भ्रष्टाचार के समंदर में यही एक उम्मीद की नाव है, बिना सोचे समझे इसमें छेद मत करिए

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किसी ने मुझसे पूछ ही लिया कि आखिर मैंने फौज क्यों छोड़ी?

फेसबुक पर मैं इतनी कहानियां सुनाता हूँ पर मैंने आज तक अपनी सेना की नौकरी के बारे में कुछ भी भला-बुरा नहीं कहा है… आज भी नहीं कहूंगा… बस इतना ही कहूंगा… मैं तो मेजर के रैंक पर था. मुझे शायद पतली दाल की समस्या नहीं रही होगी…

मैं और मेरा मित्र, शहीद कैप्टेन अजय सिंह बहुत ही जोश में भर कर फौज में गए थे. यह सोच कर नहीं गए थे कि कुछ सालों में यह वर्दी उतार दूंगा.

अजय आदर्श सैनिक था. वह तो वर्दी पहने पहने ही दुनिया से चला गया वीरलोक में… पर मेरी और फौज की कुछ ज्यादा नहीं बनी. मुझे जल्दी ही समझ में आ गया कि मैं फौज के लिए नहीं बना हूँ.

नहीं, मैं कायर या कामचोर नहीं था. पर फौज में मैंने कोई झंडे नहीं गाड़े. कोई बहादुरी का मैडल नहीं मिला, कोई दुश्मन नहीं मारे. कोई लड़ाई नहीं जीती. पैरा ट्रूपर बनना चाहता था, पारा-कमांडो के लिए भी अप्लाई किया था, मौका नहीं मिला. अपने हिस्से की फील्ड पोस्टिंग भी की.

कुल मिला कर मेरी पोस्टिंग मेरे बहुत से साथियों से ज्यादा आराम की ही थी. वर्ना कैप्टेन अजय सिंह वाले पोस्टिंग आर्डर पर मेरा नाम भी हो सकता था और मेरे घर भी मेरा ताबूत तिरंगे में आ सकता था.

पर अपने हिस्से के बुरे अनुभव भी बहुत हुए… मेरा एक अनुभव इतना कटु था कि उसने मेरे लिए फौज छोड़ देने का निर्णय आसान कर दिया.

वे अनुभव क्या थे, यह बात यहां नहीं कहूँगा. मुझे पतली दाल की परेशानी नहीं थी… पर उससे ज्यादा ही रही होगी. फौज की नौकरी में जितनी परेशानियां हैं वे सारी पतली दाल से बड़ी हैं.

मुझे जिस बात से दुःख हो रहा है वह यह है कि कुछ लोग इसे ऑफिसर बनाम OR का संघर्ष बना कर पेश कर रहे हैं. और कुछ लोग इस बहाने से सेना को भ्रष्ट बता रहे हैं.

एक बात समझ लें, फौज में भर्ती होने दूसरी दुनिया से लोग नहीं आते. वे इसी समाज से आते हैं.

उनमें से किसी का बाप कोर्ट में मुंशी होता होगा और हर कागज़ की कॉपी देने के पैसे लेता होगा. किसी का साला या साढू सेक्रेटेरिएट में किरानी होगा और उसने बेली रोड पर तीन मंजिला मकान बना रखा होगा जिसका ताना उसे उसकी परेशान बीबी सप्ताह में तीन बार देती होगी.

उन लोगों में से ही लोगों को लेकर यह फौज बनी है… फिर भी यहाँ ऐसा भी करप्शन नहीं है कि हर कदम पर गले-गले तक करप्शन में डूबी इस सोसाइटी की सोशल मीडिया में फौज पर कीचड उछाला जाए.

दूसरे, कुछ लोगों के लिए यह ऑफिसर द्वारा OR (Other Rank) के शोषण का मसालेदार वर्ग-संघर्ष का नैरेटिव है. तो इसकी भी सच्चाई समझ लें…

फौज में जो भी करप्शन है, उसमे अधिकारी हैं तो OR भी कम नहीं है. कुक से लेकर मेस हवलदार से लेकर CQMH (Company Quarter Master Havaldar) तक सभी OR ही होते हैं, बल्कि क्वार्टर मास्टर भी हर रेजिमेंट में जवान से प्रमोशन लेकर बना हुआ ऑफिसर ही होता है.

