श्री एम : प्राणी और प्रकृति

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कुछ किताबें मुझ तक पहुंचाई जा रही है ताकि उसमें उल्लेखित बातों का मुझे भी ज्ञान हो, और जिन तक मेरे द्वारा वो बातें पहुंचाई जानी है उन्हें भी ज्ञान हो. ऐसे में हाथ आई गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तक कल्याण का  ज्योतिषतत्त्वांक, जिसे पढ़कर प्रकाशित की एक नई श्रृंखला शकुन-शास्त्र पर, जिसमें बताया गया है कि प्रकृति आपको किस तरह का संकेत देती है जो आपको समझना होते हैं और उसके अनुसार कार्य करना होते हैं.

मैं कोई दावा तो नहीं करती कि मैं इसे पूरी तरह समझती हूँ लेकिन जितना भी अनुभव कर सकी हूँ उसका पालन करते हुए आज इस स्थिति तक पहुँच पाई हूँ कि मैं इतने संकेत समझ लेती हूँ कि कोई कार्य मुझे करना है या नहीं करना है. आप में से कई इस बात पर यकीन नहीं करेंगे लेकिन मुझे किस समय कौन सा लेख या खबर अपनी इस वेब साईट के लिए देनी है इस बात तक का संकेत या शकुन मिलता है और उसका पालन करते हुए आज मेरे पाठकों की संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है.

और कई बार यह संकेत भी प्राप्त हुए कि अब वेबसाइट के साथ कोई दुर्घटना घटनेवाली है जिसके लिए मुझे तैयार रहना है… क्योंकि घटनाओं का पता लग जाने से उसे पूरी तरह टाला तो नहीं जा सकता, हाँ हम उसके लिए खुद को तैयार कर लेने में सक्षम हो जाते हैं….

ये मात्र पूर्वाभास है, इसे आप भविष्य जान लेने से ना जोड़ें… या अन्तर्यामी हो जाने का भ्रम ना पाले…

2008 से पहले यदि कोई परिचित मुझे उपरोक्त बातें करता हुआ सुन लेता या लिखा हुआ पढ़ लेता तो दांतों तले उंगली दबा लेता… ये वही शैफाली है जो कभी भगवान् के सामने दीया तक नहीं जलाती थी… बाबाओं और साधु सन्यासियों के पास जाने वालों का मज़ाक उड़ाती थी. आज लोग उसका मज़ाक उड़ाते होंगे जब वो बाबाओं और सन्यासियों की बातें करती हैं…. लेकिन सिर्फ मैं जानती हूँ पूरी तरह आस्तिक वही हो सकता है जिसने नास्तिकता को पूरा पूरा जिया हो…

तो बात 2008 के पहले की थी मुझे कुत्तों से बहुत डर लगता था… इतना कि जिस गली में कुत्ता दिख जाता उस गली में मैं पाँव नहीं रखती थी…

ऐसे में एक रिश्तेदार ने घर में पाल लिया जर्मन शेफर्ड, नाम ऑस्कर. मैं उनके घर गयी हुई थी और उन्होंने शरारत कर दी.. कुत्ते को खुला छोड़ दिया…. वो मुझ पर दौड़ता हुआ आया और  चढ़ने की कोशिश करने लगा… मेरे हाथों में कुत्ते के नाखून से खरोंचें आ गईं… मैं उन लोगों पर ज़ोर से चिल्लाई और उनके घर से बाहर आ गयी… वो बहुत करीबी रिश्तेदार थे फिर भी मैंने कहा आज के बाद आपके घर में पाँव नहीं रखूँगी…

खैर जैसे तैसे मामला ठंडा हुआ अगली बार जब भी जाती वो अपने कुत्ते को पहले ही बाँध कर रख देते…

फिर आया अगस्त 2008, तब तक स्वामी ध्यान विनय का जीवन में प्रवेश हो चुका था… हम  अभी तक मिले नहीं थे लेकिन फोन से लगातार संपर्क में रहते थे…. ध्यान विनय कुत्ते वाला किस्सा जानते थे और उस कुत्ते का नाम भी… ध्यान विनय ने कहा अब ऑस्कर कुछ नहीं करेगा… मुझसे परिचय के बाद आप बदल चुकी हो अब वो आपका दोस्त है, रक्षक है और सेवक भी..

