वर्ण व्यवस्था 8 : वेद में वर्ण

गतांक से आगे…

गर्हित जाति-प्रथा के समर्थन में पुरुष सूक्त की जिस वैदिक ऋचा का उदाहरण दिया जाता है, उसकी समीक्षा भी आवश्यक है. इस सूक्त में ऋषि ने बताया कि वह परमात्मा अनन्त हाथ-पैरों, आँख तथा मुंह वाला है.

उन्होंने पुनः कहा- वह परम पुरुष चार पैरों वाला है, जिसके एक चरण में संपूर्ण ब्रह्माण्ड- सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, पर्वत, समुद्र और नक्षत्र हैं. ऋषियों ने कितने ही प्रकार से उस प्रकार परमपुरुष की कल्पना की- ‘कथिता व्यकल्पयन्’.

उन्होंने पुनः कल्पना की कि उस परमात्मा के पैर के बराबर कौन? जांघ के बराबर कौन? भुजाओं के बराबर कौन और मुख के बराबर कौन है? अगली ऋचा में उन्होने कल्पना की-

ब्राह्मणस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत
उरु तदस्य यदवैश्य: पदभ्यां शूद्रोsजायत्॥

अर्थात् पद में शूद्र है, जाँघ में वैश्य है, बाहु में क्षत्रिय है और उस परमात्मा के मुख सहस ब्राह्मण हैं.

भला जो सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है, उसके हाथ-पैर कहाँ? जब मनु को दर्शन दिया तो ‘बिस्वबास प्रकटे भगवाना’. (मानस१/१४५/८)- विश्व में जहाँ प्रकृति थी, मनु के लिए पुरुषत्व में विलीन हो गई.

एक बार जिन प्रभु के चरणों को धोने से गंगाजी निकल पड़ी – जो तीनों लोकों को तारने की शक्ति रखता हैं, जिन चरणों से भरत लिपटे रहे, जिन चरणों में लक्ष्मी जी एकाधिकार से बैठी हैं कि कोई अनाधिकारी छूने न पाये, जिन चरणों का रज मस्तक पर धारण कर ऋषि-मुनि अपने को धन्य मानते हैं…

जिन प्रभु का चरणोदक लेकर हम-आप कृतार्थ हो जाते हैं, भगवान के ‘पावनं पावनानाम्’ उन्ही चरणों में से एक ऐसा कीटाणु निकला कि यदि वह भगवान को छू दे तो भगवान गन्दे हो जाएं, वह है- शूद्र! यह धोखा नहीं तो क्या है? यह कुरीतियों और रूढ़ियों का कृत्य है, अशिक्षित जनता के बीच फैलाया हुआ विचार है. शिक्षा के आते ही मूर्खों को चलाने वाला यह तरीका आक्रोश में बदल गया है.

काशी विश्वनाथ मन्दिर में हरिजन-प्रवेश पर एक धर्माचार्य ने यह घोषणा की- ‘शंकर जी नष्ट हो गये, भगवान भ्रष्ट हो गये, अब उस मन्दिर में जाने से अधोगति में जाओगे. हमने नया मन्दिर बना दिया. इसमें दर्शन करो. इसमें शंकर जी शुद्ध हैं.’

कितनी भयंकर भ्रांति है. शास्त्र का एक भी सूत्र नहीं कहता कि बाहर जातियों का बँटवारा भगवान ने किया. हाँ, हम-आप अवश्य बाँट ले रहें हैं. तीन से तेरह और तेरह से सवा लाख हो जाते हैं.

भाई-भाई तो लड़ते ही हैं. अफ्रीका में यह फूट अधिक है, कबीले अधिक हैं और अफ्रीका आज भी गुलाम है. वही कबीला सिस्टम यदि आपके ऊपर रहा तो ग़ुलामी आपके सिर पर मँडरा रही है.

वस्तुतः इस वैदिक ऋचा का वही आशय है जो योगेश्वर ने गीता में व्यक्त किया है. भजन की आरंभिक अवस्था में सभी शूद्र हैं, परमात्मा के चरण स्थल पर हैं.

उन चरणों की सेवा करते-करते भजन पथ में अपने पाँवों पर खड़ा होने की क्षमता आ जाती है तो हम- आप वैश्य हैं, मानो शिशु जाँघो पर खड़ा होने लगा. उस समय आत्मिक संपत्ति को अर्जित करने की ओर हम अग्रसर है.

और क्षत्रिय- क्षय कहते हैं काटने को, त्री माने तीनों गुण. इन तीनों गुणों से निर्मित प्रकृति को काटने की क्षमता आ गई तब वही साधक क्षत्रिय है. ‘बाहू राजन्य: कृत’- उस समय वह इष्ट के भुजाओं के बल पर होता है, अर्जुन की तरह, और जब ब्रह्म की अनुभूति प्राप्त कर लेता है, उस समय परमात्मा उसमें प्रवाहित हो जाता है.

वह ब्रह्म में प्रवेश पा लेने की सारी योग्यता वाला है. इसलिए ‘ब्राह्मण’ है. उस महापुरुष की बुद्धि मात्र यंत्र है. उसके माध्यम से परमात्मा ही निर्णय देता है, बोलता है इसलिए ब्राह्मण को परमात्मा का मुख कहा गया है.

भगवान सर्वांगीण पवित्र हैं किन्तु उन प्रभु के अंगों में से कोई अंग-विशेष मनुष्य के हित में विशेष सहायक और पवित्र है तो चरण और उसी चरण-स्थल पर उपजता है घृणात्मक शूद्र! कैसे संभव है? सुधीजन विचार करें.

क्रमश- 9

(महाकुम्भ के पर्व पर चंडीद्वीप हरिद्वार में दिनांक 8 अप्रेल 1986 ईस्वी की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानंदजी द्वारा वर्ण-व्यवस्था का रहस्योद्घाटन)

लोकहित में http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध ‘शंका-समाधान’ से साभार. आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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