दो लहरों की टक्कर : देश की संस्कृति पर धावा बोले बिना मुमकिन नहीं था ‘उनका’ राज

Do Laharo ki takkar Making India

हिन्दुस्तान को सदा ब्रिटेन के अनुकूल रखने के लिए एक योजना चालू की गयी. किसी देश में रहनेवालों की जातीयता का आधार देश की संस्कृति, देश का धर्म और देश की परम्पराएं होती हैं.

हिन्दुस्तान के मुसलमान तो हिन्दुस्तान में रहते हुए मक्का और मदीना को अपनी पुण्य भूमि मानते थे. उनका इस देश से मोह नहीं था. यह ठीक था कि मुसलमानी राज्य-काल में लाखों की संख्या में हिन्दू, मुसलमान बनाए गए थे, परन्तु मज़हब बदलने के साथ, उनकी जातीयता, राष्ट्र और परम्पराएं भी बदल गयीं थीं. उनके पथ प्रदर्शक हिन्दुस्तान के बाहर के सेनानी अथवा पीर-पैगम्बर हो गए थे.

अंग्रेज़ विद्वान यह समझने लग गए थे कि वे लोग इस देश को अपना देश नहीं मानते. अत: वे इस देश की स्वतंत्रता के लिए वहीं तक रूचि रखेंगे, जहां तक उनके सुख और आराम का सम्बन्ध है. यदि उनको स्वाधीन देश में सुख-आराम समझ आएगा, तो वे स्वराज्य के लिए लड़ेंगे. और यदि उनको यह समझ आ गया कि देश को अंग्रेजों के अधीन रखकर वे अधिक सुख सुविधा पा सकेंगे, तो वे देश को अंग्रेजों के अधीन रखने में अपना कल्याण मानने लगेंगे.

परन्तु हिन्दू का सम्बन्ध इस देश के साथ, सुख-आराम-के अतिरिक्त भी है. उनके लिए उनकी पुण्यभूमि और मातृभूमि यही देश है. उनकी संस्कृति, उनके देवी देवता, उनके धर्म ग्रन्थ और इतिहास सबके सब इस देश के साथ ही सम्बन्ध रखते हैं.

अत: यह हिन्दू तो अपनी स्वतंत्रता और अपने देश के राज्य के लिए अपनी सुख सुविधा तथा धन वैभव को गौण समझेंगे. वे इस देश के लिए प्रत्येक प्रकार का त्याग और तपस्या करने के लिए कटिबद्ध रहेंगे.

अत: यह समझा गया कि देश हिन्दुओं का है और अगर देश पर राज्य रखना है तो देश का सम्बन्ध हिन्दुओं से विच्छेद करना होगा. इसके लिए कई पद निश्चित किये गए.

यह विचार किया गया कि हिन्दुओं को यहाँ का मूल निवासी मानना वर्जित कर दिया जाए, हिन्दुओं को मुसलमानों की भांति एक विदेशीय जाति प्रसिद्ध कर दिया जाए, उनके देवी देवताओं को काल्पनिक और मिथ्या सिद्ध कर दिया जाए. उनके प्रत्येक सम्मानित और पूजित विचार, ग्रन्थ और तीर्थ स्थान घृणित एवं उनके ज़ोरों ज़ुल्म का प्रतीक घोषित कर दिए जाएं.

इसके लिए एक योजना बनाई गयी और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में एक इंडोलॉजी विभाग खोला गया. वहां हिन्दुओं के पूर्वजों, उनके धर्म ग्रंथों, उनके साहित्य और इतिहास को और उनकी परम्पराओं तथा संस्कृति को अंग्रेज़ी और इसाइयों की इन्हीं बातों से घटिया सिद्ध करने का यत्न किया जाने लगा.

ये दोनों महान योजनाएं ईसा की अठारहवीं शताब्दी के अंत में विचार की गयी और इन पर कार्य सन 1830 के लगभग आरम्भ किया गया.

– साहित्यकार स्व. गुरुदत्त  की पुस्तक ‘दो लहरों की टक्कर’ का अंश

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