धर्महीन कम्युनिस्ट कब, कैसे और क्यों बोलता है ‘इंशा अल्लाह’

0
69

धर्म जनता के लिए अफीम है. ये मार्क्सवाद का मूलभूत सिद्धान्त है. लेकिन ये कभी भी आश्चर्य की बात नहीं रही की एक धर्महीन कम्युनिस्ट कब, कैसे और क्यों एक मुस्लिम कम्युनलिस्ट के साथ खड़ा मिलता है.

साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले मुस्लिम सांप्रदायकिता से हाथ मिलाते हमेशा नज़र आते हैं. तमाम सेक्युलरिज्म एक धर्म के आगे नतमस्तक नजर आता है.

हकीकत ये है कि मार्क्सवाद और मुस्लिम साम्प्रदायिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों में बहुत सी समानताएं हैं. कॉमन गोल यानी उद्देश्य हैं. इसीलिए दोनों एक दूसरे के पूरक और सहायक हैं.

अब विस्तार से

मुस्लिम धर्म एक किताब कुरान से चलता है. कुरान में जो लिखा है वो बदला नहीं जा सकता, उसमें कोई फेरबदल मुमकिन नहीं. मार्क्सवाद या कम्युनिस्ट मार्क्स की किताब दास कैपिटल को वही दर्जा देते हैं. करीब डेढ़ सौ साल पहले लिखी किताब में कोई फेरबदल मुमकिन नहीं. पूर्णतया वैज्ञानिक लेखन. समस्त सृष्टि कैसे चले इसका पूरा विवरण कुरान और दास कैपिटल में मौजूद है.

यूँ तो बाकी लोगों को किसी विषय पर बात करने के लिए उसे समझना पड़ता है, पढ़ना पड़ता है. मेहनत करनी होती है. लेकिन एक मौलवी साहब और एक मार्क्सवादी साहब दुनिया में किसी भी विषय पर बोल सकते हैं, अपनी बात कह सकते हैं. बल्कि ये भी बता सकते हैं कि जनता को उस विषय के बारे में क्या करना चाहिए.

मौलवी साहब और मार्क्सवादी साहब, दोनों लोग ये काम कुरान शरीफ और दास कैपिटल शरीफ की रौशनी में करते हैं. यकीन न हो तो आप किसी भी विषय पर इनकी राय लेकर देख लीजिये, एक फतवा देगा, दूसरा जनता को होने वाली तकलीफों के बारे में बताएगा.

अगर आप एक मुस्लिम भाई से इस बारे में चर्चा करना चाहेंगे वो कहेगा कि पहले कुरान पढ़कर आओ. यही बात आपसे कम्युनिस्ट भाई भी कहेगा, जाओ पहले मार्क्स को पढ़कर आओ.

और आप दोनों से नहीं कह पाएंगे कि भाई थोड़ा विषय को ही पढ़ लो.

मुस्लिम भाई, मुस्लिम ब्रदरहुड में विश्वास करते हैं यानि दुनिया में सारे मुस्लिम आपस में भाई हैं. इसीलिए फिलिस्तीन में कुछ होता है, बर्मा में कुछ होता है तो भारत में प्रदर्शन होते हैं. आगज़नी, दंगा, फसाद कुछ भी हो सकता है. आखिर दुनिया भर के मुस्लिम एक हो यही नारा है.

इसी तरह कम्युनिस्ट कहते हैं कि दुनिया के मज़दूरों एक हो. कहीं किसी देश में किसान मजदूर को कुछ होता है, अमेरिका और पूंजीवादी देशों की साज़िश के खिलाफ मार्क्सवादी, अखबारों और पत्रिकाओ में लेख लिखते हैं.

और यही एक होने वाली भावना राष्ट्र की भावना के खिलाफ जाती है. दोनों ही, देश के बंधन को नहीं मानते. धर्म या साम्यवाद भारत से कहीं बड़ा है. नेशनलिज्म की भावना दोनों पक्ष ख़ारिज करते हैं.

ऐसे तो मुस्लिम और कम्युनिस्ट दोनों ही शांति और अहिंसा के पुजारी हैं. दोनों ही अपना फैलाव दुनिया भर में समानता लाने के लिए करते हैं.

मुस्लिम, गैर मुस्लिम को काफिर समझते हैं, उन्हें इस्लाम में लाना अपना फर्ज समझते हैं. इसी तरह कम्युनिस्ट गैर कम्युनिस्ट को बुर्जुवा समझते हैं, कैपिटलिस्ट समझते हैं. दुनिया भर में प्रोलेट्रिएट या सर्वहारा की तानाशाही लाना चाहते हैं.

और जब तक ये नहीं हो जाता तब तक हमारे मुस्लिम और कम्युनिस्ट भाई अभिव्यक्ति की और अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता चाहते हैं.

