दुओं की तरह चुप नहीं रहता और माँ की रक्षा करता.

तभी सहसा उन्होंने देवी माँ की आवाज सुनी और माँ ने कहा, पुत्र यह मेरी ही इच्छा थी कि मुस्लिम आक्रमणकारी मेरे मंदिर को नुकसान पहुचाये और यह मेरी ही इच्छा है कि मै इस खंडित मंदिर में ही निवास करूँ अन्यथा क्या मैं स्वयं ही उनका विनाश तत्काल न कर देती और स्वयं के लिए स्वर्ण भवन का निर्माण करवा लेती. तुम ही मुझे बताओ मै तुम्हारी रक्षक हूँ या तुम मेरे?

यह सुन स्वामी जी ने माँ को प्रणाम किया और इसे माँ की इच्छा समझ कर उनकी विधिवत पूजा अर्चना कर वहां से बाहर निकल गये.

इस प्रसंग को सुनाने के बाद इस किताब आगे लिखा गया है, क्या अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मसले पर भी हमारी दृष्टि यही नहीं होनी चाहिये?

अब थोड़ी भी अक्ल रखने वाले के लिये ये समझना मुश्किल नहीं कि नव-रामकृष्ण मिशन वालों की रामलला के जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के विषय पर क्या सोच है.

क्या आपको लगता है कि स्वामी विवेकानंद के खीर भवानी यात्रा में ऐसा कोई प्रसंग वास्तव में घटित हुआ होगा?

विवेकानंद को पढ़ने और जानने के बाद आपको कहीं से भी ये लगता है कि उन्होंने कभी ये कहा होगा कि प्राचीन भारत में पांच ब्राह्मण मिलकर एक गाय को चट कर जाते थे?

‘घरवापसी’ के समर्थक स्वामी विवेकानंद की जीसस के बारे में क्या वही मान्यता थी जो आज 25 दिसंबर पर राम और कृष्ण की तरह ईसा का जन्मदिन मनाने वाले नव-रामकृष्ण मिशन का है?

क्या विवेकानंद ने कभी मिशन स्थापित करते समय ये कहा था कि खुद को हिन्दू से अलग, इतर संप्रदाय कहलवाने के लिये तुम अदालत में चले जाना?

क्या अयोध्या, मथुरा और काशी में भग्न मंदिरों की पीड़ा को स्वामी जी ईश्वरेच्छा समझ कर पी जाते रहे होंगे?

क्या आपको लगता है कि हर वक़्त माँ काली के स्नेहांचल में रहने वाले रामकृष्ण देव को किसी मलेच्छ रीति से ईश्वर प्राप्ति हेतु साधना की आवश्यकता हुई होगी?

मतलब साफ़ है कि ‘सर्वधर्म समान’ की मूढ़ता में जकड़े नव-रामकृष्ण मिशन ने अपने शब्द स्वामी जी के मुंह में जबर्दस्ती ठूंसे हैं.

स्वामी विवेकानंद के संदेशों को नव-रामकृष्ण मिशन के साहित्यों से समझने की भूल मत करिये. भारत और हिन्दू धर्म की सेवा में रामकृष्ण मिशन का योगदान बहुत अधिक है पर इस नव-रामकृष्ण मिशन से सतर्क रहने की आवश्यकता है.

स्वामी विवेकानंद के संदेशों को समझना है तो ‘विवेकानंद केन्द्रम’ से प्रकाशित साहित्य को पढ़िए जो स्वामी जी के संदेशों को बिना मिलावट प्रस्तुत करती है.

ढाका में कई सारे मठ बंद होने और वहां से मारपीट कर खदेड़ दिये जाने के बावजूद जिनकी बुद्धि अभी भी ‘सर्वधर्म समान’ की मूढ़ता से उबर नहीं पाई है वहां से कुछ ‘ज्ञान’ लेंगे तो सिवाय भ्रम के आपको कुछ नहीं मिलेगा और ये भ्रम सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर ले जायेगा.

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