नक्सलियों, आतंकियों, तस्करों के साये में जीने की आदी बंगाल की जनता को मंज़ूर नहीं होगा राष्ट्रपति शासन

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पश्चिमी बंगाल!!! वही न, जहाँ कलकत्ता है… अच्छा वही, जहाँ कुछ महीने पहले मालदा में दंगा हुवा था… वही न, जहाँ धूलागढ़ है जहाँ हिन्दूओं को मारा था… बस इतनी ही जानकारी रखने वाले लोग वहां राष्ट्रपति शासन लगाने की चीख-पुकार मचा रहे हैं…

पश्चिमी बंगाल में कभी भी राष्ट्रपति शासन नहीं लगाना चाहिए… पश्चिमी बंगाल इतना बिगड़ चुका है कि उसको पटरी पर लाने के लिए 15-20 साल लगेंगे…

ख़बरों में मालदा, धूलागढ़ और कलकत्ता जानने वालों… वहां और भी कुछ जगह हैं… मुर्शिदाबाद, पुरुलिया, मदनीपुर, जीबनतल्ला, हसनाबाद… नाम सुना है कभी… वहीँ है नक्सलबाड़ी…

नक्सलबाड़ी वही, जहाँ से तीन लोगों ने उग्र और बंदूकबाज़ वामपंथ की नींव रखी… 1967 में कुछ लोगों को नहीं संभाला गया जो आज आधे भारत में समानान्तर व्यवस्था चलाने का ताकत पैदा कर चुके हैं…

वहां की आबादी 1967 से लेकर अब तक इतनी बुरी तरह अव्यवथित हो चुकी है और भ्रांतियां लेकर जी रही है कि कोई भी अन्य बात उनको समझ ही नहीं आती…

पाकिस्तान की डरपोक और अय्याश सेना से तो कोई भी छोटी सी अनुशासित सेना आराम से आत्मसमर्पण करवा लेती… वो किसी के भी रहते हो जाता, लेकिन इंदिरा गाँधी को फ़र्ज़ी में ‘दुर्गा’ स्वरुप दे दिया गया.

1967, फिर 1971 में तत्कालीन भारतीय सरकार ने जो निकम्मापन दिखाया उससे भारत को जो बहुत बड़ा नुकसान हुआ, बहुत पीड़ा मिली… 44 वर्षों तक बांग्लादेश से सीमा न तय कर पाए जिससे भारत में अनवरत गैर कानूनी लोग आते रहे और माहौल अपने अनुसार बनाते रहे.

1967 में नक्सलबाड़ी में नक्सल आंदोलन को सत्ता के लिए वामपंथियों द्वारा हवा देकर और इंदिरा गाँधी सरकार द्वारा वामपंथियों द्वारा सत्ता समझौता के तहत जान बूझकर इससे मुंह मोड़ लेना, भारत के इतिहास की बड़ी भूल और देश के साथ धोखा था.

इंदिरा गाँधी में दूरदर्शिता का अभाव और किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने के बदले इस आंदोलन को जान बूझकर हवा देने और भविष्य न समझने की भूल को भुगत रहा है भारत…

पूर्वोत्तर और पश्चिमी बंगाल के पूरे मामले के लिए जिम्मेदार तथाकथित ‘दुर्गाशक्ति’ इंदिरा गाँधी से इस पर कोई सवाल नहीं हुए –

1. नक्सल आंदोलन, जिसने पूरे पश्चिमी बंगाल को बम बारूद के ढेर पर बिठा दिया और लाखों हत्याओं, जिसमें अनगिनत सामूहिक हत्याएँ शामिल रहीं, उस पर समय रहते कार्यवाही क्यों नहीं की… ये आंदोलन लोगों की लाशों पर कांग्रेस और वामपंथियों का फ्रेंडली मैच था जिसका जवाब कोई नहीं मांगता…

2. जब लड़ाई के बाद बांग्लादेश वजूद में आया तो 4000 किलोमीटर की सीमा को निर्धारित क्यों नहीं किया गया… इसके 2015 तक नहीं निर्धारित होने से आतंकवाद, उग्रवाद, नक्सलवाद को खूब बढ़ावा मिला… गैरकानूनी व्यापार जैसे ड्रग तस्करी, मानव तस्करी, पशु तस्करी को प्रोत्साहन मिला.

राज्य की वामपंथी सरकारें और अब की सरकार, इनके पैसों के दम पर हमेशा से राज करती रहीं. यही नक्सलवादी, उग्रवादी और तस्कर इनकी सेना है – बंगाल की जनता इनके आगे नतमस्तक है.

पहले वो इनसे डरते थे, अब इनको अपनी नियति मान चुके हैं. ये इतने मिल चुके हैं अंदर तक कि वहां की जनता इनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकती. यही कारण है कि TMC तभी फली-फूली और जीती, जब इन नक्सलवादियों, उग्रवादियों और तस्करों का समूह इनसे जा मिला.

बंगाल को आज की हालात में लाने के लिए इंदिरा गाँधी और वामपंथियों से आज तक किसी ने कोई प्रश्न नहीं किया… ममता बनर्जी क्या है… कुछ नहीं…

जब ये नक्सलवादी, उग्रवादी और तस्कर कमजोर होके धीरे-धीरे ख़त्म होंगे तो ममता बनर्जी और वामपंथी गैंग स्वतः ही ख़त्म हो जाएंगे…. इसके लिए वहां जनता को, जिसके जीवन में भ्रष्टाचार की तरह ये भी घुल मिल गए हैं इनसे मुक्त कराना पड़ेगा.

इसके लिए कुछ दिन का राष्ट्रपति शासन नहीं बल्कि लंबे समय की चोट… slow poisoning करनी होगी और वो आर्थिक सुधारों से होगा… वही आर्थिक सुधार, जिनके खिलाफ ममता बनर्जी खड़ी है… क्योंकि आर्थिक सुधार होने का नतीजा उसको पता है.

इनसे दूर हटके भी जीवन जिया जा सकता है – वहाँ की जनता को ऐसा सोचने वाला बनाना पड़ेगा… अभी राष्ट्रपति शासन लगाने से इन लोगों के साथ घुली और जीवन जीने की आदी जनता तुरंत इन लोगों के समर्थन में खड़ी हो जाएगी.

इसका फायदा उठाएंगे वामपंथियों और कांग्रेसियों के टुकड़ों पर पलती मीडिया तथा बुद्धिजीवी… हो हल्ला मचांएगे और माहौल ममता बनर्जी के पक्ष में खड़ा कर देंगे… इस सबसे चुनाव में माहौल केंद्र सरकार के विरुद्ध ही जाएगा.

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