वामियों की असली समस्या हिटलर नहीं, अनुशासन यानी डिसिप्लिन है

कल रात मैंने एक पहेली बुझाई थी –

अनुशासन प्रिय व्यक्ति को आप क्या कहते हैं? मतलब कोई व्यक्ति, माता-पिता से लेकर शिक्षक, बॉस, पत्नी या पति, सास अगर नियमपालन में अत्यधिक कड़ाई से पेश आते हैं, याने डिसिप्लिन में कोई छूट नहीं, तो आप उन्हें क्या नाम देते हैं? हाँ, पता है इस नाम से उनका उल्लेख पीठ पीछे ही होता है, लेकिन जहां तक सोचता हूँ, ज़्यादातर लोग एक ही विदेशी नाम देते हैं. क्या है यह नाम?

ज्यादातर मित्रों ने सही अनुमान लगाया, जर्मनी के तानाशाह हिटलर का ही नाम आया. जहां तक यह पहेली है कि हम ऐसे व्यक्ति को क्या नाम देते हैं, तो वह नाम हिटलर का ही होता है.

एक मित्र ने पूछ लिया कि क्यों हम हिटलर का ही नाम लेते हैं? बहुत सही सवाल है, और मैंने यह लेख उसी सवाल के जवाब में लिखने का मन बना रखा था, बस यह सवाल कोई पूछेगा यह अपेक्षित नहीं था. अच्छा लगा कि यह सवाल भी किसी के मन में उभर रहा है. भारत मरा नहीं है इसकी यह निशानी है.

तो – हिटलर ही क्यों?

क्योंकि, और इस बात पर गंभीरता से विचार कीजिएगा, क्योंकि इतने सालों में हमें वामियों ने ऐसे सोचने के लिए ‘कंडीशन’ कर रखा है. अनुशासनप्रिय लोग तो हर समाज में हमेशा रहे हैं, और हिटलर का कार्यकाल तो बस 1933 से 1945 का है. पश्चिमी देश, जिन्होंने हिटलर को प्रत्यक्ष झेला, वे अनुशासनप्रिय व्यक्ति को हिटलर नहीं कहते. यहाँ ही क्यों?

इसके लिए हमें हिटलर के कामों को भी समझना होगा. मोटे तौर पर हमें क्रूर नाज़ियों के तानाशाह नेता के रूप में ही हिटलर की पहचान है, लेकिन हिटलर को एक सुशिक्षित समाज ने नेता क्यों स्वीकार किया, यह भी देखना होगा.

प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी हारा था और वर्साय के संधि के तहत बहुत अपमानजनक शर्तों के नीचे जी रहा था. पीढ़ी तो खोई ही थी, आर्थिक नुकसान भी बहुत झेल रहा था.

इस राष्ट्र के अवचेतन को हिटलर ने जगाया और सत्ता पर लाने की मांग की. सत्ता पर आते ही केवल 6 सालों में उसने राष्ट्र को गत वैभव से भी ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया.

इसमें उसके कुछ तरीके समर्थनीय नहीं माने जा सकते और ना ही मैं उन तरीकों का समर्थक हूँ. लेकिन यह बात भी अवश्य देखनी होगी कि उसने केवल छह वर्षों में जर्मनी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया. इसमें जर्मन जनता का भी सब से बड़ा योगदान है – जनता खुद बेहद अनुशासन प्रिय रही है.

किसी ने फेसबुक पर लिखा था – नेता हिटलर तभी बनता है जब जनता जर्मनों जैसी होती है, इसीलिए मोदी जी लाख चाहें भी तो भी हिटलर नहीं बन सकेंगे – इस वाक्य से पूरी तरह सहमत हूँ.

अगर आप को ऐसा लगा कि लेख भटक रहा है तो इतना ही कहूँगा कि यह बैकग्राउंड आवश्यक है. मूल मुद्दे पर आते-आते कुछ और तथ्य भी समझ लेते हैं.

हिटलर के पक्ष का नाम समाजवादी था और अगर उनका घोषणापत्र पढ़ा जाये तो समाजवाद की बातें ही हैं. हिटलर खुद को असली समाजवादी कहता था और रशिया के साम्यवाद को बोल्शेविक कम्यूनिज़्म.

कम्युनिस्टों को हिटलर के साथ हमबिस्तर होने में कोई अफसोस नहीं था. रशिया के साथ उसने समझौता किया था, उसके चलते रशिया गाफिल रहा. समझौता तोड़ कर जब उसने रशिया पर ही आक्रमण किया, तब हिटलर और जर्मनी, रशिया और कम्युनिस्टों के दुश्मन हो गए.

जब अपने दु:साहस के चलते हिटलर और जर्मनी ने युद्ध का खामियाजा भुगता, तब सब विजेताओं ने अपने हिसाब से इतिहास लिखा. जैसे भारत में मुसलमानों और अंग्रेजो ने ही ‘नामे’ लिखे. उसी समय भारत में स्वतन्त्रता आंदोलन चरम पर था और महायुद्ध के दौरान कुछ नेताओं ने जर्मनी से सहायता की अपील भी की थी, जिसे कोई सफलता नहीं मिली.

अब आते हैं भारत के कम्युनिस्टों के रोल पर. इन्होने हिटलर को क्यूँ बदनाम किया है यह समझने योग्य है.

हिटलर के उदय में एक महत्व का कारण था राष्ट्रीयत्व. जर्मन वंश शुद्धता का आग्रह. एक जनता, एक नेता (eine volk, eine Fuhrer) तथा एक पराभूत हतप्रभ जर्मनी को सर्वश्रेष्ठ बनाने का आश्वासन – Deutschland uber alles.

