कोई चाणक्य तुम्हें गुलामी से नहीं निकाल सकता, अगर नहीं बन सकते चंद्रगुप्त

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कई दोस्त कह रहे हैं कि मैं अब उत्तर प्रदेश के परिवार में मची घमासान पर नहीं लिख रहा.

‘अ’समाजवादी बाप-बेटे पर अपना समय लगाना मूर्खता है. उनमें मेरी कोई दिलचस्पी ना पहले कभी थी, ना आज है और ना आगे कभी होगी.

मेरा संदर्भ आम जन से हैं और रहेगा. मैं सिर्फ उन्हें ही देखकर उनके लिए ही कुछ लिखने का प्रयास करता हूँ.

और इस संदर्भ में अपने दो दिन पहले लिखे पर ही कायम हूँ. काश कोई एक भी इसे पढ़कर समझ जाये तो लिखना सार्थक होगा.

“ये जो सड़कों पर अखिलेश के समर्थन में लोग आँसू बहा रहे हैं, छाती पीट रहे हैं, आक्रोशित हो रहे हैं, चीख रहे हैं और नारे लगा रहे हैं… उनके चेहरों को गौर से देखें, इनमें हिंदुस्तान की एक तस्वीर नजर आयेगी और साफ़ होंगी कई गुत्थियां, जो इतिहास के पन्नो में दफ़न है. हम कुछ कुछ समझ पायेंगे कि हम क्यों गुलाम हुए थे और फिर सदियों तक गुलामी को खुद ही क्यों ओढ़े रहे.

ये वो भीड़ है जो हमेशा अपने नायक की तलाश में रहती है और उनके द्वारा शासित और शोषित होने में ही अपना उद्धार और उत्थान मानती है. ये वही लोग हैं जिनके कारण लालू पहले राबड़ी और फिर अपने होनहार (???) बच्चों को गद्दी पर बिठा पाये. कहा जाता है कि बिहार सबसे अधिक आईआईटी, आईआईएम और आईएएस देता है, मगर उनपर शासन कौन करता है? इसका जवाब इस भीड़ में छिपा है.

इस भीड़ की मानसिकता के कारण ही अब्दुल्ला वंश कश्मीर में इतने दशक से राज करता रहा तो नकली ग़ांधी स्वतन्त्रता के बाद लगातार दिल्ली की सत्ता के शीर्ष पर बने रहे. क्या कारण है कि इंदिरा की मौत से उठी सहानुभूति ने उतनी सीट कांग्रेस को दी जितनी आजादी के बाद भी नहीं मिली थी.

अर्थात हम सत्ता पर भी भावना में बह कर किसी को बिठाते हैं उसके शासन के पैमाने पर नही. आज अगर राहुल एक आम आदमी की तरह कोशिश करें तो एक साधारण सी नौकरी आसानी से नही पा सकते मगर सबसे पुरानी पार्टी के निर्विरोध नेता बन सकते हैं.

हिंदुस्तान में पुत्र मोह धृतराष्ट्र में ही नहीं था बल्कि बाल ठाकरे जैसे भी इसके शिकार हुए. यहाँ लखनऊ में बड़े तरीके से दुर्योधन को पांच साल के कुशासन के सभी कालिख से बचा लिया गया और उन्हें पहला राजनीतिक जीवन दान दिया उनके उस पिता ने, जो समाजवाद की बात करते हैं. इससे बड़ी हास्यास्पद स्थिति और क्या हो सकती है अलग-अलग नाम से हिंदुस्तान में परिवारवाद स्वतन्त्रता के बाद भी खूब फला फूला.

आज सुबह से जो अखिलेश को मुलायम के ऊपर भारी दिखाया जा रहा है, यह इस भीड़ की इसी मानसिकता की एक और अगली कड़ी है. ये कमजोर लोगों की भीड़ बेहद असुरक्षित भी हैं लेकिन बेहद स्वार्थी भी.

ये भीड़ जानती है कि मुलायम बूढ़े हो रहे हैं और एक बूढ़े का कोई बहुत लंबा भविष्य नहीं होता जबकि अखिलेश युवा हैं उनके पास राज करने के लिए अभी पूरा जीवन है, ऐसे में अगर किसी को आगे भी सत्ता की मलाई खानी है तो वो अखिलेश के पास मिलेगी. वर्ना रातो रात बेटा बाप से बड़ा कैसे हो जाता है?

सत्ता की मलाई खाने की इस चाहत को हर राज परिवार अच्छी तरह दुहता है. वो जानता है इस सत्ता लोलुप भीड़ में भावनाओं का तड़का कैसे लगाना है. बस आप को यह खेल खेलना आना चाहिए, फिर चाहे आप जो करें सब माफ़ है.

यहाँ भी तो यह भुलाने की कोशिश की जा रही है कि बुलन्दशहर में क्या हुआ था. ये भीड़ कितनी आसानी से तेजी से फैलते कैराना को भुला देती है और फिर उसी को सत्ता सौंपने के लिए सड़कों पर नारे लगाती है जिन्होंने मथुरा किया.

यही सब कारण है जो ममता जैसी राजनेता भी हिंदुओं के पिटने को नजरअंदाज़ कर देती हैं, वो जानती हैं हिंदुस्तान की इस भीड़ की कमजोर मानसिकता.

विश्व में क्या कोई आधुनिक और विकसित देश अपने यहाँ परिवारवाद को स्वीकारता है? मगर पूरे हिंदुस्तान में हम अब भी इसे गले लगाये हुए हैं.

जब तक हम मुलायम के बाद अखिलेश में अपना नायक ढूँढ़ते रहेंगे तब तक हर धृतराष्ट्र अपने दुर्योधन को सत्ता सौपता रहेगा.

अगर राम राज्य चाहते हो तो महाभारत करो, जहां कोई अपना नही कोई पराया नहीं, कृष्ण सिर्फ सत्य के साथ हैं और हर गुनाह करने वाले को उसकी सजा देने को तैयार मगर तीर तो अर्जुन को ही चलाना होगा.

अगर चन्द्रगुप्त नहीं बन सकते तो कोई चाणक्य तुम्हे तुम्हारी गुलामी से नहीं निकाल सकता. बहरहाल देश बदल रहा है आगे भी बढ़ रहा है मगर पूरी तरह आज़ाद होने में अब भी कुछ समय शेष है.”

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