मोदी जी! हम युवा हैं, हमें परीक्षा, नेतागीरी और नौकरी के जंजाल से आप कब मुक्ति देंगे प्रभो?

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modi with youth

सुना आज युवा दिवस है. नहीं! सचमुच मुझे याद नहीं था. वो तो प्रधानमंत्री जी का ट्विटर नोटिफिकेशन आया तो याद आया. फिर कुछ लोगों की पोस्ट पढ़ी. स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिवस तो संक्रांति के दिन होता है ये भी किसी की पोस्ट से ज्ञात हुआ. ‘उठो जागो चलते रहो!…’ वाली लाइन और य्ये लम्बे चौड़े गम्भीर दार्शनिक लेख देखे. ये सब तो ठीक है, लिखना चाहिये लेकिन वस्तुस्थिति क्या है?

24 अप्रैल 2014 के दिन नरेन्द्र मोदी ने बनारस से चुनाव लड़ने का नामांकन किया था. मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद वे मलदहिया चौराहे पर सरदार पटेल की मूर्ति को माला पहनाने पहुँचे.

मैं टीवी पर लाखों लोगों का रेला देख रहा था. वह भीड़ ऐसी थी कि जितने लोग ट्रक के आगे थे उतने ही पीछे भी थे. ट्रक एक इंच न आगे खिसक सकती थी न पीछे. सुरक्षा विशेषज्ञों ने बाद में लिखा कि मोदी जी को इस तरह नहीं जाना चाहिये था. विश्वास कीजिए ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे भगवान ने अवतार ले लिया हो.

उस चौराहे से आगे नदेसर चौराहा है जहाँ स्वामी विवेकानंद जी की प्रतिमा है. मलदहिया चौराहे पर पटेल की प्रतिमा से नदेसर चौराहे पर विवेकानंद तक जाने में बमुश्किल 5 मिनट भी नहीं लगता लेकिन उस दिन ये दूरी लगभग पौने दो घण्टे में पूरी हुई थी. मैं टीवी देखते एक घण्टा सो गया था. उठा तब भी भीड़ चल ही रही थी.

पटेल, विवेकानंद और मोदी में क्या समानताएं हैं? ये तीनों युवाओं की पसन्द हैं. क्यों? क्योंकि इन्होंने कड़े फैसले लेने में कभी कोताही नहीं बरती. युवा रिस्क लेना चाहता है. वो हवा की विपरीत दिशा में चलने को आतुर होता है.

वस्तुस्थिति यह है साहब कि आज देश का युवा मोटा-मोटी तीन चीजों के जंजाल में फंसा है: नौकरी, परीक्षा, और नेतागीरी.

इस देश में परीक्षाएं बहुत होती हैं. पहले हाई स्कूल, फिर इण्टर में PMC की मारामारी, उसके बाद कथित ‘करियर ओरिएंटेड’ कोर्स में दाखिले की परीक्षा, उसके बाद कैट-मैट-जैट, कुछ नहीं हुआ तो यूपीएससी, लोक सेवा आयोग, बैंक, एसएससी फलां ढिमका.

उप्र लोक सेवा आयोग में 40 बरस तक आप आवेदन कर सकते हैं. यानि इस देश में ऐसा माहौल है साहब कि 16-17 की आयु से लेकर 40 बरस तक आप परीक्षा की तैयारी में समय नष्ट करने को स्वतंत्र हैं.

इतने पर भी गारण्टी नहीं कि आप PCS बन जाओगे, या IIT, IIM पहुँच जाओगे क्योंकि सीटों की संख्या तो सीमित होती है. बीस साल परीक्षाओं की तैयारी करने के बाद दिमाग में कुछ नया कुछ innovative आयेगा क्या?

जब युवा ये सब नहीं कर पाता तो नेतागीरी करने की सोचता है. एक दिन मुझसे कुछ मित्रों ने कहा कि एक एनजीओ या पार्टी बनाने का विचार है, आप हमारे साथ हो जाइये.

मैंने पूछा, क्यों भई मैं आपका क्यों सहयोग करूँ? मैं एक युवा हूँ, मुझे पार्टी एनजीओ बनाने की क्या जरूरत? मैं बुड्ढा थोड़े हूँ साहब! मैं कोई रिटायर्ड अफसर नहीं हूँ कि अपने अनुभव से एनजीओ चलाऊं. मैं जवान लड़का हूँ. कुछ करना हुआ तो स्टार्टअप करूँगा जिससे चार और लोगों को रोजगार मिले. आप एनजीओ बना के लोगों का कल्याण करने की सोच रहे हैं आपसे अच्छे तो वो लड़के हैं जो दुकान चला कर लोगों का आधार बना रहे हैं, डिजिटल लिटरेसी के तहत गाँव में जा के कम्प्यूटर सिखा रहे हैं.

मेरी बात सुनकर मित्रों ने कन्नी काट ली. क्योंकि यूपी के लगभग हर युवा को नेतागीरी का शौक है. उसके दिमाग में स्टार्टअप का कीड़ा नहीं घुस सकता. आपको चार ठो नियम कानून समझा देगा, ये नहीं वो नहीं बतिया के कन्नी काट लेगा.

तीसरी कैटगरी है नौकरी पेशा लोगों की. ये ऐसे युवा हैं जो आउट ऑफ़ द बॉक्स सोच ही नहीं सकते. दिन रात यही सोचते हैं कि मेरी नौकरी सबसे घटिया है फलाने की जॉब बड़ी तगड़ी है.

नौकरी मिल जाना आज भी किसी युवा के जीवन का सबसे अच्छा दिन होता है. एक बार नौकरी मिलने के बाद वो उसके आगे सोच ही नहीं सकता.

जिंदगी भर साइंस पढ़े मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जो बैंक में मैनेजर हुए हैं लेकिन उनसे आप केवल ‘फाइनेंस’ शब्द का अर्थ पूछ दीजिये तो नहीं बता पाएंगे. उन्हें सामाजिक विज्ञान के विषयों में भी रत्ती भर रुचि नहीं है.

देश की किसी भी नीतिगत समस्या पर उनके विचार शून्य से भी नीचे होते हैं. उनके दफ्तर में कम्प्यूटर खराब हो जाये तो ठीक करने की कोशिश भी नहीं कर सकते.

मोदी जी! हम सवा सौ करोड़ के लगभग साठ प्रतिशत हैं. हम युवा हैं. हमें परीक्षा, नेतागीरी और नौकरी के जंजाल से आप कब मुक्ति देंगे प्रभो?

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