मेकिंग इंडिया गीतमाला : मन की प्यास मेरे मन से ना निकली

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rekha photo jayesha sheth poem by ma jivan shaifaly

ह्रदय कुण्ड के तरल प्रेम को
जमा दिया है
तेरी अबोली ठंडी परछाइयों ने
आओ अपनी साँसों की किरणों को
बाँध दो मेरे देह के कटिबंध पर
सुना है एक सौर्य वर्ष में दो बार
सूर्य तक लम्बवत होता है पृथ्वी के
ऊष्ण कटिबंध पर…

कर्क से लेकर मकर तक
सारे अक्षांशों तक अंगड़ाई ले चुके
अंगों ने प्रयास किया है
हरित ऋत के भ्रम को
बनाए रखने के लिए
लेकिन वर्ष भर की
तेरी यादों की औसत वर्षा भी
नम नहीं कर सकी है देह की माटी

आ जाओ इससे पहले कि ह्रदय कुण्ड
शीत कटिबंध पर प्रस्थान कर जाए …
और सूर्य की तिरछी किरणें भी
अयनवृत्तों को छू न पाए

मैंने देह की माटी पर
प्रेम के बीज बोए हैं
तुम अपनी प्रकाश किरणों से
उसे संश्लेषित कर जाओ….

माँ जीवन शैफाली

मन की प्यास मेरे मन से ना निकली…. ऐसे तड़पूं कि जैसे जल बिन मछली

चित्र साभार श्री जयेश शेठ 

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