तो यह वर्ग संघर्ष का नैरेटिव यहाँ फिट ना करें. और कोई भी कमांडर भ्रष्टाचार को लेकर जीरो-टॉलरेंस पर नहीं चलता. अगर आप उस हर ड्राइवर का कोर्ट मार्शल करने लग गए जो गाड़ी का पेट्रोल बेचता है तो रेजिमेंट की आधी गाड़ियाँ खड़ी रह जाएंगी… आप कोई काम नहीं कर सकेंगे, सिर्फ कोर्ट मार्शल करते रह जायेंगे.

समझ लें, भ्रष्टाचार को लेकर फौज के अंदर भी टॉलरेंस का एक स्तर है, जैसा कि पूरे समाज में है. पर इसकी स्वीकार्यता नहीं है. नियम कानूनों के लूपहोल में छिप कर जितना हो सकता है, उतना ही है. बेशर्मी नहीं है. एक भ्रष्ट ऑफिसर चाहे जेनेरल ही क्यों ना हो जाये, अपने भ्रष्टाचार की चर्चा ऑफिसर मेस में बैठ कर नहीं करता…कहीं ना कहीं शर्मिंदगी में ही रहता है.

पर 99% ऑफिसर और जवान अपना काम ईमानदारी और समर्पण से ही करते हैं. और उन्हें भी परेशानियां हैं… उनमें से किसी की भी परेशानी तेजबहादुर की परेशानी से बड़ी है. बस यही समझ लें, फौज में पैसे काम करने के नहीं मिलते, परेशान होने के ही मिलते हैं…

वैसे आपको अपने काम में परेशानी नहीं है? क्या आपका बॉस आपको तंग नहीं करता? क्या आपको अपनी कंपनी में आपके CEO के बराबर सुविधाएँ मिलती हैं?

टाटा में काम करते हुए मैंने तो कभी नहीं पूछा कि मुझे मुत्थुरामण के बराबर सैलरी या सुविधा क्यों नहीं मिलती? तो यह समानता का झंडा फौज में उठाने वाले कहाँ से आ रहे हैं?

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि मुझे फौज में सब कुछ बहुत पसंद आया. बेशक, नहीं आया. वहाँ बहुत कुछ था जिससे मैं सहमत नहीं था. बहुत कुछ था जिसको लेकर मेरी अपने सीनियर्स से जमकर झड़प भी हुई… ब्रिगेडियर रैंक तक के ऑफिसर से भी हुई.

पर मैंने एक बात समझ ली, फौज के चलने का एक तरीका है और फौज वैसे ही चल सकती है. और उसी तरीके से चलकर फौज आज भी देश की सभी संस्थाओं के बीच सबसे साफसुथरी और सक्षम संस्था है. भ्रष्टाचार के समन्दर में तैरती यही एक उम्मीद की नाव है… बिना सोचे समझे इसमें छेद मत कीजिये.

मुझे यह पसंद नहीं आई, मैंने छोड़ दी… फौज में रह कर कभी फौजी गाड़ी और सहायक रखने का शौक नहीं रहा… फौजी चमक दमक से ऑंखें भी नहीं चुंधियाईं… आज मेरे पास एक्स-सर्विसमैन का कार्ड भी नहीं है, मैं कभी फौज से कोई सुविधा नहीं लेता… कभी कैंटीन नहीं गया.

फौज से मुझे जो मिला, उसके लिए मैं इसका शुक्रगुज़ार हूँ. पर मैं फौज के लिए नहीं बना था, यह भी समझता हूँ. अगर आपको लगता है कि आप भी इसके लिए नहीं बने हैं तो इज्जत से इसे छोड़ दें..

यहाँ का माहौल और सारी तकलीफों के बावजूद समर्पण से काम कर रहे 99% लोगों का मोराल खराब ना करें… बाहर बहुत बड़ी दुनिया है. पर यहाँ लाल झंडा खड़ा करके केजरीवाल बनने की कोशिश नहीं करें. फौज में जूते पैरों में फिट नहीं होते, पैरों को ही जूतों में फिट होना होता है.

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