मैं हिन्दू हूँ, लेकिन…

जिस ज्ञात इतिहास को मान्यता दी जाती है उसके अनुसार भारत के लिये विश्व में सबसे गौरव का क्षण वो था जब बंगाल की माटी में जन्में एक अनपढ़ संन्यासी का युवा शिष्य नरेंद्रनाथ दत्त अमेरिका के शिकागो धर्मसभा में गरज रहा था.

उस धर्म सभा में उसने क्या कहा था, यही कहा था न कि हमारा धर्म मानव मस्तिष्क की मौलिकता और अनन्तता का विश्वासी है, जगत के संपूर्ण प्राणियों के कल्याण की भावना और ईश्वर तक पहुँचने के हर मार्ग की न सिर्फ स्वीकार्यता बल्कि उससे कहीं आगे जाकर उसके प्रति समादर का भाव देना ही हिंदुत्व है.

प्रश्न है अपनी इस अंतर्निहित विशेषता को क्या हमको अपने धर्म-परिचय में बताना जरूरी है? क्या आज तक के हमारे इतिहास और व्यवहार ने इन सारी विशेषताओं को “हिन्दू” शब्द में समेट नहीं दिया है ?

मित्र डॉ राजीव मिश्र ने कल एक पोस्ट लिखी थी जिसमें उन्होंने उस तरह के हिन्दुओं की बात की थी जो खुद को हिन्दू तो कहते हैं पर स्वयं ही किसी अनजाने अपराध बोध के अधीन उसके साथ ‘बट’ (लेकिन) या ‘हम्म्म्म…’ जोड़ते हुए सफाई देने लग जाते हैं.

इस युग में स्वामी विवेकानंद से बड़ा हिन्दुत्व का प्रचारक कोई नहीं हुआ, इसी तरह सावरकर, हेडगेवार और गोल्वलकर से बड़ा हिंदुत्व के लिये समर्पित नाम कोई और नहीं मिलता पर इनमें से किसी को भी मैंने कभी खुद को हिन्दू कहने के बाद ‘बट’ या ‘लेकिन’ लगाते नहीं सुना.

ये क्यों अपनी हिन्दू पहचान के साथ ‘बट’ या ‘लेकिन’ नहीं लगाते थे इसकी वजह पर गौर तो करिये.

ये लोग अपनी हिन्दू पहचान बताते हुए ऐसे ‘सफाई’ देते शब्द प्रयोग नहीं करते थे क्योंकि ‘हिन्दू’ शब्द में वो सारे ही भाव अंतर्निहित है जिसे इसके साथ नाहक लगाने की जरूरत महसूस की जाती है.

आज जो दूसरे मजहब वाले हैं, मैं यहाँ विशेष तौर पर यहूदियों और ईसाइयों की बात कर रहा हूँ, उनके लिये हमारा हिन्दू कहना ही उनको हमारे बारे में सब कुछ समझा देता है.

कर्बला के मैदान में जालिम यजीद की फौज से घिरे इमाम हुसैन को भी किसी हिन्दू ने आकर ये सफाई दी थी क्या, कि मैं हिन्दू हूँ लेकिन आपके मजहब की भी इज्जत करता हूँ? मैं आपके इबादतगाह का सम्मान करूँगा और आपके साथ आपके त्यौहार मनाऊंगा?

ज़ाहिर है उनसे किसी ने ऐसा नहीं कहा पर फिर भी उनकी प्यासी जुबान पर अपने लिये महफूज़ ठिकाने के तौर पर सिर्फ हिन्दुओं के हिन्दुस्तान का नाम ही आया था.

‘नया नियम’ पढ़िये, ईसाई मत के आरंभिक प्रचारक जहाँ भी गये उन्हें मार पड़ी, हिन्दू यहाँ भी अपवाद हैं. हमने कभी यहाँ आने वाले ईसाई मत के आरंभिक प्रचारकों को नहीं सताया.

मदीने के बाहर दुनिया की पहली मस्जिद हम हिन्दुओं ने भारत के केरल में बनवाई. पारसी को बिना मत-मज़हब और रीति-रिवाज तब्दील किये यहाँ रहने की अनुमति दी.

यहूदी, हिन्दू व्यवहार से कितने अभिभूत थे इसका पता तब चला जब फरवरी, 2007 में लालकृष्ण आडवाणी के निवास पर दिए गए भोज में बतौर अतिथि इस्रायल के प्रमुख यहूदी पुजारी अर्थात् रब्बी ‘योना मेजगर’ आमंत्रित थे.

