वर्ण व्यवस्था 6 : न ब्राह्मण: न क्षत्रियो न वैश्यो न शूद्रः चिदानन्दरूपं शिवो केवलोsहम्

गतांक से आगे…

विज्ञान का मतलब कोई कल्पना नहीं, इष्ट हृदयदेश से रथी होकर जिन संकेतों से मार्ग-दर्शन करते हैं उस प्रत्यक्ष अनुभूति (ईश्वरीय अनुशासन) का नाम विज्ञान है. पूज्य महाराज जी प्रायः कहते थे कि हो! उस स्थान पर भगवान ने हमको बचा लिया. भगवान ने हमें यह बताया. यह आशीर्वाद दिया.

हमने पूछा- क्या भगवान भी बातें करते हैं? उन्होंने बताया- हाँ हो! भगवान वैसे बात किया करते हैं जैसे हम और तुम आपस में बैठकर बातें करें, घण्टों बातें करें और क्रम न टूटे. कुछ देर बाद बोले, ‘काहे घबरात है, तोहू से बतिअइहैं.’

वास्तव में जिस परमात्मा की हमें चाह है और जिस स्तर पर हम खड़े हैं, हमारी श्रद्धा ऐसी हो कि वह परमात्मा उसी स्तर पर उतर आवे, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ और मार्गदर्शन करने लगें.

जब तक भगवान हृदय-देश से रथी होकर मार्ग-दर्शन न करने लगें तब तक पूर्ण निवृत्ति दिला देने वाली साधना का श्रीगणेश अभी हुआ ही नहीं. कुछ दिनों बाद वैसी कृपा मिलने भी लगी जैसा गुरुदेव ने कहा था.

इसी अव्यक्त का बोलना विज्ञान है.

यह हमारे मन का ज्ञान नहीं, बेज्ञान का ज्ञान जिसे परमात्मा का संचार कहते हैं. इष्ट के चरणों में बिना लगाये स्वाभाविक डोरी लग जाती है.

ब्रह्म में प्रवेश दिला देने वाली सारी योग्यता स्वभाव में ढल जाती है. उस समय. ‘ब्रह्म कर्म स्वभावजम्’ यह ब्राह्मण श्रेणी का कर्म किसने दिया? आपके स्वभाव में ही वह जन्मा और स्वभाव परिवर्तनशील है.

ब्राह्मण श्रेणी भी दोषमुक्त नहीं है. ‘सर्वारम्भा हि दोषेण ध धूमेनाग्निरिवावृता:’ (गीता, १८/४८)- धुएँ से अग्नि के समान सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से आवृत्त हैं.

ब्राह्मण श्रेणी का ही कर्म क्यों न हो, सात्विक गुण मात्र शेष ही क्यों न हो, जब तक गुण जीवित हैं, प्रकृति जीवित है तब तक माया कामयाब हो जायेगी.

इन चारों सोपानों से ऊपर ब्रह्म में स्थिति मिल जाने पर पर ‘न ब्राह्मण: न क्षत्रियो न वैश्यो न शूद्रः चिदानन्दरूपं शिवो केवलोsहम्’

वह न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है और न वैश्य है, न शूद्र. उसका चित्त परमानन्दस्वरूप है. कैवल्यस्वरूप शिवमात्र शेष रह जाता है.

क्रमश: 7

(महाकुम्भ के पर्व पर चंडीद्वीप हरिद्वार में दिनांक 8 अप्रेल 1986 ईस्वी की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानंदजी द्वारा वर्ण-व्यवस्था का रहस्योद्घाटन)

लोकहित में http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध ‘शंका-समाधान’ से साभार. आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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