दादाजी की डायरी से

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dadaji ki diary se story by ma jivan shaifaly making india

आठवीं कक्षा की परीक्षा के दिन क़रीब थे, कोर्स भी लगभग खत्म हो गया था. हम लोग चाह रहे थे कि परीक्षा शुरू होने से पहले हमें एक हफ्ते की छुट्टी मिल जाए. हम सब मिलकर प्रिंसिपल के केबिन में पहुंचे और अपनी बात कही. प्रिंसिपल सर उम्र में काफी बड़े थे. उम्र ज़्यादा होने के बावजूद उनके चेहरे पर बहुत चमक थी. कुछ देर विचार करने के बाद उन्होंने एक प्रस्ताव रखा कि वो छुट्टी दे देंगे यदि हम सब आज घर जाकर कोई एक अच्छा काम करें और जो भी काम हमने किया वह लिखकर दूसरे दिन उनको दिखाएं.

आधे बच्चों के चेहरे पर निराशा और गुस्सा दिखाई दिया और आधे बच्चों के लिए यह एक रोमांच था. जो लोग रोज़ कुछ नया करना चाहते हैं या दैनंदिन के कार्यों से कुछ हटकर करने की चाह रखते हैं उनके लिए यह एक अच्छा काम था जो परीक्षा के दिनों की दिन भर की पढ़ाई के बाद करने को मिल रहा था.

उनका प्रस्ताव मानकर हम सब लोग घर लौट आएं. सब बच्चों के मन में ये था कि कौन सा अच्छा काम करें. खैर सबने अपने अपने हिसाब से कुछ ना कुछ किया और दूसरे दिन लिखकर आएं. हमें प्रिंसिपल सर के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी, वो ख़ुद ही हमारी कक्षा में आ गए. सबने अपना अपना अनुभव उनको कह सुनाया- किसी ने एक पन्ना भर कर लिखा था किसी ने दो पन्ने- कोई सुना रहा था कि किस तरह से उन्होंने घर की सफाई कर माँ का हाथ बंटाया, किसी ने बताया कि कैसे उसने किसी गरीब बच्चे की मदद की. किसी ने छोटी बहन को होमवर्क करने में मदद की थी, तो किसी ने पिता के काम में हाथ बंटाया था.

जब मेरी बारी आई तो मैं डरते डरते खड़ा हुआ क्योंकि मैंने न तो पन्ने भरकर कुछ लिखा था न ही किसी के काम में कुछ मदद की थी. मैंने सिर्फ़ इतना लिखा था कि कल मैंने पूरे समय अपने बुढ़े दादाजी की बातें सुनी और उनसे एक बार भी नहीं कहा कि आप यह किस्सा तीसरी बार सुना रहे हैं.

प्रिंसिपल सर अचानक अपनी कुर्सी से खड़े हो गए और ताली बजाने लगे. उनको देखकर कक्षा के सभी बच्चों ने ताली बजाई. फिर उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा और कहा- आप लोगों को एक हफ्ते की नहीं पूरी 15 दिनों की छुट्टियां देता हूं. उस समय मैं खुश तो हुआ लेकिन थोड़ा सकपकाया हुआ भी था कि क्या हो गया ऐसा!

लेकिन आज मैं उस बात को पूरी तरह समझ गया हूं कि क्यों मुझे उस दिन शाबाशी मिली, जब आज मैं 85 वर्ष का हो गया हूं और अपने कमरे में खिड़की के पास लगी अपनी कुर्सी पर बैठा रहता हूं. बहू दोनों समय चाय नाश्ता और खाना दे जाती है, बेटा ऑफिस जाने से पहले पैर छू जाता है, पोते पोतियां स्कूल जाने से पहले मिलकर जाते हैं. स्कूल से आने के बाद उनकी एक्स्ट्रा क्लासेस और टीवी, कंप्यूटर से उनको फुर्सत नहीं मिलती और मैं दिन भर बातें करता रहता हूं मेरे कमरे की खाली दिवारों से, टेबल से, कुर्सी से और अपनी डायरी से.

– माँ जीवन शैफाली

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