Audio : साधु, ऋषि, मुनि का अर्थ सिर्फ जटा-जूट, रुद्राक्ष, कमंडल धारी संन्यासी नहीं होता

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कुछ चीज़ें सच ना होने पर भी सच लगती हैं. जैसे अगर हम आपको ऋषि-मुनि-साधु जैसा कुछ सोचने को कहें तो तुरंत आपके दिमाग में जंगल में रहने वाले किसी आश्रम वासी की तस्वीर बनेगी. भगवा पहने होगा, धन-संपत्ति से वास्ता नहीं. जटा-जूट होगी, रुद्राक्ष वगैरह टंगे, कमंडल दाढ़ी मूंछ सब याद आ जायेगा.

ऐसा हमेशा इसलिए होता है क्योंकि टेलीवीजन पर साधु, ऋषि, मुनि सबको एक ही दिखाया जाता है. अगर आप सच में रामायण महाभारत टाइप कुछ पढ़ लें, तो ये तस्वीर जरा टूटने लगती है.

जैसे वाल्मीकि रामायण में जिस सबसे शुरुआती यज्ञों का उल्लेख मिलता है वो है पुत्र कमेष्ठी यज्ञ. इस हिस्से को पढ़ते ही यज्ञ करवाने वाले ऋषि का नाम भी पता चल जाता है. इसे ऋष्यश्रिंग ने करवाया था.

जब इस ऋषि के बारे में आप पढ़ेंगे तो आपको अंग देश का नाम फिर से दिखेगा. अंग वही राज्य है जहाँ का राजा दुर्योधन ने कर्ण को महाभारत में बनाया था. बाल कांड के दसवें सर्ग में तैंतीसवें श्लोक के मुताबिक ऋष्यश्रिंग अंग देश की राजधानी में रहते थे. मतलब भगवा, जटा-जूट धारी ऋषि राजधानी में रहते होंगे क्या?

वैसे ऋष्यश्रिंग के बारे में और भी बातें हैं जो आम तौर पर स्त्रीविरोधी होने के कारण एक आयातित विचारधारा के लोग नहीं बताते. जैसे कि जब उनका जिक्र आता है तो उनकी पत्नी शांता का नाम नहीं लेते. जिस काल में ऋष्यश्रिंग को दशरथ ने यज्ञ के लिए बुलाया था उस समय अंग देश के राजा रोमपाद थे.

शांता उनकी बेटी थी. रोमपाद, राजा दशरथ के पुराने मित्र थे. बरसों के इतने अच्छे सम्बन्ध थे कि कई साल पहले राजा दशरथ की बेटी को राजा रोमपाद ने गोद ले लिया था. शांता वही बेटी थी. यानि ऋष्यश्रिंग तकनिकी रूप से राजा दशरथ के भी जमाई थे.

ऋषि, साधु और मुनि जैसे शब्दों में अर्थ का अंतर होना चाहिए ये अगर समझ गए हों तो ये भी ध्यान चला जाएगा कि आर्थिक कारणों, या अन्य लाभ के लिय ऋषि-मुनि एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे हैं. तो पढ़ लेने से एक फर्क ये आता है कि पद्धति को हिन्दू होने के कारण आप पहले से ही, अभ्यास से जानते हैं.

आपका समझा हुआ, किसी बाहर से देख रहे विदेशी का आधा-अधूरा अंदाजा लगाना नहीं होता. ये अनुमान और ज्ञात का फर्क इसलिए है क्योंकि आप within हैं वो without ! खुद ना पढ़ने के कारण ऐसी चीज़ों के आर्थिक, सामाजिक पक्ष पर आपका ध्यान भी नहीं गया.

बाकी जो विचारक (मुनि) हिन्दू होने के बाद भी हिंदुत्व का पक्ष लेने के बदले, विदेशी पाले में बैठते हैं, वो क्यों होता है, इस पर भी सोचिये. वरना हमारे-आपके नाश तक, ये होता तो रहेगा ही.

आनंद कुमार की आवाज़ में सुनिए इस लेख का ऑडियो

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