तो आप चुप रहिये, आपसे नहीं हो सकती कविता

दोस्तों आज की कविता, कविता नहीं तुकबन्दी होती है
मानव के मनोभावों की हदबन्दी होती है
क्योंकि
ह्रदय जनित भाव अव्यक्त होते हैं, अमूर्त होते हैं
क्योंकि वे स्वत:स्फूर्त होते हैं
कोई भी भाव व्यक्त होकर चेतना शून्य हो जाता है
ससीम और परजीवी होकर निर्जिव हो जाता है
वह कोरा शब्दजाल होता है
तथाकथित कवि के मन का मलाल होता है
बड़े से बड़ा कवि भी अपने मनोभावों को पूरी जुबान नहीं दे सकता,
कारण!

भावाभिव्यक्ति हेतु शब्दों के लाले
साथ ही साथ
दिमाग पर लगे पूर्वाग्रह के ताले!
यहीं आकर असली कवि मरताहै
और
मौका परस्त स्वार्थी कवि जनमता है
जो आलोचना व सच्चाई से डरता है
पद, पैसा व पदवी को वरता है
दरबारी कविता करता है

हालाँकि
दरबारी कविता से किताबें हैं भर चुकी
रीतिकालीन कवियों की कलमें हैं थक चुकी
वर्तमान की तो ललकार है !
कौन बांध सकता है दिल के दरिया में उठते सैलाब को
कौन दे सकता है शब्द, मन के मन्थर स्पन्दन को,
दलितों के क्रन्दन को

दे सको तो शब्द दो
दहेज की वेदी से उठते चित्कार को
होटलों की दहलीज पर जूठे पत्तल चाटते बच्चों की दुत्कार को
दे सको तो शब्द दो
भूखों और नंगों को
चिथड़ों में लिपटे
सड़को और गलियों में
रेंगते भिखमंगों को!

उन आंसुओं को
जो सिसकते शिशुओं के गालों पर सूखे हैं
जेठ की तपती दोपहरी में
ममता की गोदी में भूखे हैं!

हो गये न चिन्तित, खड़े हो गये कान!
मिल गयी मिट्टी में कवि होने की झूठी शान
पड़े न भावाभिव्यक्ति हेतु शब्दों के सूखे
नहीं नहीं ये कारण नहीं
लगता है
आप हैं पद, प्रशंसा व पैसे के भूखे!

तो आप चुप रहिये
आपसे नहीं हो सकती कविता
आप की लेखनी से नहीं निकल सकती
पतित पावनी सरिता!

दोस्तों ! अब हम पहलू बदलते हैं
चलो जरा दूसरी राह चलते हैं
कविता जितनी जुबान से होकर गुजरेगी
उतनी ही अकविता होती जायेगी
एक प्रदूषण युक्त सरिता होती जायेगी
जो कालान्तर में एक
गन्दे नालें में परिवर्तित हो जाती है!

फिर भी कुछ कविताएं होती हैं गंगा जैसी सरिता
जिसमें प्रदूषण को तिरोहित करने की होती असीम क्षमता!
ऐसी कालजयी रचनाएं वही कवि है करता
जो आलोचनाओं से कभी नहीं डरता!
ऐसा कवि सदियों में एक होता है
जो अपनी कविता से क्रान्ति के बीज बोता है
वह क्रान्ति सामाजिक हो या आर्थिक हो या धार्मिक
मगर होती जरूर है!

आप इसे अवश्य मानेंगे
अगर आप तुलसी, टैगोर, बंकिम, इकबाल और भारती को जानते होंगे
अपने महिमा मंडित अतीत को पहचानते होंगे!

क्या इस कविता में मैं
अपने मनोभावों को उचित अभिव्यक्ति दे पाया हूं
यह मेरा आपसे आखिरी सवाल है

यह जानते हुए भी की आपका ना में जवाब है!

–  डॉ. राजेन्द्र भारती ‘राज’

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