निजी टेलिकॉम कंपनियों को उपकृत कर रहे BSNL कर्मी!

BSNL_speed test

BSNL अर्थात भारत संचार निगम लिमिटेड दूर संचार सेवाओं में देश की श्रेष्ट संस्था मानी जाती है. 1199 रूपये प्रति माह दीजिये और कोम्बो प्लान के अन्तर्गत अनलिमिटेड हाई स्पीड 60 जी बी इन्टरनेट लीजिये और साथ में पूरे हिन्दुस्तान में कहीं भी किसी भी कम्पनी के लेण्ड लाइन या मोबाईल पर चौबीसों घण्टे बेरोक टोक अपने लैण्ड लाइन नम्बर से मन चाही बात कीजिये.

यह सुविधा इस कारण दी है कि एअर टेल और अन्य कम्पनियों ने कस्टमरों को लुभावनी सुविधा का लालच देकर और विज्ञापन के हथकण्डे अपनाकर बी एस एन एल के मार्केट में सैंध लगा दी है.

बी एस एन एल की लुटिया डुबोने में सबसे अधिक भूमिका उसके तकनीकी कर्मचारियों की है. यह निष्कर्ष चित्र में वर्णित इन्टरनेट के स्पीड टेस्ट के नतीजों से प्रमाणित हो रहा है. दो एम बी पी एस की स्पीड का पैसा चार्ज करने वाली सरकारी बीएस एन एल की स्पीड 192.168.1.1 के नेटवर्क पर कभी भी पूरी नहीं नापी गई. हमेशा लो स्पीड ही मिलती है.

जबकि पीले कोष्टक में वर्णित 192.168.2.25 नेट वर्क का ब्यौरा है ,जो कि टिकोना कम्पनी सिर्फ 700 रुपये प्रति महिने में पांच एमबीपीएस से ज्यादा की स्पीड दे रही है.

आश्चर्य की चीज यह है कि टिकोना का अपना कोई देशव्यापी नेटवर्क नहीं है वह बी एस एन एल से लीज लाइन किराऐ से लेकर उसको ही उपभोक्ताओं का बांट रहा है.

जरा सोचिए अपनी मातृ संस्था को चूना लगाकर भारत संचार निगम के तकनीकी कर्मचारी बाहरी निजी संस्थाओ को मदद करके खुद के पैर पर कुल्हाडी क्यों मार रहे है. परिणाम स्वरूप लोग बी एस एन एल के टेलीफोन कनेक्शन धड़ल्ले से कटवाते जा रहे हैं और निजी संचार कम्पनियां फलती फूलती जा रही हैं.

लगता है अगर इसी रफ्तार से कोई माँ अपने भूखे बच्चे को भूखा रखकर उसके हिस्से के दूध को पड़ोसन के मोटे तगड़े बच्चे को पिलाती रहेगी, तो उसका अपना बच्चा कितने दिन जिन्दा रहेगा? कहीं ऐसा न हो भारत संचार निगम के इन तकनीकी कर्मचारियों की गैर जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली या यों कहें कि इस तकनीकी भ्रष्टाचार के कारण एक दिन BSNL का दिवाला निकल जाए और उसके सभी कर्मचारी बेरोजगार होकर सड़कों पर आबारा घूमने को मजबूर हो जावें.

पुनश्च :

आज दोपहर मैं टेलीफोन के आफिस में पहुंचा. कई अधिकारियों से मिला. पर जब मुझे प्रकरण की गहराई का पता लगा तो मैं आश्चर्य चकित हो गया. मेरे ब्राड बैण्ड कनेक्टिविटी में 22 नवम्बर 2016 तक कोम्बो प्लान 845 और 98 चालू था. 22 नवम्बर के बाद कस्टमर केयर अधिकारी की सलाह पर मैंने प्लान 1199 में परिवर्तन का आवेदन दिया.

इस प्लान में अनलिमिटेड हाई स्पीड इन्टरनेट के साथ किसी भी नेटवर्क के मोबाईल या लेण्ड लाईन पर डायल करके पूरे भारत में कहीं भी शून्य चार्ज पर बात चीत बिना किसी काल की समय सीमा के सांथ की जा सकती है. प्लान परिवर्तन के आदेश 22 नवम्बर 2016  को हो गए. नये प्लान की बिलिंग भी 22  नवम्बर से चालू हो गई.

