फौजें ऐसे नहीं चल सकतीं… एक दिन भी नहीं

लोग गलत पांव खुजला रहे हैं… दाल की क्वालिटी विषय नहीं है. फौज में रेस्टॉरेंट का खाना नहीं मिलता. मैंने फौज में 7 साल काम किया है… शानदार खाना भी खाया है और यह वाली दाल भी खाई है… पर बिना किसी शिकायत के.

फौज की जिंदगी में पतली दाल की तो गिनती ही नहीं है… इससे बड़े बड़े कष्ट हैं… जब रेगिस्तान की 48 डिग्री की गर्मी में पांच दिन नहाने को नहीं मिलता और जांघ में काछ लग जाता है न, या 40 डिग्री में BPET दौड़ कर बंदा बेहोश हो जाता है… वो भी पीस पोस्टिंग में… लड़ाई में नहीं… ऐसे में दाल की शिकायत किसी को दिखाई ही नहीं देती.

यह पहली बार मैंने देखा किसी को दाल का बवाल करते… वहां तो इतने बड़े बड़े बांस रखे हैं कि छोटी मोटी कील काँटी की तो कोई बात ही नहीं करता.. यह नमूना आया है कहाँ से?

विषय यह नहीं है कि तेजबहादुर यादव कैसा सैनिक था, उसका रिकॉर्ड क्या था… चाहे उसे 4 बार क्वार्टर गार्ड में सजा हुई हो, चाहे परमवीर चक्र मिला हो… व्यक्ति संस्था से बड़ा नहीं होता.

अगर किसी को फौज के अंदर भ्रष्टाचार का अंदेशा है तो उसका तमाशा बनाने के लिए वहां अरविन्द केजरीवाल को अनशन करने की इजाजत नहीं दी जा सकती.

पहला सवाल है, आपको फौज चाहिए या नहीं? अगर आपको देश की सीमाओं पर फौज चाहिए, तो आप उसमे ऐसे तमाशे करने की अनुमति नहीं दे सकते… फौजें ऐसे नहीं चल सकतीं… एक दिन भी नहीं…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY