VIDEO : आमिष से निरामिष होने की यात्रा

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मैंने जिस परिवार में जन्म पाया, उस परिवार में हम एक साथ 40 लोग रहते थे… संयुक्त परिवार … “खाने” और “पीने” के शौकीन… मटन तो क्या मुर्गा, अंडा, झींगा यहाँ तक कि केकड़ा तक मैंने ऊँगलियाँ चाट-चाट कर खाया है, खाया क्या, खूब खाया है. जब घर में 40 लोग एक साथ मिलकर खाते होंगे तो उस आयोजन का अंदाज़ आप खुद लगा सकते हैं कि कितने मुर्गे और बकरे हलाल होते होंगे… वो भी हर हफ्ते, कभी-कभी हफ्ते में दो बार…

अब बात करते हैं यात्राओं की. जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ जीवन में सबसे अधिक प्रभाव डालती है आपकी यात्रा. ये बात अलग है तब इस बात को अनुभव नहीं कर पाती थी लेकिन आज बचपन में की गयी किसी भी यात्रा का मेरे जीवन पर पड़े प्रभाव को मैं स्पष्ट रूप से समझ सकती हूँ.

तब मैं कक्षा 11वीं में थी और गुजरात यात्रा पर थी. एक दिन मेरे फूफाजी मुझे साइकिल के पीछे बैठाकर Meat खरीदने के लिए साथ ले गए. घर पर तो पापा ही खरीदकर लाते थे हम सबके लिए, इसलिए मुझे पता ही नहीं था कि वहां होता क्या है….

बस फिर क्या था, फूफाजी ने मुझे मटन शॉप के काउंटर पर खड़ा किया और खुद अन्दर चले गए, ये कहते हुए कि आज तुमको इतने स्वादिष्ट कबाब खिलाऊंगा जैसे जीवन में न कभी खाए होंगे, न खाओगी…

मैंने जैसे ही काउंटर पर खड़े होकर नज़रे उठाईं तो काउंटर पर बकरे का कटा हुआ सर देखा. डर के मारे दो कदम पीछे खिसक गयी, मेरे पीछे खिसकते से ही खटाक की आवाज़ आई, पीछे मुड़कर देखा तो बुचर हाथ में खून से लथपथ हथियार लिए खड़ा था और नीचे बकरे का कटा हुआ धड़ पड़ा था…. जो कट जाने के बाद भी हिल रहा था… अपनी तो सिट्टी-पिट्टी गुम…

जैसे-तैसे खुद को वहां उल्टी करने से रोका और अपने हृदय में आँखें खोल रहे बुद्ध को कहा- “अमां छोड़ो जी, तुम सिद्धार्थ ही बने रहो, तुम्हारा हृदय परिवर्तन मुमकिन नहीं… उंगलियाँ चाट-चाटकर नॉन वेज खाने वाली बिल्ली, सौ चूहे क्या सौ बकरे खाकर भी हज पर नहीं जा सकेगी….”

घर पहुंचकर फूफाजी ने स्वादिष्ट मटन और कबाब बनवाए और मेरे सामने रख दिए, ‘खाओ मेरी प्यारी भतीजी ऐश करो….’, मैं जानती हूँ, वो दिन और आज का दिन, मैं मटन को मुंह में डालना तो दूर छूकर भी नहीं देख सकी.

अब मटन खाना तो छोड़ दिया, पर चिकन का स्वाद हमेशा कभी न निकल सकने वाली गाली की तरह जुबान पर ही रह गया… सोचा- अरे कहाँ इतना बड़ा बकरा और कहाँ छोटी-सी मुर्गी का बच्चा… इतना तो खाया जा सकता है..

फिर ये भी हुआ कि हम 40 लोगों का संयुक्त परिवार जब अलग होकर एकल परिवार में तब्दील हुआ तो हमारे परिवार में आधे से ज्यादा लोगों के मन में नॉन वेज के प्रति विरक्ति आ गयी…. बहुत सारे लोगों ने नॉन वेज खाना छोड़ दिया…

लेकिन मैं यदा-कदा, घर के बाहर जब निकलना होता, तो चिकन खा लेती थी… फिर आठ साल पहले जीवन में प्रवेश हुआ विघ्नकर्ता यानी स्वामी ध्यान विनय का.