मैं समझी नहीं लेकिन जब अगली बार उनके घर गयी तो ऑस्कर मेरे पास आया … पास आकर अपनी पूंछ हिलाने लगा… मेरे पैरों के पास लोट लगाने लगा… शेर जैसी ऊंचाई वाले ऑस्कर ने जब उछलकर अपने दोनों पैर मेरे कन्धों पर रख दिए आप यकीन नहीं मानेंगे उसका वज़न न झेल पाने के कारण मैं थोड़ा पीछे की ओर गिरते गिरते बची लेकिन वो एक खेल था जिसे सिर्फ मैं और ऑस्कर जानते थे….

अब रिश्तेदारों का हाल देखने लायक था उन्होंने तुरंत उसे पकड़ कर बाँध दिया… कि मैं कहीं दोबारा गुस्सा न हो जाऊं लेकिन मैंने भी सामान्य रहना ही उचित समझा ताकि उन्हें शक न हो कि कोई बहुत बड़ा परिवर्तन आया है…

ऐसे ही इंदौर में ही एक शाम पैदल किसी के घर जाना था, जिस जगह जा रही थी वहां बहुत अँधेरा था और लोग भी बहुत कम थे… और जैसा कि उन दिनों होता था मैं जबलपुर में रह रहे ध्यान विनय के साथ फोन से लगातार संपर्क में रहती थी… उन्होंने कहा… चार्ली को आवाज़ लगाओ… मैंने पूछा कौन चार्ली… उन्होंने कहा आवाज़ तो लगाओ… मैंने चार्ली को पुकारा और एक काले रंग का कुत्ता कहीं से निकल कर आया और मेरे साथ साथ चलने लगा…

जब तक मैं उस घर तक पहुँच नहीं गयी जहां मुझे जाना था वो साथ ही रहा और जब मैं घर के अन्दर चली गयी तब भी वो गेट पर खड़े होकर मुझे बुलाता रहा… जो लोग घर में कुत्ता पालते हैं या जो कुत्तों की भाषा समझते हैं वो समझ सकते हैं कि जब कोई कुत्ता दुलार चाहता है या आपको पुकारता है तो कैसी आवाज़ निकालता है. फिर मैंने उस घर की खिड़की झांककर उसे चले जाने का इशारा किया. फिर भी वो बहुत देर तक कुनमुनाता रहा फिर थोड़ी देर बाद चला गया…


श्री एम की पुस्तक में माई माँ का ज़िक्र है जो हमेशा कुत्तों से घिरी रहती थीं… उस किस्से को पढ़ने के बाद यह विचार पुख्ता हुआ कि हमारे सनातन धर्म की व्याख्या के अनुसार केवल गाय ही हमारी माता नहीं, कुत्ते भी हमारे बहुत निकट संबंधी हैं…. बल्कि प्रकृति का हर जीव जंतु…

लेकिन जाते जाते एक बात और… कभी कोई गाय आपको बैठी हुई दिखे तो ध्यान देना उसका एक या दोनों पैर हमेशा मुड़े रहते हैं… उसके आगे के दोनों पैर कभी भी एक साथ आगे की ओर सीधे नहीं होते… जिस दिन ऐसी गाय दिख जाए  जिसके दोनों पाँव आगे की ओर सीधे हो… उसके दोनों पाँव छूकर आशीर्वाद ज़रूर लेना… ये एक अच्छा शकुन होता है… और वो सामान्य सी दिखने वाली गाय भी केवल गाय नहीं होती…
मुझे जीवन में एक ही बार मिली, वो भी ध्यान विनय की उपस्थिति में जबलपुर में, वो गाय गर्भवती थी और जैसे ही मैंने उसे देखा उसके दोनों पाँव छूकर आशीर्वाद लिया… उसके अगले महीने मुझे खुशखबरी मिली थी कि मैं गर्भवती हूँ…

(इन्टरनेट पर यदि किसी को ऐसी गाय की तस्वीर मिले तो कृपया मुझे अवश्य भेजें)

– माँ जीवन शैफाली 

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