इंदौर: लज्ज़त का दूसरा पर्याय, रसेन्द्रियों के लिए स्वर्ग

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बात 2003 की है, हम कॉलेज के फर्स्ट इयर में थे.. पढ़ाई लिखाई से कोस दो कोस तो दूर रहते ही थे मगर मस्ती, मटरगश्ती में सबसे आगे..

उन दिनों जो याद है वह है सस्ते टिफिन का बेकार खाना जो दिन में दो दफे दरवाजों पर हाज़िर रहता और अधिकतर भरा ही वापस जाता..
मसला यह था कि एक हम लोगों की चटोरी ज़ुबान और दूसरा सामने मसालों में महकता इंदौर शहर..

सुबह पोहों की भाप में कहीं नफासत से छिड़का गरम मसाला, या कहीं प्याज उसल की झन्नाटेदार तरी, अनारदाने, धनिए के चटख रंग और वो मुँह में घुलने वाली पोहाई नरमियत.. क्या कहने..

पास के कड़ाहों पर हिंग महकाती सुर्ख कचौरियाँ और अपने मसालेदार भरावन से फूलकर कुप्पा हुए लज्जतदार समोसे.. जो अपनी अपनी लाल हरी चटनियों में सजे, इश्कबाजी में कुछ कमतर ना थे..

वहीं पोहे के कागज पर रसभरी केसरिया जलेबी के जलवे या तो कोई इंदौरी ही बता सकता है या वह जो इंदौर में आकर इंदौर के रस में आकंठ डूब गया हो..

इंदौर आकर आलू की कचौरी और साबूदाने की खिचडी.. भुट्टे की किस, और दही बड़े, गोलगप्पों के साथ जहाँ रात के राजा थे.. वहीं रेल में, रबड़ी गुलाबजामुन मालपुओं ने बहुत आसानी से शिकंजी, रबड़ी, औटाए दूध को अपनी बिरादरी में शामिल कर लिया था..

रात को राजबाड़े या सराफा पर अदर की रबाडी चाय की लज्जत जीभ पर पिघलती तो अँदर की शबै मालवाई ठंड भी मखमली गुलाबी हो जाती..

वहीं छप्पन दुकान, जो हमारे लिए छप्पन पकवानों की कतार थी.. विजय चाट हाउस की हाजिरी यंग तरंग से गुजरकर कॉफी की चाकलेटी सीप पर ठहरती ..क्या क्या नहीं था यहाँ ..
यादों की चलती फिरती कतारें, ठेलों के सौ बनते बिगडते नाम. .सौ कभी ना भूलने वाले स्वाद..

राजस्थानी, कलकत्तई, बिहारई, बंगाली.. सारे स्वाद यहाँ थे..
औऱ वो कोने पर सजी फूलों की दुकान, जहाँ से इस भुक्कड प्रेमी ने गर्लफ्रेंड को प्रपोज़ का पहला गुलाब दिया था.. और आखिरी में टाइटन शो रूम से पत्नी को पहले वेलेंटाइन का गिफ्ट.. (दोनों को गोलगप्पे खिलाने के बाद..)

ये इंदौर था जिसने इसके सम्मोहन से किस किस को ना अपना बना लिया, कह पाना मुश्किल है. नॉन वेज डिशेज की किस्मों की एक पूरी तालिका हमारे जेहन से नदारद होने के बावजूद खाने की इतनी बिरादियाँ थी कि हमारे लिए इंदौर शहर लज्जत का दूसरा पर्याय था.. हमारी रसेन्द्रियों के लिए स्वर्ग..