यहूदी अपनी मजहबी मान्यताओं को लेकर बेहद संजीदा और कट्टर होते हैं, मसलन यहूदी मर जाएगा पर किसी गैर-यहूदी का खून नहीं लेगा, ये अपनी बेटियां गैर-यहूदियों में नहीं ब्याहते.

यहूदी न तो मतान्तरण कराते हैं, न ही दूसरे पांथिक समुदायों की पहचानों को किसी भी तरह से कमतर आंकते हैं अथवा बाकी अब्राह्मी मजहबों की तरह उन्हें बदलने का प्रयास करतें हैं.

इसी तरह की एक यहूदी परंपरा में यहूदी रब्बियों के लिए किसी गैर-यहूदी के घर में भोजन करना पूर्णतया वर्जित है. इसलिये सबको पता था कि रब्बी आतिथ्य स्वीकार कर आयेंगे तो ज़रूर, पर वहां कुछ खायेंगे नहीं.

पर दुनिया तब स्तब्ध रह गई जब रब्बी योना मेजगर ने खाने का निवाला मुंह में डालते हुए कहा कि –

मैं जानता हूँ कि मैं किसी गैर-यहूदी के घर में भोजन कर अपने यहूदी परम्परा (जिसके रक्षण की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी मुझ पर है) को तोड़ रहा हूँ, पर मेरे लिए ऐसा करना इसलिए ज़रूरी है ताकि मैं हिन्दुओं का ऋण चुका सकूँ, जो उन्होंने हमारे लोगों के लिए किया है. जब सारी दुनिया हमारा अस्तित्व लीलने पर लगी थी तब हिन्दू ही थे, जिन्होंने न तो हम पर रत्ती भर भी अत्याचार किया और न ही कभी किसी एक यहूदी का शोषण किया“.

इस अवसर पर रब्बी की मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आध्यात्मिक गुरु स्वामी दयानंद (जिनका हाल में निधन हो गया) से भी हुई थी. इस मुलाकात को रब्बी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना बताया और कहा कि विश्व को अगर शांति, बंधुत्व, समादर और सहअस्तित्व सीखना है तो उसे हिन्दू से सीखना होगा.

इसी बात को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्मसभा में आने के बाद लाहौर में कहा था कि हमारे व्यवहार के कारण आज धर्म और हिन्दू शब्द समानार्थी हो गया है.

विवेकानंद ने शिकागो धर्म सभा में हिंदुत्व की सारी अंतर्निहित बातें बताई तो थी पर वहां अपराधबोध नहीं था, गर्व था. वहां वो कोई सफाई नहीं दे रहे थे, सत्य को डंके की चोट पर बयान कर रहे थे.

हममें सर्वपंथ समादर और विश्व-कल्याण की भावना है, ये हमारे लिये गर्व का विषय है जिसे बताते हुए छाती चौड़ी होनी चाहिये न कि दब्बूपन का आभास होना चाहिए और न ही ऐसा आभास होना चाहिये कि हम हिन्दू होकर किसी पाप का प्रायश्चित कर रहें हैं जिसके परिमार्जन के लिये ये ‘सफाई’ देते शब्द जोड़ना आवश्यक है कि मैं दूसरे मत-मजहब और पर्व-त्यौहार का सम्मान करता हूँ.

दूध अपना परिचय देते हुए ये नहीं कहता कि मैं सफ़ेद हूँ और न ही गुड़ को ये बताना पड़ता है कि वो मीठा है, इसी तरह हिन्दू शब्द भी है.

अगर मानव जाति के प्रति किये इतने उपकारों और सदाशयता के बावजूद हमें अपनी ‘हिन्दू’ पहचान के साथ ‘बट’ या ‘ह्म्म्म…’ लगाना पड़े तो मेरे लिये इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं है.

बाकी अंतिम पंक्ति में वही कहूँगा जो राजीव जी ने अपनी पोस्ट में कहा है –

और जो बंदा बिना उस ‘हम्म्म्म’ और ‘लेकिन’ के इस सवाल का, कि क्या वो हिन्दू है सिर्फ सगर्व ‘हाँ’ में जवाब दे देता है, उसे गले लगा लेने का मन करता है…

मुझे तो करता है, क्या आपको भी?

सन्दर्भ हेतु डॉ राजीव मिश्रा की पोस्ट

 

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