वर्ण व्यवस्था 2 : गुण के आधार पर कर्म के चार विभाग

गतांक से आगे

यह सच है कि गीता के अनुसार वर्ण भगवान् की सृष्टि है किन्तु गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो मनुष्य-मनुष्य में दरार डालता हो. योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि आप स्त्री हों या पुरुष, शूद्र हों अथवा वैश्य, कोई पाप-योनि वाले वाले कीट-पतंगादि ही क्यों न हों, जो सर्वभाव से मुझे भजता है, वह मुझे परम प्रिय है.

इतना ही नहीं ‘अपि चेत्सुदुराचारो’- दुराचारियों का सिरमौर ही क्यों न हो, यदि ‘भजते मामनन्यभाक्’- अनन्य माने अन्य न अर्थात् एक मेरे सिवाय अन्य किसी देवी-देवता को न भजकर केवल मुझे भजता है तो ‘साधुरेव स मन्तव्य:’ वह साधु ही मानने योग्य है क्योंकि ‘सम्यग्व्यवसितो हि सः’ (९/३०)- वह यथार्थ निश्चय से लग गया है.

इसका परिणाम बताते हैं कि वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और सदा रहने वाली शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है. पुण्यात्मा तो लगते ही हैं, मूलतः गीता पापियों के लिए उद्धार की पद्धति है. मनुष्य-मनुष्य में किंचित् भी भेद का स्थान नहीं देती.

अध्याय चार में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं’- चार वर्णों की सृष्टि मैंने की.

तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँटा?

श्रीकृष्ण कहते हैं, नहीं, ‘गुणकर्म विभागशः’- गुण के आधार पर कर्म को चार भागों में बाँटा.

अब यदि कर्म समझ लें तो बँटवारा भी सही समझ जायेंगे, क्योंकि जो वस्तु बाँटी गयी है वह है ‘कर्म ‘.

कोई कहता है खेती करना कर्म है तो कोई व्यवसाय को, देशसेवा-समाजसेवा को, अपनी नौकरी को कर्म बताता है. कोई कहता है ‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः’ (गीता १८/४५)- अपनी-अपनी ड्यूटी करो.

वस्तुतः योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी तो कुछ कहा होगा कि कर्म क्या है? यदि ज्यों का त्यों मान लें कि श्रीकृष्ण ने किसको कर्म कहा तो आपको वर्ण के सम्बन्ध में कभी भी भ्रान्ति नहीं होगी.

गीता के तीसरे अध्याय में वे कहते हैं, ‘नियतं कुरु कर्म त्वं’- अर्जुन! तू निर्धारित किये हुए कर्म को कर. सिद्ध है कि कर्म बहुत से हैं, उनमें से कोई कर्म निर्धारित किया गया है. उस कर्म की विशेषता बताते हैं कि कर्म न करने से तेरी शरीर-यात्रा भी सिद्ध नहीं होगी.

अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है जो उस पुरुष की शरीर-यात्रा को सिद्ध कराती है, पूर्ण कराती है. यह आत्मा जन्म-जन्मान्तरों से शरीरों की यात्रा ही तो करता चला आ रहा है. कीट-पतंग, देव-दानव तथा जड़-चेतन से गुजरता चला आया है. वस्त्र बदलता है, किन्तु यह कर्म इस प्रकार की नश्वर शरीर-यात्रा को पूर्ण कर इस आत्मा को वह अचल स्थिति दिलाता है जिसके पश्चात् शरीरों की यात्रा नहीं करनी पड़ती.

अब वह निर्धारित कर्म है क्या?

इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता के अध्याय ३/९ में कहते हैं, ‘यज्ञार्थात् कर्मणो’- अर्जुन! यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है. वह हरकत कर्म है जिससे यज्ञ पूर्ण होता है. इस यज्ञ के अतिरिक्त संसार में जो कुछ किया जाता है, दिन-रात जिसमें लोग व्यस्त रहते हैं, क्या वह कर्म नहीं है?

श्रीकृष्ण कहते हैं नहीं ‘अन्यत्र लोकोsयं कर्मबन्धनः’ – यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक का एक बन्धन है, इसी लोक में बाँधकर रखने का उपाय है.

‘तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचरः॥’- इसलिए अर्जुन, उस यज्ञ की पूर्ति के लिए तू संग-दोष से रहित होकर भली प्रकार कर्म का आचरण कर. अतः ‘कर्म’ ऐसी विधा है जिसका आचरण संग-दोष के रहते नहीं किया जा सकता.

क्रमश: 3

(महाकुम्भ के पर्व पर चंडीद्वीप हरिद्वार में दिनांक 8 अप्रेल 1986 ईस्वी की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानंदजी द्वारा वर्ण-व्यवस्था का रहस्योद्घाटन)

लोकहित में http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध ‘शंका-समाधान’ से साभार. आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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