चाइनीज़, पावभाजी, साउथ इंडियन, कॉन्टिनेंटल, पिज़्ज़ा, बर्गर, आइसक्रीम फालूदे को मैं इंदौरी नहीं मानता.. मगर इंदौर ने इनके भी स्वाद का समावेश अपने आप में बखूबी किया.. और इनके इंदौरी वर्जन ने अपनी छाप भी छोड़ी..
चाहे वह पनीर पिज्जा हो या तले हुए मोमोज़.. शहर की गलियों में अनगिनत ज़ायके बने बिगड़े भूले बिसरे…

यह इंदौर शहर ही था जहाँ प्रयोग धर्मिता ने अपने ना जाने कितने किर्तीमान रचे होंगे..
जरा सुनिए.. सेंव का पराठा, आलू की कचौरी, खमन भेल, सेंडविच खमन, शकर पराठा, नागौरी शिकंजी, रबड़ी कुल्फी, चॉकलेट सेंडवीच, रास्बेरी सेंडविच, तले हुए हॉट डाग (छोले के साथ..)
..उफ् क्या गिनाऊँ क्या छोडूं..

इस क्रम में हमारे लिए सबसे अद्भुत था “कृष्णा ढाबा”
विजय नगर के सत्य साईं चौराहे से देवास की तरफ बढ़ते हुए सीधे एबी रोड पर पहले चौराहे से जरा दाँये पेट्रोल पंप के बिल्कुल पीछे.. जाकर..
लाल मार्बल के सस्ते मेज और तब एक मेज पर कम से कम तीन आर्डर लगाए जाने की सुविधा, सुविधा क्या यही नियम था जनाब.. इससे कम में वहाँ जमी भीड़ क्या निपटती होगी..

पहले पहल हम में से एक रंगरूट उसकी खबर लाया..
उन दिनों हम अपनी जेबों में केवल पार्श्वनाथ पान सेंटर की गिलौरियों के लिए पैसे बचे रहते ..
महीने के आखिरी रविवार का दिन था और टिफिन की छुट्टी..
छह लड़कों ने कुल जमा करे साठ रूपये.. और सातवे के साथ प्लान किया गया कि वह नंदानगर जाए..अपनी घरेलू कढ़ी खिचड़ी की जुगाड के लिए..
इधर हमारा रंगरूट कृष्णा ढाबे की और चला.. शर्त थी कि ऊपर के पैसे की अदायगी वह करेगा.. हमारी निकल पड़ी छह व्यक्तियों का खाना ढाई सौ तीन सौ से क्या कुछ कम में आता सो यह हमारे लिए फ्री की पार्टी थी ..
ढाबे की लज्जत जीभ पर चटका मार रही थी..
नियत समय से थोडा जल्दी ही रंगरूट लौटा..

हाथ की थैली भरी पूरी थी.. कंजूस इतना खर्चा कर गया. .हमने उसकी पीठ ठपठपाई और सर आँखों बैठाया.. पश्चात थैलियाँ खोली गई..
मटर पनीर तपेलियों में तैर गया..
पकौडे वाली कढी..
शुद्ध घी की तड़के वाली दाल..
बटर पनीर..
चावल और एक एक बलिश्त की कोई दस एक तंदूरी रोटियाँ..
स्वाद ऐसा कि पूछिए मत..
पेट भर जी हलाक करने के बाद तृप्त हुए तब पैंदे में तह की हुई बिल की पर्ची मिली पचत्तर रूपये मात्र..
हमने कहाँ यह क्या है बे..
रंगरूट बोला भइये ये बिल है आज का..

हमने आँखे फाड़ी और तस्दीक करने अगले रविवार कृष्णा ढाबे चले..
वह तब का दिन था जिसके बाद वह हम लोगो का स्पेशल ठिया हो गया.. शुद्ध घी, दूध और पनीर से लबरेज बेहद स्वादिष्ट और सस्ता वह ढाबा आज भी हमारी इंदौर की याद में अपनी खास जगह रखता है..
वह विस्मय सिर्फ इंदौर में ही घट सकता था, जब मात्र पचत्तर रूपयो में हमने अपने वक्त का सबसे लजीज खाना खाया था…

– किंशुक शिव

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