मुखबरी करने वालों ने दलाली और तुमने गोली खायी आज़ाद

0
113

1947 से पहले देश के लिये फांसी चढ़ने वालों या गोलियाँ खाने वालों में कोई बड़ा कांग्रेसी नेता नहीं था. क्यूं? क्या खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, अशफाक उल्ला खाँ, ऊधम सिंह जैसे हजारों क्रांतिकारी भारत के खिलाफ लड़ रहे थे? नहीं… तो कांग्रेस ने किसी को समर्थन क्यूं नहीं दिया ?

क्यों क्रांतिकारियों को अपराधियों जैसा जीवन जीने के लिये मजबूर होना पड़ा. आम लोगों में उनसे दूर रहने की धारणा बनाई गयी. भले थे वो लोग, जिन्होंने अंग्रेजों और कांग्रेसियों से छुप-छुप कर उनकी मदद की. सुभाषचंद्र बोस को युद्ध अपराधी घोषित करवा दिया गया.

क्या अंग्रेजों में क्रांतिकारियों का कोई खौफ नहीं था? या उन्हें अपने चुने हुए सांसदों, विधायकों यानी कांग्रेसियों पर इतना भरोसा था कि इनके रहते भारत में कोई बड़ी क्रांति नहीं हो सकती?

क्या अंग्रेज, कांग्रेस के आंदोलनों से घबरा कर कांग्रेस के अपने वफादार लोगों को सत्ता सौप कर, देश के दो टुकड़े करके भारत से गये या द्वितीय विश्व युद्ध से हुई खस्ता माली हालत की वजह से गये? इस पर भी शोध आवश्यक है.

कांग्रेसी यह भी कहते पाये जाते है कि बिना बँटवारे के देश आजाद ही नहीं हो सकता था. ये वही लोग हैं जिन्होंने लोगों को अंग्रेजों से डरकर रहने की आदत डाल दी थी.

कांग्रेस के आंदोलनों को अंग्रेजों से परमिशन मिली होती थी.. शर्तो पर. कहीं जनता उन शर्तो के बाहर जाकर अपना गुस्सा दिखाती तो ‘गाँधी जी’ फौरन आंदोलन स्थगित कर देते या सरकार उन्हें जेल में डाल देती.

फिर उनके बाहर आने, स्वस्थ होने, अगले आंदोलन की रूपरेखा बनाने में दो-दो, तीन- तीन साल का गैप हो जाता. तब तक पूरे देश में कहीं कोई हलचल नहीं होती थी. ये अंग्रेज़ सरकार से सांठगांठ नहीं थी तो क्या था?

अगर कांग्रेस ने क्रांतिकारियों का समर्थन किया होता और सतत आंदोलन किये होते तो देश बहुत पहले ही और अच्छी स्थिति में आजाद हो सकता था लेकिन क्या करें राजनीति तो 100 साल पहले ही शुरू हो चुकी थी. अच्छे नेताओं पर दो-चार नेता भारी थे.

यही बहुत हुआ कि कुछ गिनती के चर्चित शहीदों को, मजबूरी में ही सही, सम्मान देना पड़ा, नहीं तो ये भी अपने हजारों साथियों की तरह गुमनाम ही रहते. सभी शहीदों को कोटि-कोटि धन्यवाद और सलाम.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY