व्यंग्य : चुनाव और दंगल

dangal and election satire

यूं तो व्यंग्य लिखने के लिये विषय की तलाश अब कोई मुश्किल काम नहीं रहा, सुबह का अखबार पलटने की देर है, चाय पीते पीते ही बाप बेटे के दंगल, चुनावी नगाड़े, नोट बंदी की क्रियायें, भक्तो की प्रतिक्रियायें, मफलर वाले की हरकतें, पप्पू की शरारतें, या सिद्धांतो की इबारतें बुला बुला कर कहती हैं, हो जाये एक व्यंग्य. संपादकीय पृष्ठ पर जगह मिलना पक्का है.

लिखने के लिये मूड बना मतलब आफिस के लिये देरी हुई, सो इन सब विषयों के व्यंग्य लेखों की भ्रूण हत्या कर, खुद से बचते बचाते बाथरूम की तरफ भागो भी कि नौकरी पर जाना है समय पर, तो मोबाइल की घंटी बड़े प्यार से बुला लेती है, मोबाइल खोलने का मतलब होता है व्यंग्य के लिये विषय वर्षा.

व्हाट्सअप मैसेज की बाढ़ बताती है कि हम कितने लोकप्रिय हैं. गुड मार्निंग के संदेशो के साथ सुंदर चित्र, जिंदगी जीने की कला सिखाते संदेश, अपनी व्यंग्य दृष्टि कहती है लिख सकते हो. शाश्वत व्यंग्य लिख सकते हो.

इस सबसे भी बचो तो पत्नी जो मेरी सबसे बड़ी व्यंग्य प्रेरणा है,नख शिख व्यंग्य लिखने का आव्हान करती नजर आती है. फिर भी मै धृष्ट नहीं लिखता, सोचता हूं कि पिछली चार व्यंग्य की किताबें लिखकर ही भला क्या और किसको सुधार लिया? लेकिन आज अपने भाई अनूप शुकल जी की जुगल बंदी वाले लेख ने कुछ नया सा अहसास दिलाया और मैने तय किया कि चुनाव और दंगल पर तो अपन भी लिखेंगे.

भारत में चुनाव किसी दंगल के पर्याय ही हैं. ऐसा दंगल जिसमें दो ही नहीं कई कई पहलवान एक साथ एक ही अखाड़े में कूद पड़ते हैं, रेफरी होता है मेरा रामभरोसे!

रामभरोसे को नहीं जानते आप?  वही मुआ अदना आदमी जिसे वोट देने का अधिकार मिल जाता है 18 का होते ही. जो केवल वोट देकर जीता सकता है, चार चुकन्दरो में से किसी एक को. जीतने से पहले सभी रामभरोसे से तरह तरह के वादे करते हैं और जीतते ही उसी से दंगल खेलने लगते हैं.

रामभरोसे हर बार चुनाव में बलिष्ठ से बलिष्ठ पहलवानों को अपने जजमेंट से चित्त कर चुका है. दुनिया उसके जजमेंट का लोहा मानती है. और यह भी शाश्वत तथ्य बन चुका है कि चुनावों के बाद जो दंगल मचता है, रामभरोसे और जीतने वाले के बीच उसमें बार बार लगातार, राम भरोसे खुद को ठगा ठगा सा महसूस करता है. वह मन ही मन तय करता है कि अगले चुनाव आने दो ऐसा जजमेंट दूंगा कि उसे ठगने वाले को पटखनी पर पटखनी खानी पड़ेगी. क्रम अनवरत है. दुनिया इसे लोकतंत्र की ताकत जैसे बेहतरीन शब्दो से नवाजती है.

Any Way, देश में एक बार फिर से मिनी आम चुनावों का माहौल है. छोटे बड़े कई राज्यों के योद्धा रामभरोसे के अखाड़े में हरी, नीली, भगवा लंगोटें पहन पहन कर जाने के लिये तैयारियां करते दिख रहे हैं. किसी की साइकिल के परखच्चे खुल गये हैं तो किसी की झंडी लहरा रही है .कोई परेशान है कि दंगल की तैयारियों के लिये जो विटामिन एम बूंद बूंद कर जोड़ा गया था, वह पूरा का पूरा फिंकवा दिया है सरकार ने. नये नये गठजोड़ बन रहे हैं, पहलवान एक दूसरे को दांव पेंच सिखाने के समझौते कर रहे हैं.

फिर भी सब आत्म मुग्ध हैं, सबको भरोसा है कि रामभरोसे का फैसला इस बार बस उसके ही पक्ष में होगा. सब चीख चीख कर बता रहे हैं कि अगर वो जीत गया तो रामभरोसे के सारे दुख दर्द खतम हो जायेंगे.

रामभरोसे अच्छी तरह समझ चुका है कि “कोई नृप होये हमें का हानि, चेरी छोड़ न हुइहैं रानी”. वह भी मजे ले रहा है. अखबारों को मसाला मिल रहा है, न्यूज चैनल्स को टी आर पी. आगे आगे देखिये होता है क्या? देश आदर्श चुनाव संहिता के साथ जी रहा है. रामभरोसे कनफ्यूज्ड है वह सोच रहा है कि जब इन दिनो बिना नेता के अधिकार के भी सरकार चल सकती है, वह भी आदर्श के साथ तो फिर भला इस अखाड़े की जरूरत ही क्या है?

ज्योतिषी अपनी अपनी भविष्य वाणियां कर रहे हैं, परिणामो के सर्वे चल रहे हैं. पर शाश्वत सत्य है और इसमें कतई कोई व्यंग्य नहीं है कि जीतने के लिये अखाड़े में खुद उतरना होता है, मेहनत करनी पड़ती है. तभी गीता फोगट को स्वर्ण मिलता है, दंगल बाक्स आफिस पर हिट होती है या रामभरोसे का भरोसा जीता जा सकता है.

राम भरोसे को खुद भी किसी जीतने वाले पहलवान से कोई बड़ी उम्मीद नहीं रखनी चाहिये उसे राम के भरोसे बने रहने से बेहतर खुद अपने बल बूते पर अपना अखाड़ा जीतने के लिये संघर्ष करना ही होगा.

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