वर्ण व्यवस्था 11 : आसुरी और दैवीय, संसार में यही दो जातियां

गतांक से आगे…

सौभाग्य की बात तो यह है कि इन स्मृतियों में लिखा है कि इसे किसी को मत दिखाना, कोई छूने न पाये. गर्भादान से लेकर चिता तक का जिसे मन्त्र मालूम हो, वही इन्हें पढ़ने का अधिकारी है. उसे बता सकते हो क्योंकि उसे जरूरत है. वह यही सब करेगा. लाखों ब्राह्मणों में दस-पन्द्रह इसके जानकार थे. शेष सभी तो उनके संकेत पर चलते थे. इसलिए ब्राह्मण का कदापि दोष नहीं है.

दोष तो कतिपय लोगों का था, जो राजा के बगल में बैठकर उपाधि, मंत्री-पद पाये हुए थे. लिखा है- राजा प्रातः उठकर ब्राह्मणों का पूजन करे और उनसे पूछकर हर कार्य करें.

वास्तविक राजा तो वे थे, दोष तो उनका था, जिन्होंने धर्म की दुहाई देकर, नरक का आतंक दिखाकर राजसत्ता के माध्यम से शत-प्रतिशत निरक्षर जनता का मनमाना शोषण किया.

स्मृतियों में सामाजिक व्यवस्था के अनेक उपयोगी सूत्र भी हैं किन्तु हमारा विनीत निवेदन है कि पूर्वजों की प्रत्येक उपयोगी-अनुपयोगी व्यवस्था को धरोहर मानकर रूढ़ि पालने का कोई उपयोग नहीं है.

यह जाति, ऊँच-नीच, छुआछूत इत्यादि मनुष्य के अन्तःकरण में स्थित राग-द्वेष से उत्पन्न काम-क्रोध-मोह-अहंकार-दम्भ-द्वेष इन प्रकृतिजन्य विकारों की देन है. जगत् सदैव अपने को श्रेष्ठ घोषित करता आया है. भाई-भाई लड़ते आये हैं. यह गुटबंदी अज्ञान और अविवेक की उपज है.

पूरा विश्व काले-गोरे, लाल-पीले रंग को लेकर बँटा हुआ है. परस्पर दमन के लिए शस्त्रों की होड़ लगी है, शीत-युद्ध का वातावरण बना है. कभी यह जाति और जमीन को लेकर है तो कभी व्यवसाय और आकृति को लेकर होते हैं. होता जरूर है और होते भी रहेंगे, किन्तु इनका धर्म से सम्बन्ध नहीं है.

आज जातिवादी कौन नहीं है? जाति, सम्प्रदाय, भाषा और क्षेत्रीय संकीर्णताओं को आधार बनाकर चुनाव में टिकट दिया जाता है, उसी जाति के लोग चुनाव-प्रचार में भेजे जाते हैं, उन्हीं से प्रभावित होकर आप भी मत देते हैं.

कर्मचारियों के चयन में भी जातिवाद से क्या आप अपरिचित है? बात कहने की नहीं, आचरण में ढालने की है. दोष हमारा-आपका है, जिसे हम-आप कभी सरकार की आरक्षण नीति में ढूँढ़ते हैं तो कभी उसके लिये धर्म को दोषी ठहराते हैं.

वैसे शास्त्रो में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है कि भगवान ने कभी मनुष्यों को विभाजित किया हो, ऊँच-नीच, छूत अथवा अछूत बनाया हो.

गीता के अनुसार संसार भर में मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- न चार प्रकार के, न तीन प्रकार, न तेरह और न सवा लाख. मनुष्य केवल दो प्रकार के हैं- एक देवताओं-जैसा, दूसरा असुरों-जैसा. या तो वह नास्तिक होगा अथवा आस्तिक. परमात्मा की ओर अग्रसर होगा अथवा माया की ओर.

प्रकृति में विश्वास वाला है तो असुरों-जैसा है और यदि परम तत्व परमात्मा के देवत्व के लिए प्रयत्नशील है तो देवताओं-जैसा है. संसार में यही दो जातियाँ हैं जो अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियों- आसुरी सम्पद् और दैवी सम्पद् पर आधारित हैं, जिनका उल्लेख गीता के सोलहवें अध्याय में है.

उस कसौटी पर आपका एक सगा भाई असुर और दूसरा देवता हो सकता है. यही कारण था कि श्रीकृष्ण के कुछ सगे रिश्तेदार असुर थे. वे स्वयं देवता थे, परमात्म तत्व में स्थित भगवान थे. योग शास्त्रो के अनुसार जाति का इतना ही स्वरूप है. बाहर न कोई जाति है और न बाँटने का तरीका ही है.

क्रमश: 12

(महाकुम्भ के पर्व पर चंडीद्वीप हरिद्वार में दिनांक 8 अप्रेल 1986 ईस्वी की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानंदजी द्वारा वर्ण-व्यवस्था का रहस्योद्घाटन)

लोकहित में http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध ‘शंका-समाधान’ से साभार. आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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