वर्ण व्यवस्था 10 : विद्याध्ययन के अधिकार का प्रतीक यज्ञोपवीत

गतांक से आगे…

याज्ञवल्क्य स्मृति का कहना है कि सभी प्राणी माता से समान रूप से जन्म लेते हैं. उनमें से जिनका उपनयन संस्कार कर दिया जाता है, वे द्विज हैं. आठ में ब्राह्मण, ग्यारहवें में क्षत्रिय, बारहवें में वैश्य का उपनयन होता है और जिनका संस्कार नहीं होता, वह शूद्र है.

यदि मन्त्र पढ़ने से या जनेऊ पहनने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बनता है तो क्यों नही सबके लिए मन्त्र पढ़े गये? उपवीत धारण करते समय वह मन्त्र पढ़ा जाता है-

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं यजायते: यत्सहजं पुरस्तात.
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
(ब्रह्मोपनिषद) – इस मन्त्र को पढ़ने से आठ वर्ष के लड़के को क्या मिलता है?

वास्तव में यह मात्र सामाजिक व्यवस्था थी, धर्म से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है. उन दिनों इस संस्कार द्वारा बालक को विद्याध्ययन का अधिकार दिया जाता था. बारह वर्ष वाले को शस्त्र-संचालन और रक्षा विभाग में प्रवेश दिया जाता था. जिस प्रकार आज का कोई बच्चा नेवी में चला जाता है तो कोई किसी ट्रेनिंग में और विशेषज्ञ बनकर निकलता है.

आजकल ये व्यवस्थायें सरकार के हाथ में चली गई. अध्ययन-अध्यापन, धनोपार्जन हेतु उद्योग और नौकरियाँ, रक्षा का दायित्व, योग्यता और सामाजिक समानता पर आधारित हो चला है.

राजा बदल गया, राजतन्त्र बदल गया और वह तरीका भी बदल गया कि केवल उपनयन वाला ही पढ़े. स्मृतियों में निषेध था कि शूद्र को पढ़ानेवाला, धर्म का उपदेश करनेवाला अन्धतामिस्र नरक में जायेगा. आज सभी पढ़ रहे हैं, पढ़ा रहे हैं.

बाह्य वर्ण महाराजा मनु ने बनाया और बल दिया कि वर्णों में रहने से मोक्ष मिलता है. मोक्ष के लिए घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं होती.

यदि ऐसा ही था तब स्वयं महाराजा मनु ने उस कल्याण के लिए घर क्यों छोड़ा, नैमिषारण्य में जाकर तपरत क्यों हुए? उन्हें तो राजधर्म और क्षत्रिय-धर्म का पालन करना चाहिए था.

प्राचीनकाल में शनैः-शनैः सभ्यता आयी. महाराज मनु ने उसकी व्यवस्था की. कुछ लोगों को पढ़ने-लिखने और नियम बनाने के कार्य में नियुक्त किया गया, जो ब्राह्मण कहलाये.

कुछ को शस्त्र-संचालन और सुरक्षा का भार दिया, वे क्षत्रिय कहलाये. कुछ को धन-सम्पत्ति संग्रह और खाद्य पदार्थो की आपूर्ति में लगाया, जो वैश्य कहलाये और इन सब की सेवा में नियुक्त लोग शूद्र कहे गये.

किन्तु आज महाराजा मनु और उनके अनुयायी चले गये. इस व्यवस्था को कार्यरूप देनेवाली स्टेटों का सन् 1952 में उन्मूलन हो गया, सत्ता जनता के हाथ में आ गई.

व्यवस्था बदल गई, दण्ड विधान बदल गया. पुराने कानून दफना दिए गये, कोई नाम भी नहीं लेता. नाम लेने से कुछ होनेवाला नहीं, तब इन व्यवस्थाओं की क्यों दुहाई देते हैँ? ये स्मृतियाँ समाज में एक कण्टक हैं, एक दरार हैं.

क्रमश: 11

(महाकुम्भ के पर्व पर चंडीद्वीप हरिद्वार में दिनांक 8 अप्रेल 1986 ईस्वी की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानंदजी द्वारा वर्ण-व्यवस्था का रहस्योद्घाटन)

लोकहित में http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध ‘शंका-समाधान’ से साभार. आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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