नागाओं का रहस्य -1 : उद्गम और टोटेमवाद

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नागाओं का रहस्य

नाग एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है सर्प. इसका अर्थ ‘पहाड़ी’ या ‘पर्वत’ भी होता है. चूंकि आदिमानव पहाड़ों की प्राकृतिक कंदराओं और गुफाओं में रहते थे, इसलिए ये अनुमान है कि ऐसे स्थानों पर निवास करनेवालों को ‘नाग’ कहा गया.

प्राचीन कबीले के लोग कपड़ों का उपयोग नहीं करते थे एवं नग्न रहते थे. इसलिए इसका एक अर्थ ‘नग्न’ भी निकाला गया. इसका एक अर्थ हाथी भी हो सकता है, लेकिन इस जानवर का मानव से इतना अधिक संबंध नहीं दिखता जितना नाग से दिखता है, जिसके पीछे इसका नाम रखना अधिक न्यायोचित लगा.
इसका और अधिक स्पष्टीकरण नाग की पूजा करनेवाले संप्रदाय में मिलता है. ये संप्रदाय प्राचीन भारत में व्यापक रुप से फैली हुई थी. प्राप्त प्रमाण के अनुसार यह निःसंदेह एक वैश्विक संप्रदाय है.

भारत का प्राचीनतम साहित्य वेद, आर्य और दस्यु में विरोध दर्शाते हुए दस्यु का सर्प(नाग) से संबंध जोड़ते हैं. वैदिक काल उपरांत के प्राचीन संस्कृत साहित्य में नागों को अन्य अर्ध दिव्य मानव जैसे किन्नर, गंधर्व, यक्ष आदि की तरह आधे आदमी और आधे सर्प वाले शरीर के अर्ध दिव्य मानव वर्ग में रखा गया.

इन्हें निचले क्षेत्रों के विलासी शहरों में अपनी सुंदर एवं आकर्षक सहचर्या के साथ पूर्ण विलास और सांसारिक सुख भोगते हुए खूब धनी संप्रदाय के रुप में भी वर्णित किया गया है.

इन्हें स्वर्ग में ईश्वर की सेवा करने वाले गणों में भी रखा गया है. इन सब के साथ-साथ इन्हें देश के विभिन्न भागों में रहनेवाले मानव के रुप में भी वर्णित किया गया है.

पुराण नीचे की दुनिया को सात भागों में विभाजित करता है जिनमें से पहले चार पर दैत्य या दानव का अधिकार था और बाकी पर नागों का. सबसे निचले क्षेत्र को विष्णु पुराण और पद्म पुराण में स्पष्ट रुप से चित्रित किया गया है. पाताल के अस्तित्व के कई स्पष्टीकरण भी मिले हैं.

वास्तव में, नागों को नाग(सर्प) को एक टोटेम के रूप में माननेवाले टोटेमिस्टिक लोगों के रुप में देखा गया है. ‘टोटम’ शब्द उत्तरी अमेरिका में सुपीरियर(उच्च) झील के निकट एलॉंग्किन वंश में निवास करने रहने वाले ओजिब्वा जनजाति की भाषा के अंतर्गत आता है.

यह जींस या कबीले के विभाग के प्रतीक या उपकरण के रूप में कार्य करता है जिसके द्वारा इसे अन्य इस तरह के विभाग से प्रथक किया जाता है. टोटेमिस्टिक उपकरण जानवरों जैसे भेड़िया, भालू, मछली, साँप, पक्षी, सब्जियों जैसे मकई आलू, तंबाकू के पौधे या सूर्य, पृथ्वी, रेत, नमक, समुद्र, बर्फ, पानी, बारिश आदि प्राकृतिक वस्तुओं के अंतर्गत आते हैं.

टोटेम की प्रकृति का वर्णन करते हुए महोदय जे.जी. फ्रेज़र कहते हैं: “टोटेम प्राकृतिक घटनाओं या सामग्री के वर्ग का होता है. एक वस्तु सामान्यतः जानवरों या पौधों की एक प्रजाति- जिसके बीच खुद असभ्य मनुष्य का मानना ​​है कि एक निश्चित अंतरंग संबंध स्थित है.

इस संबंध की सही प्रकृति पता लगाना आसान नहीं है, विभिन्न व्याख्याओं का सुझाव दिया गया है, लेकिन कोई भी अभी तक सार्वजनिक स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सका है, जो कुछ भी हो, वह असभ्य मनुष्य को अपने टोटेम यदि वह एक जानवर या पौधा है, को मारने या खाने से रोकती है.

इसके अलावा टोटेम को अलौकिक रूप से गणचिह्न मानने के कारण टोटेमीगण के सदस्य उस टोटेम के नाम से जाने जाते हैं और आपस में रक्तसंबध मानते हैं और इस कारण उनका परस्पर विवाह या सहवास सख्त रुप से वर्जित होता है. आम तौर पर इस समूह के भीतर विवाह निषेध को बहिर्विवाह के नाम से बुलाया जाता है.

इसलिए टोटेमवाद (गणचिह्नवाद) को सामान्यतः धर्म और समाज दोनों की एक आदिम प्रणाली के रूप में व्यवहार में लाया गया. धर्म की एक प्रणाली के रूप में, यह असभ्य मनुष्य के अपने टोटेम के साथ रहस्यमयी संबंध को सम्मिलित करता है एवं समाज की प्रणाली के रुप में यह उस संबंध को सम्मिलित करता है जिसमें समान टोटेम के महिला और पुरुष एक दूसरे के लिए तथा दूसरे टोटेमगण के समूहों के सदस्यों की मदद के लिए सदैव खड़े रहते हैं.

क्या दोनों पक्ष, धार्मिक और सामाजिक, हमेशा एक साथ अस्तित्व में रहे हैं, या अनिवार्य रूप से स्वतंत्र यह एक प्रश्न सदैव उठता रहा जिसके विभिन्न उत्तर मिलते रहे हैं. कुछ लेखकों उदाहरण के लिए, सर जॉन ल्युब्बॉक और हरबर्ट स्पेंसर का मानना है कि टोटेमवाद समाज की एक प्रणाली के रूप में प्रारंभ हुआ, और उससे जुड़े अंधविश्वास गलतफहमी की एक सरल प्रक्रिया के माध्यम से विकसित हुए.

कुछ दूसरे लेखक जैसे जे एफ मॅक्लेनन और रॉबर्टसन स्मिथ का मानना है कि टोटेम की धार्मिक आस्था मौलिक है जिसके कारण ही बहिर्विवाह से परिचय प्रारंभ हुआ. आदिम समाज टोटेमगण(टोटेमिस्टिक) समूहों का एक नेटवर्क(जाल) था और उनमें से प्रत्येक के पास एक जानवर या पौधा प्रतीक के रुप में हुआ करता था. और समय के साथ ये टोटेमिस्टिक समूह अपने टोटेम के नाम से पुकारे जाने लगे.

उदाहरणार्थ, भारत में ये टोटेमिस्टिक समूह कभी वानर (बंदर वंश) के, कभी अज (बकरी वंश), रसनी (Vrsnis) (राम वंश), गरुड़ (चील वंश), मत्स्य (मछली वंश) और नाग (सर्प वंश) के रुप में मिलते रहे. अतः नागों को नाग से जोड़ते हुए सर्प वंश का माना जा सकता है, इसलिए उनके मुकुट और झंडे इत्यादि पर सर्प का चिह्न देखने को मिलता है.

(क्रमश:)

– माँ जीवन शैफाली 

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