तब इंदौर छोड़कर जबलपुर आए हुए मुझे दो-चार दिन ही हुए थे इसलिए हम लोग घर से अलग एक छोटा सा कमरा किराए से लेकर रहते थे… वो कमरा जिस मकान में था, वो हाजीबाबा का मकान कहलाता था….

ध्यान से नई-नई मुलाक़ात और अपने हाथों से बना खाना खिलाने की उमंग ऐसी थी कि जीवन में पहली बार… अकेले ही किसी चिकन शॉप पर गयी, चिकन कटवाकर खरीद कर लाई… कभी खुद तो ये काम किया नहीं था सो चेहरा दूसरी तरफ घुमाकर अपने हाथों से धोया, काटा…….. और फिर पकाया….

खाने के समय ध्यान विनय घर आए तो ‘सरप्राइज़’ कहते हुए स्वादिष्ट चिकन उनके सामने रख दिया….. अब ध्यान बाबा तो ध्यान बाबा है… बिना अनुभव के ज्ञान देना वो जानते नहीं…. तो उन्होंने मुझे बताया नहीं कि बरसों पहले वो नॉनवेज खाना छोड़ चुके हैं, और मेरा दिल रखने के लिए खा रहे है…

सो उन्होंने खाया और अपन ने भी खाया…. खाना खाकर हाथ भी नहीं धो पाई थी कि सीने के मध्य में एकदम से दर्द उठा और पीड़ा इतनी भयंकर हो गयी कि मैंने बिस्तर पकड़ लिया…. सांस तक लेना मुश्किल….

ध्यान ने तब कहा- “मेरे पास आ गयी हो तो ऐसे आभामंडल में प्रवेश कर गयी हो जहां नॉन वेज खाना वर्जित है, ऊपर से हम जिस घर में रह रहे हैं वो हाजी बाबा का मकान कहलाता है, जो एक पहुंचे हुए मुस्लिम योगी थे…”

उन्होंने कहा, “वैसे तो योगी का कोई मज़हब नहीं होता लेकिन चूंकि उन्होंने मुस्लिम परिवार में जन्म पाया था इसलिए उन्हें हम मुस्लिम योगी ही कहेंगे… जैसे आपने एक ऐसे परिवार में जन्म पाया जहां नॉन वेज खाया जाता था और ये खाना तब तक आपके लिए वर्जित नहीं था जब तक आप उस परिवार का हिस्सा थी…”

ध्यान कहते रहे, “अब चूंकि आप मेरी अर्धांगिनी हो गयी हैं तो प्रकृति के जो नियम मुझ पर लागू हो रहे हैं वो आप पर भी लागू होंगे.. अब भी नॉन वेज खाना, न खाना आपकी स्वतंत्रता है, बलपूर्वक मैं कोई काम नहीं करवाता और आपके अनुभव आपको खुद को अर्जित करना है…”

ये मेरा पहला-पहला अनुभव था इसलिए अभी जिस तरह आप मेरी ऐसी बातों पर हंस रहे हैं, वैसे ही थोड़ी सी शंका मेरे मन में भी थी… तो शाम को मैंने ध्यान विनय से कहा अब ये बचा हुआ चिकन फेंकने से तो रहे, खा पीकर ख़त्म कर देते हैं, अब तो दर्द भी ठीक हो गया है.

ध्यान बाबा ने हमेशा की तरह रहस्यमयी मुस्कान दी… मैंने रात में फिर बचा हुआ चिकन खाया और फिर वही भयंकर पीड़ा सीने में हुई… उस दिन के बाद से कान पकड़ लिए और कभी चिकन नहीं खाया, कभी किसी के अनुरोध पर कोशिश भी की तो उसके दुष्परिणाम ही मिले… कभी मल के साथ लहू निकला तो कभी उल्टी के साथ…

क्योंकि मैं नास्तिक, जब तक पूरी तरह से अनुभव ग्रहण नहीं कर लेती, कभी भी आस्तिकता के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती….