तकनीकी सेक्शन ने प्लान 845, और 98 को बन्द करने के आदेश का तो तत्काल पालन कर दिया पर नए प्लान 1199 में परिवर्तन करने के आदेश पर अमल नहीं किया. पूरे अठ्ठाईस दिन बाद यानि 20 दिसम्बर को नया प्लान कम्प्यूटर सिस्टिम में बदला गया. इन 28 दिनों में कोई प्लान अमल में नहीं होने के कारण बिल तो सामान्य टेलीफोन की दरों पर जमा करा लिया गया परन्तु इन्टर नेट की गति किसी पेसेन्जर गाड़ी से भी लचर हो गई.

एक ओर तो मार्केट में 4G हाई स्पीड जिओ इन्टर नेट की धूम है और दूसरी तरफ 28 दिन बाद नया प्लान इम्प्लीमेन्ट होने के बाद इन्टरनेट स्पीड 2G के जमाने की भी नहीं दी जा रही है.

चूंकि मैं स्वंय इन्टरनेट की बारीकियों से भली भांति परिचित हूं इस कारण जब मैंने संबन्धित अधिकारियों से विस्तार से चर्चा की तो पहले तो मुझे लगा कि वे प्रकरण में कुछ छुपा तो रहे हैं, पर जब मैंने घुमा फिराकर तकनीकी भाषा की शब्दावली में बहस की तो तुरन्त ही गडबडियों की पोल पट्टी खुल गई. नया प्लान इम्प्लीमेन्ट करने की जिम्मेदारी जिस तकनीकी कर्मचारी की थी उसने लेतलाली करके अपडेट नहीं किया, क्योंकि अक्सर ऐसे कर्मचारी या तो आरक्षित वर्ग के हैं और उन पर कर्मचारियों की युनियनों का पूरा साया है. किसी भी बडे अधिकारी की इतनी जुर्रत नहीं है कि ऐसे कर्मचारियों से समय पर कोई काम करा सके. उनकी मर्जी है काम करें तो ठीक नहीं तो राम मालिक. BSNL के जिम्मेदार आदमी के इस उवाच में उसकी मजबूरी और परेशानी साफ झलक रही थी.

अधिकारी की दूसरी विवेचना सुनकर मेरे कान खडे हो गए. उसने बताया कि फील्ड में इन्टरनेट की स्पीड और सतत सप्लाय करने का ठेका निजी लोगों के हाथ में दिया गया है. यही लोग मार्केट में चल रही निजी इन्टरनेट सप्लाय करने वाली प्राईवेट कम्पनियों से सांठ गाँठ करके इधर उधर के बी एस एन एल के ब्रॉड बैण्ड की स्पीड बढाते घटाते रहते हैं.

दलील यह दी जाती है कि लीज लाईन की शर्तों के अनुसार निजी प्राईवेट कम्पनियों को लाईसेन्स में लिखी शर्तों के मुताबिक पूरी हाई स्पीड देना अनिवार्य होता है , और जब सर्वर से स्पीड ज्यादा नहीं मिलती तो इधर उधर के बी एस एन एल के उपभोक्ताओं के इन्टरनेट की स्पीड पर कैंची चलाना पडती है. अफसर ने दबी जुबान यह आखिर स्वीकार कर ही लिया कि फील्ड में काम करने वाले प्राईवेट लोगों को बी एस एन एल से जितनी धनराशि मिलती है उससे कई गुना ज्यादा वजीफा इन लोगों को निजी इन्टनेट सप्लायर और टेलफोन कम्पनियां नियमित देती रहती हैं जिससे कि वह भारत संचार निगम के नेटवर्क में खराबी करते रहें और परेशान होकर कस्टमर सरकारी नेटवर्क से पिण्ड छुडाकर निजी नेटवर्क से जुड जाए.

आखिर मेरी शंका सही सिद्ध होती जा रही है कि भारत संचार निगम के कर्मचारी अपने पैरों पर कुल्हाडी मार ही रहे हैं.

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