वर्ण व्यवस्था 3 : यज्ञ का अर्थ है चिन्तन की विधि और उस विधि को कार्यरूप देना है कर्म

गतांक से आगे…

अब वह यज्ञ क्या है जिसे करना ही कर्म है? योगेश्वर श्रीकृष्ण यज्ञ की विशेषता बताते हैं कि इस यज्ञ से देव तत्व की वृद्धि करो. दैवी सम्पद् ज्यों-ज्यों बलवती होगी, त्यों-त्यों तुम्हारी प्रगति होगी. इस प्रकार क्रमशः परस्पर उत्थान करते-करते परम कल्याण को प्राप्त हो जाओ. अतः यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है जो परम कल्याण को सुलभ करता है.

उस यज्ञ में किया क्या जाता है? इस पर अध्याय चार में कहते हैं- अर्जुन! बहुत से योगीजन श्वास का प्रश्वास में हवन करते हैं. इन्द्रियों को संयत कर, मन को विषयों से समेट कर एक इष्ट के ध्यान में लगाते हैं. साधना और सूक्ष्म होने पर श्वास-प्रश्वास की गति रोककर प्राणायाम परायण हो जाते हैं. प्राणों की गति का याम हो जाता है.

श्वास नहीं प्राणों का, श्वास में उठने वाले संकल्प-विकल्पों का निरोध हो जाता है. न भीतर के संकल्प उठते हैं और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश कर पाते हैं. मन के अन्तराल में उठने वाली तरंगों का ही दूसरा नाम संकल्प है. इस मन के निरोध के साथ ही परिणाम निकल आता है.

‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्. (गीता ४/३१)

पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, यज्ञ के अंत में शेष उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी सनातन शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है. अर्जुन! यह सम्पूर्ण यज्ञ मन और इन्द्रियों की क्रिया से सम्पन्न होनेवाले है, केवल मन और इन्द्रियों के संयम से ही सम्पन्न होते हैं.

उसी यज्ञ को उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि ‘यज्ञानां जपयज्ञोsस्मि’ (गीता १०/२५) तो जौ-तिल-घी-वेदी इत्यादि भौतिक द्रव्यों से जो किया जाता है क्या वह यज्ञ नहीं है?

श्रीकृष्ण कहते हैं (अध्याय ४ के ३९वें श्लोक में) कि अर्जुन! भौतिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाला यज्ञ अत्यन्त अल्प है, प्रारम्भिक शिक्षा के लिए प्रोत्साहन मात्र है और जो अभी श्रीकृष्ण ने बताया वह यज्ञ सबका सब केवल मन के संयम द्वारा होता है तथा परिणाम में ब्रह्म का दिग्दर्शन करा देने वाला है.

अब बाह्य किसी चीज से आपकी श्वास का निरोध होता हो तो कीजिये, प्राणों की गति का आयाम होता हो तो कीजिए! किसी हरकत से इन्द्रियों का दमन होता हो तो कीजिए!

कदापि नहीं होगा. यह जब होगा तब चिन्तन से ही होगा. अतः यज्ञ का मतलब है- आराधना. यज्ञ का अर्थ है- चिन्तन की विधि और उस विधि को कार्यरूप देना ‘कर्म’ है.

योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन! कर्म क्या है? अकर्म क्या है और विकर्म क्या है? इस विषय में बड़े-बड़े विवेकी पुरुष भी मोहित रहते हैं इसलिए मैं इसे बताता हूँ, जिसको जानकर तू संसार-बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा. कर्म, संसार-बंधन से छुटकारा दिलाता है. उस कर्म का अर्थ है, आराधना को कार्यरूप देना.

अर्जुन! जो पुरुष कर्म में अकर्म देखता है अर्थात् चिन्तन तो करता है किन्तु यह नहीं मानता कि करनेवाला मैं हूँ, चिन्तन तो गुणों के द्वारा प्रेरित होकर हमें करना पड़ रहा है, इष्टदेव हृदय से रथी होकर हमसे कराते हैं, मैं तो एक यन्त्र मात्र हूँ. इस प्रकार जो कर्म में अकर्म देखता है और ऐसा देखने की क्षमता आ जाना ही अकर्म है.

इस अकर्म को कर्म देखता है, समझता है कि मुझसे सही कर्म पार लग रहा है. इष्ट के आदेशों पर समर्पित वह व्यक्ति मनुष्यों में बुद्धिमान है और वही सम्पूर्ण कर्म का करनेवाला है.

क्रमश: 4

(महाकुम्भ के पर्व पर चंडीद्वीप हरिद्वार में दिनांक 8 अप्रेल 1986 ईस्वी की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानंदजी द्वारा वर्ण-व्यवस्था का रहस्योद्घाटन)

लोकहित में http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध ‘शंका-समाधान’ से साभार. आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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