अब एक आख़िरी बात, इतने सारे दुष्परिणामों के बाद भी कहीं सुना था कि अंडे मांसाहार में नहीं आते तो पिछले साल एक शाम को ससुरजी की अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए मैंने अंडे खरीदे, बच्चों को खिलाए और पहला कौर मुंह में डालते से ही लगा जैसे अन्दर से कोई मुझे रोक रहा है…

मैंने उसे नज़रअंदाज़ करते हुए खाना ख़त्म किया और कुछ देर बाद जो उल्टियां शुरू हुई वो दूसरे दिन सुबह तक जारी रही… शरीर, मन और मस्तिष्क सब कुछ निढाल…. अण्डों से भी इतनी अधिक घिन्न हो गयी कि अब तो कान पकड़ लिए…. बस… अब जीवन में कभी नॉन वेज नहीं, अंडा भी नहीं…

मेरी सारी समस्याओं के ‘कारण’ और ‘समाधान’ जिनके पास होते हैं, वो है स्वामी ध्यान विनय… एक बार फिर उनके चरणों में समाधि लगाई… हे प्रभु! अब ये कौन सी लीला दिखा रहे हो… अंडे तो मैं इतने वर्षों से खाती आ रही थी फिर अब जाकर मेरा ह्रदय परिवर्तन क्यों हुआ?

तब ध्यान ने ध्यान दिलाया कि “पिछले दिनों अध्यात्म गुरू दिनेश कुमार जी ने जो ध्यान विधि बताई है वो आप कर रही हैं… आप क्या इसे सिर्फ व्यायाम समझ कर कर रही थीं?”

उन्होंने कहा, “जिस हनुमान तत्व या हमारे वातावरण में उपस्थित दैवीय तत्वों का आह्वान करते हुए आप जिस तरह से ध्यान करती हैं उस वजह से आपके आभामंडल समेत शारीरिक और मानसिक अवस्था में भी परिवर्तन आया है. आइना तो कभी आप देखती नहीं, लेकिन मैं तो आपके अन्दर और बाहर हो रहे परिवर्तन को अनुभव कर रहा हूँ ना…”

ध्यान बोले, “यहाँ अंडा खाना वर्जित है या नहीं, ये आप खुद तय कीजिये लेकिन ये बात तो निश्चित तौर पर आप भी कह सकती हैं कि आपके शरीर के साथ-साथ अब आपके मन ने भी उसे ग्रहण करने से मना कर दिया है…”

ये इतनी लम्बी कहानी पिछले वर्ष Meat पर Ban लगने पर लिखी थी… तो मीट ban करने, न करने से कोई फर्क नहीं पडेगा, जिस को खाना होगा वो कैसे भी खा लेगा और जिनको नहीं खाना होगा वो स्वत: ही खाना छोड़ देगा. नॉन वेज खाने, न खाने का निर्णय बहुत व्यक्तिगत होता है उस पर BAN लगाकर आप उसको और प्रोत्साहित ही करेंगे.

दूसरी बात ईद पर पशु हत्या की… तो मैं अपने प्रिय हिन्दू भाई-बहनों से यही कहूंगी, आप किस मुंह से बकर ईद का विरोध करते हो? जब तक एक भी हिन्दू आमिष आहार लेता रहेगा… ईद पर पशु हत्या होती रहेगी…

और जिस मोहल्ले में एक भी हिन्दू खरीददार नहीं होगा, उस मोहल्ले में मुस्लिमों को मटन शॉप खोलने में यकीनन भय लगना चाहिए…

खैर बात को सकारात्मक समापन देते हुए कहूंगी… ये ‘दिनेश’ नाम मेरे जीवन में दो बार आया और दोनों बार मेरे मन के सिद्धार्थ को बुद्ध में तब्दील कर गया क्योंकि बचपन में जिस फूफाजी के कारण मीट खाना छोड़ा था उनका नाम भी दिनेश है और जिनकी वजह से अंडे भी खाना छूट गया उनका नाम भी दिनेश है…

तो आइये दर्शन कीजिये अध्यात्म गुरु दिनेश कुमार के और जानिए उनसे एक विशेष ध्यान विधि.

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