औरंगजेब का इतिहास : ईश्वर में ना सही, वामपंथी इतिहासकारों में होती है भूतकाल बदलने की क्षमता

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Aurangzeb

भारत के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने के क्रम में वामपंथी इतिहासकारों ने औरंगजेब की धार्मिक कट्टरपन के तहत की गयी मंदिरों के प्रति विद्ध्वंसात्मक कार्यवाहियों को ढंकने और औरंगजेब को अ-साम्प्रदायिक सिद्ध करने के लिए हर फरेब का इस्तेमाल किया :-

फरेब संख्या 1 : औरंगजेब के शासनकाल की जानकारियों का सबसे समकालीन, प्रामाणिक, और प्राथमिक स्त्रोत ‘अखबारात’ – यानि औरंगजेब-शासन की प्रत्येक आधिकारिक कार्यवाहियों की उसके दरबार में की गयी औपचारिक प्रविष्टियों का आधिकारिक दस्तावेज – को इन इतिहासकारों ने चालाकी से दरकिनार कर दिया क्योंकि उसमें धार्मिक-कट्टरता के उद्देश्य से मंदिरों के तोड़े जाने और इस बाबत औरंगजेब के वार्तालाप और औरंगजेब के फरमान का सविस्तार वर्णन स-दिनांक उल्लिखित है.

फरेब संख्या 2 : दूसरे अत्यधिक प्रामाणिक और समकालीन दस्तावेज ‘आलमगीरनामा’ – जो आधिकारिक प्रक्रिया के तहत औरंगजेब-दरबार के अधिकारी मिर्ज़ा मुहम्मद काजिम द्वारा लिखा जाता था – में दर्ज धार्मिक कट्टरता के उद्देश्य से किये गए ऐसे तोड़फोड़ के कार्यों के सविस्तार विवरण, जो अखबारात के विवरण की पुष्टि करते हैं, को भी वामपंथी इतिहासकारों ने पचा लिया.

फरेब संख्या 3 : औरंगजेब के सबसे विश्वस्त और धार्मिक मामलों के सचिव इनायत खान के आदेश पर शाही मनसबदार मुस्ताद खान साकी द्वारा लिखित ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ को भी वामपंथियों ने चालाकी से दरकिनार किया क्योंकि उसमें भी धार्मिक-कट्टरता के उद्देश्य से मंदिरों के तोड़े जाने का सम्पूर्ण विवरण दिनांक और सूची के साथ उपलब्ध है.

फरेब संख्या 4 : इतिहास के लिए सबसे महत्वपूर्ण “समकालीन” आधिकारिक शाही प्रमाणों को चालाकी से दरकिनार कर के वामपंथियों ने औरंगजेब पर उस इश्तिआक हुसैन कुरैशी लिखित पुस्तक की लाइन –कई जगह तो हुबहू- अख्तियार कर ली जो इस्लामीकरण का पैरोकार था, पाकिस्तान में मंत्री था, और जिसे सितारा-ए-पाकिस्तान से नवाजा गया था.

फरेब संख्या 5 : भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ रूसी इतिहासकार बोंगार्ड लेविन, के अन्तोनोवा, कोटोवस्की के उन शोधों से भी – जिसमें औरंगजेब द्वारा धार्मिक कट्टर कारणों से मंदिरों के तोड़े जाने का और उसके साम्प्रदायिक होने का विवरण है – हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने आँखें मूँद लीं.

फरेब संख्या 6 : औरंगजेब के द्वारा दो-चार मंदिरों को, संभवतः राजनीतिक कारणों से, आर्थिक अनुदान दे देने का कारण ये वामपंथी औरंगजेब की “धार्मिक सहृदयता और उसकी अ-साम्प्रदायिकता” बता देते हैं , लेकिन उसके द्वारा सैकड़ों मंदिरों के तोड़े जाने का कारण – जो, दरबार की आधिकारिक प्रविष्टियों के अनुसार, धार्मिक-कट्टरता था – को बड़ी चालाकी से ‘राजनीतिक’ बता देते हैं.

फरेब संख्या 7 : औरंगजेब के अधिकारियों में 33 प्रतिशत हिन्दुओं की संख्या को वामपंथी इतिहासकार उसके धार्मिक कट्टर और साम्प्रदायिक न होने का प्रमाण बता देते हैं; कमाल है, तब तो अंग्रेजों द्वारा दी गयी उपाधियों में से अधिकाँश भारतीयों को दी गयी थी इसलिए ये मान लिया जाए कि अँगरेज़ भारतीयों को अंग्रेजों के समकक्ष समझते थे? औरंगजेब के शासकीय दल में वही हिन्दू थे जो धार्मिक कट्टरपन में उसके मददगार थे, ठीक उसी तरह जिस तरह अंग्रेजों के साथ वही हिन्दुस्तानी थे जो उनके मंसूबों को पूरा करते थे.

फरेब संख्या 8: अस्सी के दशक में प. बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर के निष्पक्ष रूप से लिखे इतिहास की सभी पुस्तकों में से उन अंशों को हटाने या बदलने को कहा जिसमें मुस्लिम शासकों की निष्पक्ष आलोचना की गयी थी ; इसमें पी मैती लिखित पुस्तक ‘भारतेर इतिहास’ के “धर्म पर औरंगजेब की नीति” नामक अध्याय के भी कई अंश शामिल थे.

एक टीवी कार्यक्रम में वर्षों पूर्व जब इन प्रमाणों का उल्लेख लिया गया तो वहां मौजूद वामपंथी इतिहासकार के एम श्रीमाली बगलें झांकने लगे थे. सैमुअल बटलर ने शायद हमारे वामपंथी इतिहासकारों को ध्यान में रख कर ही कहा होगा कि ईश्वर तो भूतकाल को बदल नहीं सकता लेकिन हाँ इतिहासकारों में ऐसी क्षमता अवश्य होती है. वामपंथियों द्वारा देश पर एक भ्रामक और मिथ्यापूर्ण इतिहास “गढ़ने” का उनका अपराध बेहद शर्मनाक है, अक्षम्य है.

[सन्दर्भ : अखबरात, मासिर-ए-आलमगिरी आदि के अनुवाद के लिए सर जे एन सरकार की 1928 में प्रकाशित पुस्तक “History of Aurangzeb”; इश्तिआक कुरैशी की पुस्तक “The Muslim Community of Indo-Pakistan in Sub Continent”; सतीश चन्द्र की “Medieval India”; अन्तोनोवा कोतोव्स्की आदि की “A History of India”; सर्कुलर के लिए Outlook पत्रिका; अरुण शौरी की Eminent Historians : Their lines Their frauds; तथा अन्य ]

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