भीतर के उत्सव के झरने को दबाये रखना, ख़ुद को छलने जैसा

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छुटपन में गिनती सीखते समय, कैलेन्डर बड़े भाते थे…

1, 2 , 3, 4… सभी नम्बर इतने बड़े-बड़े लिखे होते थे उनपर… उन्हें देख कर बोलता था- एक, दो, तीन, चार…

जब बड़े होते गए… तारीख़ों का महत्व अपने जन्मदिन… न्यू इयर पार्टी… फिर इतिहास की क़िताबों और हिंदी के निबन्धों से सिखने को मिला..!

तरुणाई में भगवान श्री रजनीश ओशो का नशा सर चढ़ने लगा… तो पहली दफ़ा लगा कि साहब, ये तारीखें और सालगिरह तो बहाना है उत्सव मनाने का…

जब युवा हुए तो निश्चित हुआ, कि ये सालगिरह, ये तारीख़ें, ये सब वाक़ई में ‘सिर्फ नम्बर’ ही तो है…!

जब तक व्यक्ति हर क्षण में उत्सव मनाने की बात ना समझ ले… तब तक ये कामचलाऊ और बढ़िया है… पार्टी करें इन्हीं किसी बहाने से..!

मगर यहाँ रुक नहीं जाना है, क्योंकि ये है तो कामचलाऊ न…!!

लेकिन बहाने से क्यों उत्सव मनाना… जब एक बहाना ना होगा लोग दूसरा तलाशेंगे… सब में फ़ीकापन नज़र आने लगेगा तो उसमें और रंग मिलाएंगे लोग…

शराब, शबाब, कबाब, ये कुछ रंग ही तो हैं… ये क़तई बुरे नहीं… मगर इनके बहाने भीतर के उत्सव के झरने को दबाये रखना… ख़ुद को छलने जैसा है ना… खुद के साथ पूर्ण न्याय भी नहीं…!

न्यायशास्त्र कहता है कि अनजाने में भी किया गया अन्याय, किसी दोषी को कम दोषी साबित नहीं करता…!

ख़ैर…

कुछ नया करने की जो ललक सभी के अंदर है… वो उसी महा-उत्सव के झरने की तीव्रता का प्रमाण है…

इस नए ‘कैलेंडर वर्ष 2017’ में सभी को हार्दिक शुभेच्छा… और यह प्रार्थना ईश्वर से सभी के लिए कि हम-आप भीतर के उस महा-उत्सव रुपी झरने को खुल कर फूट कर बहने देने में सहायक हों…

हर क्षण को समग्रता से जिएं… उल्लास और उत्साह से जिएं… पूरा पूरा जिएं… आनंद के साथ जिएं… प्रेम के साथ जिएं…!!!

सभी को प्रेम… सभी को प्रणाम…

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