वैसे अपने धर्म की या विचारधारा की सरकार बनने के बाद अपने विरोधियों को ये कितनी स्वतंत्रता देते हैं, ये कोई अबूझ पहेली नहीं.

अभी देखिये ऐसे तो दोनों ही पक्ष हिंसा के खिलाफ हैं. लेकिन इस्लाम के फैलाव के लिए हिंसा ही एकमात्र सहारा है. काफ़िर को, इस्लाम कबूल करवाना है या उसका सर कलम करना है. जिहाद आखिर शांतिपूर्ण आंदोलन धरना प्रदर्शन का तो नाम नहीं है.

इसी तरह कम्युनिस्ट भी क्रांति की तैयारी करता है. जब सर्वहारा यानी किसान मज़दूर तैयार होगा, तब एक खूनी क्रांति होगी. बुर्जुआ और कैपिटलिस्ट वर्ग को मार काट कर ख़त्म किया जायेगा.

वैसे तो दोनों ही पक्ष पूछते हैं कि नोटबंदी के लिए सरकार ने क्या तैयारी की. लेकिन ये नहीं बताते कि जब जिहाद होगा या क्रांति हो जाएगी तब बिना आम जनता को नुकसान पहुंचाए, कैसे उनका सर कलम किया जायेगा.

दोनों शांतिप्रिय पक्ष हैं. लेकिन उनका एक हिस्सा बगावत पर उतर आया है, उसे इंतज़ार नहीं है. इसलिए एक तरफ दुनिया ISIS से जूझ रही है, गज़वा-ए-हिन्द के लिए पाकिस्तान में तमाम आतंकवादी संगठन मौजूद हैं जिनके नाम इस्लामी हैं.

बांग्लादेश में भी इंडियन मुजाहीदीन है. और अगर कल कश्मीर अलग होता है तो वो भी भारत के खिलाफ यही जंग छेड़ेगा. वो भी अपने यहाँ ऐसे आतंकवादियों को प्रशिक्षण देगा, हथियार देगा.

इसी तरह भारत अपने हृदय क्षेत्र में नक्सल समस्या से जूझ रहा है, नक्सल भी खूनी क्रांति हथियार आतंकवाद के जरिये भारत पर कब्ज़ा चाहते हैं.

और नक्सल ही नहीं उत्तर पूर्व यानि नागालैंड, त्रिपुरा, असम, मणिपुर में भी जो आतंकवादी संगठन है, वो इस्लाम से नहीं कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित हैं. चीन के सक्रिय सहयोग और प्रशिक्षण से भारत के खिलाफ लड़ रहे हैं.

और हमारे कम्युनिस्ट भाई सिर्फ भारत में ही नहीं दक्षिण अमेरिका में भी लड़ रहे हैं. कोलंबिया, वेनेजुएला, क्यूबा तमाम देशो में कम्युनिस्ट सोवियत संघ की मदद से लड़ते आ रहे हैं. नेपाल में इन्ही नक्सल समूहों ने अब सत्ता पर कब्ज़ा किया है. प्रचंड बाबा अब नेपाल में प्रधानमंत्री हैं.

हमारे मुस्लिम भाई खुद को सबसे श्रेष्ठ धर्म मानते हैं, कम्युनिस्ट भाई खुद को सबसे बेहतर विचारधारा मानते हैं.

जैसे हमारे मुस्लिम भाइयों को लगता है कि इस्लाम खतरे में है, पूरी दुनिया मुस्लिम लोगों की दुश्मन है. वैसे ही हमारे कम्युनिस्ट भाई कल्पना किया करते हैं कि देश में फासीवाद आ गया है, हिटलर आ गया है. अब वो लेखकों को, मार्क्सवादियों को जीने नहीं देगा. दंगे होंगे, सब मारे जायेंगे. रोज रात को गैस चैंबर के सपने देखते हैं.

दोनों ही पक्ष कहते हैं कि वो महिलाओं के लिए आदर्श हैं. बस एक अंतर है, एक नारी देह को पूरा उघाड़ कर नारी को स्वतंत्र करना चाहता है, दूसरा नारी देह को ढक कर. लेकिन दोनों सिर्फ नारी देह तक ही सीमित हैं.

हमारे मुस्लिम भाइयों के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी है जिसने अपनी स्थापना के बाद भारत विभाजन के बीज बोये. वहां से निकले स्कालरों ने पूरे भारत में घूम-घूम कर पाकिस्तान का प्रचार किया. इसी तरह हमारे कम्युनिस्ट भाइयों के पास JNU है. जो आज नारे लगाता है, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे , इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह.’

कम्युनिस्ट इंशा अल्लाह क्यों बोल रहा है, मुझे उम्मीद है ये पोस्ट पढ़कर अब तक आपको समझ में आ गया होगा. अगर नहीं आया है तो भगवान् आपका भला करे.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY