अगर यहाँ ज्यादा समाजवाद घुसेड़ा तो फौज का उत्तर प्रदेश हो जायेगा…

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बीएसएफ जवान के वीडियो को लेकर जो सबसे बुरी बात हो रही है, यह विषय जवान बनाम ऑफिसर के द्वन्द में बदल रहा है… यह बहुत ही बुरी और घातक प्रवृति है और मेरी शंका है यह क्षति दीर्घस्थायी हो सकती है.

जब आप फौज को सम्मान देते हैं तो क्या किसी फौजी व्यक्ति को सम्मान देते हैं? व्यक्ति तो वही हैं जो हमारे समाज में दूसरे हैं. वही प्रवृतियां, वही कमजोरियाँ हैं.

एक फौजी को भी सामने से चल रही गोली से डर लगता है… नोटों की गड्डी देख कर लालच आता है… सम्मान और प्रशंसा की भूख होती है.

पर फौज सम्मान का पात्र है व्यक्ति के रूप में नहीं, एक संस्था के रूप में. इसी समाज से सामान्य व्यक्तियों को प्रशिक्षण और संस्कार से सम्मान का पात्र बनाया जाता है… कर्तव्य के योग्य बनाया जाता है.

यहाँ सभी को ठोक बजा कर एक सांचे में ढाल दिया जाता है…फिर भी उनके व्यक्तिगत चरित्र भी उनका साथ पूरी तरह नहीं छोड़ देता.

मेरे लिए जब फौज के सम्मान का प्रश्न आएगा तो मैं इसे किसी व्यक्ति या रैंक के विभेद से नहीं देखता.

क्या मैं फौज में बेईमान ऑफिसर्स के बारे में जानता हूँ – जी हाँ.

क्या मैं फौज में बेईमान या कामचोर सिपाहियों के बारे में जानता हूँ? – जी हां.

क्या उनकी वजह से मेरे मन में फौज नाम की संस्था के प्रति सम्मान कम हो जाता है? – फिर कहूंगा… नहीं.

भ्रष्टाचार हमारे समाज के भ्रष्ट व्यक्तियों की प्रवृति है, जिसमें से कुछ फौज में भी आ गए हैं. लेकिन इससे आप यह नहीं कह सकते कि भ्रष्टाचार फौज की संस्थागत समस्या है.

लेकिन अगले प्रश्न पर आता हूँ…. अनुशासन फौज की केंद्रीय शक्ति है.

अगर सैनिक अपनी शिकायतें सोशल मीडिया पर डालने लगें, पाकिस्तान और सऊदी अरब के लोगों से शेयर करने लगें… क्या फौज चल सकती है? क्या Redressal of grievances का यह चैनल मान्य हो सकता है?

अगला प्रश्न है फौज में hierarchy का.

Hierarchy फौज के संगठन का केंद्रीय कांसेप्ट है. सिपाही से ज्यादा नायक को, नायक से ज्यादा हवलदार को, हवलदार से ज्यादा सूबेदार को मिलता है… अधिकार, सम्मान, सुविधाएँ… आप कुछ भी assume नहीं करते, शून्य से शुरू करते हैं.

फिर आप privileges earn करते हैं. ऑफिसर भी NDA में 1ST सेमेस्टर से फाइनल सेमेस्टर कैडेट तक इस प्रिविलेज को earn करने के कांसेप्ट के साथ बड़े होते हैं.

एक लेफ्टिनेंट रेजिमेंट में आता है तो जवानों के बैरक में रहता है महीने भर. ऑफिसर मेस में नहीं खाता… जब तक उसकी डाइनिंग-इन नहीं हो जाती.

अफसर की जिंदगी उसे अधिकार के रूप में नहीं मिली, यह उसे समझा दिया जाता है… फिर लेफ्टिनेंट से कैप्टेन से लेकर कर्नल या जनरल तक वह इस hierarchy से गुजरता है.

Hierarchy के साथ सुविधाएं आती हैं. एक लेफ्टिनेंट भी यह नहीं पूछता कि सीओ को उससे ज्यादा सुविधा क्यों मिलती है, जनरल को सीओ से ज्यादा सुविधा क्यों मिलती है… यह प्रिविलेज सिस्टम ही फौज में हर किसी के लिए ऊपर उठने का प्रोत्साहन है…

भ्रष्टाचार एक अलग प्रश्न है…यह सिस्टम फौज में भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं देखा जाता.

मेरे लिए यह जवान बनाम अफसर का प्रश्न नहीं है. रिक्रूट से लेकर जनरल तक एक ही फौज है. एक ही संस्था है, एक ही व्यवस्था है.

पर फौज समानता खोजने, मांगने, झंडा उठाने की जगह नहीं है… अगर यहाँ ज्यादा समाजवाद घुसेड़ा तो फौज का उत्तर प्रदेश हो जायेगा…

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