हिन्दुओं की जान की कीमत ना 2002 में थी और ना 2016 में है

2002 की फरवरी की एक सुबह थी. ऑफिस जाने के लिये बस का इंतजार करते हुए अखबार वाले की दूकान पर नज़र डाली तो सभी अँग्रेज़ी अखबारों और उन्हीं के हिन्दी संस्करण के फ्रंट पेज पर एक रोते हुए ‘आदमी’ की तस्वीर छपी थी. मैंने उत्सुकता से देखा तो समझ में आया कि गुजरात में भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में ये बंदा भीड़ से अपनी जान की भीख मांग रहा हैं.

सभी अखबारों में उसका नाम भी साफ-साफ लिखा था. जिससे ये साबित हो रहा था कि वो मुसलमान हैं और मारने वाले हिंदू. उस समय भी प्रेस पर ये कानून लागू था कि कहीं भी, कैसी भी साम्प्रदायिक हिंसा या दंगे फ़साद हो… उसकी रिपोर्टिंग धर्म के आधार पर नही होगी. किसी का नाम नहीं लिखा जायेगा…

लेकिन एक राजनीतिक दल के इशारे पर, उसके पालतू मीडिया ने सरेआम इस सेंसरशिप को ठेंगा दिखाकर 100% इकतरफा रिपोर्टिंग की. 4 दिन पहले ‘साबरमती एक्सप्रेस’ में लोगों को ज़िंदा जलाने पर कोई स्पेशल रिपोर्ट नहीं थी, ना ही गुजरात दंगों में मरे हिन्दुओं का कहीं भी जिक्र था और ना ही पुलिस फायरिंग में मरे हिन्दुओं का.

उस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का इतना जोर नहीं था लेकिन प्रिंट मीडिया ने जमकर आग लगाई. दंगों को राज्य प्रायोजित ठहराने में इन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी. जबकि इससे पहले भी सैकड़ों दंगे देश में हुए लेकिन ये पहली बार था कि हिन्दुओं को हत्यारा ठहराते हुए रिपोर्टिंग की गई.

कारण भी साफ था… उस समय वो कारण नरेंद्र मोदी नहीं… राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गुजरात में छा जाना और आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी को ठप्प किये जाने की भड़ास थी. तत्कालीन मुख्यमन्त्री ने अपनी ड्यूटी अच्छे से निभायी थी… ये सभी अदालतों द्वारा मिली क्लीन चिट से साफ हो गया.

जिन पत्रकारों ने साम्प्रदायिक हिंसा को हिन्दुओं को बदनाम करने में इस्तेमाल किया, राज्य सरकार को बदनाम करने में इस्तेमाल किया, वो सभी पत्रकार आज करोड़ों में खेल रहे हैं.

और आप देखिए मोदीजी की… कि उन्होंने सभी तरह के आयोग, अदालतों धैर्य और शांति से सामना किया और पाक-साफ, बेदाग बाहर निकले. ना ही उन्होंने उस समय… किसी पत्रकार, चैनल या अखबार पर गैर ज़मानती FIR दर्ज करवायी और ना ही मानहानि का केस किया.

आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा ‘झूठा प्रोपोगेंडा’ गुजरात दंगों को लेकर काँग्रेस और उसके पोषित मीडिया ने चलाया लेकिन झूठ दिखाने पर भी केन्द्र की भाजपा सरकार और गुजरात की भाजपा सरकार ने किसी एक बन्दे को भी परेशान नही किया.

ये होते हैं राजनीतिक मूल्य. ये होता है प्रेस को अभिव्यक्ति की आजादी देना. आज जो असहिष्णुता की बात करते हैं, ज़रा एक बार ये समय याद कर लें.

बंगाल में मुस्लिमों द्वारा की गई हिंसा को मीडिया के इसी तबके ने दिखाने की भी ज़रूरत नही समझी और जिस ज़ी न्यूज़ ने ये सच्चाई दिखाने की हिम्मत की, उसके एडिटर सुधीर चौधरी पर गैर ज़मानती एफआईआर लिखवा कर ममता बनर्जी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि इन लोगों के लिये हिन्दुओं की जान की कीमत 2002 में भी नहीं थी और 2016 में भी नहीं.

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