इसने जर्मनों के अंदर धधकते राष्ट्रवाद को दावानल बना दिया. हिटलर ने जो वादा किया था वो पूरा भी किया लेकिन अति सर्वत्र वर्जयेत, यह न समझकर स्वयं के साथ देश को भी युद्ध के खाई में झोंक दिया.

अगर आप कम्युनिस्टों की कार्यशैली से परिचित हैं तो आप को पता ही होगा कि उनको राष्ट्रवाद से एलर्जी होती है. दूसरी बात, chaos – अराजकता – की स्थिति उत्पन्न करने के लिए ये प्रतिबद्ध होते हैं, ये हमेशा वर्तमान व्यवस्था को उद्ध्वस्त करना ही समस्या का हल बताते हैं। लेकिन जहां भी इन्हें सत्ता मिली, वहाँ इन्होंने या तो समस्या और बिगाड़ दी हैं या फिर लोगों में यह भावना बढ़ी कि इससे तो पहले ही ठीक थे.

आज़ादी के नाम से सत्ता हासिल करते हैं लेकिन बाद में आज़ादी का नाम भी नहीं लेने देते, यह इनका इतिहास है.

खैर, अगर हम अराजकता को समझ लें तो अनुशासित समाज, अराजकता का मुक़ाबला कर सकता है. इसलिए ये वास्तव में हिटलर को नहीं, अनुशासन को बदनाम कर रहे हैं.

इनकी असली समस्या हिटलर नहीं, अनुशासन यानी डिसिप्लिन है.

क्योंकि इनके हिसाब से हिटलर बुरा था और उसने जो भी किया, बुरा ही था इसलिए अनुशासन भी बुरी बात है. जो अनुशासन कड़ाई से लागू करे वो हिटलर. एक हारा हुआ विनाशक तानाशाह! और यह बात इतनी सफाई से हमारे अंदर भरी गई है कि हमें यह अपना ही विचार लगाने लगा है.

अनुशासित समाज मुक़ाबला कर सकता है, और अपने विरोधियों में यही बात वामी बर्दाश्त नहीं कर सकते. सेना, सैनिक प्रशिक्षण या अर्धसैनिक बलों से इन्हें क्यूँ समस्या होती है, यह भी समझ ही गए होंगे आप.

आम आदमी पार्टी वाले जब पुलिस पर मोर्चा खोलते हैं तब उनके इरादे भी आप को साफ समझ आ गए होंगे. इसीलिए जब आप इनको संघ को फासिस्ट कहकर बदनाम करते देखते हैं, तो इनकी मंशा समझ लीजिये.

संघ इनकी नजर में राष्ट्रवाद और अनुशासन है, जो इनके मार्ग में रोड़ा है इसीलिए वे संघ को बदनाम करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाते हैं. बढ़िया प्रचार तंत्र के कारण काफी सफल भी रहे हैं.

बाकी वामियों की कामयाबी देखें तो युद्ध के बाद सभी पश्चिमी देशों को इन्होने लगभग रीढ़विहीन बना दिया. जर्मनी में वंश शुद्धता को पाप ठहराकर वहाँ multi culturalism का प्रदूषण फैला दिया और उसके नाम पर इस्लाम का कैंसर इम्पोर्ट कर दिया. परिणाम आज दिखाई दे ही रहा है.

यही मल्टी कल्टी का रोग समग्र यूरोप में फैलाकर उसे भी islam-infected कर दिया जिसके भी परिणाम दिखाई दे रहे हैं. भारत में भी काँग्रेस में पैठ बनाकर शरणार्थियों के नाम पर अवैध बांगलादेशी मुसलमानों की घुसपैठ बढ़ाकर भारतीयों को अपने ही देश में शरणार्थी बनाने का पुण्यकर्म भी इन्हीं मार्क्स की नाजायज औलादों का है. बंगाल में इस्लामी अंधेर फैलाने वाले ज्योति ही थे!

स्कूलों में कभी NCC कंपलसरी हुआ करती थी, कैसे स्वैच्छिक हुई आप सोचिए. वैसे हम अनुशासन प्रिय कभी थे ही नहीं लेकिन हमें आलसी और अनुशासनहीन बनाने और उसे ही वांछनीय बताने का श्रेय भी वामियों को जाएगा.

उपभोक्तावाद को प्रमोट करने में आलस्य तथा आत्मकेंद्रितता (मेरी सेवा में सभी लगते हैं, तो मैं श्रेष्ठ हूँ, हम लाइन में खड़े नहीं रहते इत्यादि इत्यादि) इस मनोवृत्ति को बढ़ाने में फिल्में, एडवर्टाइजिंग आदि का कितना योगदान है यह आप याद करें. इन उद्योगों पर वामियों का कब्जा आप को याद ही होगा.

काफी लंबी हुआ ये लेख और फिर भी कुछ मुद्दे अनछुए हैं लेकिन फिर उन पर लिखने से विस्तार कुछ ज़्यादा ही होगा, इसलिए यहाँ रुकता हूँ. उम्मीद है यह समझा पाया हूँ कि अनुशासन प्रिय व्यक्ति को आदर देने के बजाय उसे हिटलर कहकर हीन – not cool – दिखाने का भाव हमारे मन में वामियों ने किस तरह भर दिया है।

उन्हें अराजक चाहिए और इसीलिए अनुशासन बुरा है. अब एक अच्छी आदत को बुरी कैसे बताएं तो उसे एक बुरे और हारे नाम के साथ जोड़ दिया गया.

इस से, subconscious level पर हमारा कितना बड़ा नुकसान हुआ है क्या आप ने कभी सोचा है? खैर, जब जागे तब सवेरा, अब सोचिए, उजाला दूसरों के लिए भी बनिए.

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