ओशो की दीक्षा-माला को टॉयलेट में बहा देने वाला क्या जाने रक्त-दीक्षा

rakt dksha

उड़ी में शहीद हुए हमारे भारतीय सेना के जवानों की मौत का बदला जब सर्जिकल स्ट्राइक से लिया गया तो, बॉलीवुड में भी 1947 की तरह बंटवारा हो गया था.

एक तरफ नाना पाटेकर जैसे लोग थे, जो अपने जीवन का कुछ हिस्सा फ़ौज में भी निवेश करके आये हैं. उन दिंनों नाना ने कहा था हमारे देश के असल हीरो वो है जो सीमा पर अपनी जान जोखम में डालकर हमारी रक्षा कर रहे हैं. परदे पर पटर पटर करने वाले नकली हीरो तो खटमल की औकात रखते हैं. उन्हें इतनी अहमियत देने की आवश्यकता ही नहीं.

वहीं दूसरी ओर जिस्म जैसी फ़िल्में बनाने वाले महेश भट्ट थे, जो विलासिता पूर्ण जीवन के इतने आदी हो चुके हैं कि आतंकवाद का मुकाबला भी वो केवल बातों से करना चाहते हैं. और हाथ में शांति का पोस्टर लिए फेसबुक की दीवारों पर घूम रहे थे….

यकीनन हमारा देश अहिंसा परमो धर्म के सिद्धांत को मानने वाला और वसुधैव कुटुम्बकम के लिए कृतसंकल्पित है. लेकिन जब जब राक्षसी शक्ति ने दैवीय शक्ति पर प्रहार किया है तब तब संन्यासियों को भी हथियार उठाने में संकोच नहीं हुआ है.

जब विश्वामित्र के सिद्धाश्रम पर ताड़का, मारीच राक्षसों का प्रकोप बढ़ गया था, और वे राम और लक्ष्मण को लेकर आये थे, तब राम ने कहा था हम दोनों अकेले ही काफी है राक्षसों के प्रहार के लिए.

तब विश्वामित्र ने जो कहा था – वो लेखक नरेन्द्र कोहली की पुस्तक रामायण (पहला भाग दीक्षा) से उद्धृत करना चाहूंगी.

विश्वामित्र शून्य में घूर रहे थे, जैसे साक्षात भविष्य को अपनी खुली आँखों से देख रहे हों. बोले- “यह न्याय का युद्ध है. मात्र तुम्हारे और लक्ष्मण के लड़ लेने से हमें लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी. इस सम्पूर्ण क्षेत्र के प्रजाजन, राक्षसों तथा उनके सहयोगी अनेक आर्यों के दुर्विनीत अत्याचारों को सहते सहते न केवल निष्क्रिय, कायर तथा सहिष्णु हो गए हैं, वरन वे लोग न्याय के प्रति अपनी निष्ठा, तेज, आत्मविश्वास- सबकुछ खो चुके हैं.

उनके सहयोग के बिना, उनके द्वारा किये गए किसी भी प्रयत्न के अभाव में यदि तुम समस्त राक्षसों का विनाश कर दोगे, तो उनका तेज और आत्मविश्वास नहीं लौटेगा. वे लोग यह मान लेंगे कि वे अत्याचारियों से लड़ने में अक्षम हैं.

भविष्य में जब कभी फिर कोई राक्षस जन्म लेगा, ये ही प्रजाजन उसके अत्याचारों को प्रतिरोध रहित होकर सहन करेंगे और फिर तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे.

राम! तुम राक्षसों का नाश करने के साथ-साथ प्रजाजनों का तेज तथा आत्मविश्वास लौटाओ. न्याय में उनकी खोई आस्था और निष्ठा उनमें पुन: प्रतिष्ठित करो.

तुम उनमें रामत्व स्थापित करो. अवतार की आवश्यकता दुर्बल प्रजा को होती है. पुत्र! तेजस्वी प्रजा अपने-आप में ईश्वर स्वरूप होती है. अत: प्रजा की ‘रक्त-दीक्षा’ भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. अदीक्षित प्रजा की सहायता से की गयी क्रान्ति, बहुधा दिग्भ्रमित हो जाती है और संत के रूप में छिपे भेड़िये निरीह प्रजा का रक्त चूसने लगते हैं.”

श्रीमान महेश भट्ट और उनके वामपंथी साहित्यकार जितना पढ़वा सकते थे, जितना फिल्मकार दिखला सकते थे, पढ़वा और दिखा चुके. अब समय आ गया है कि हिन्दू सनातन धर्मों की सूक्तियां जनता को दोबारा पढ़वाई जाए, उनकी सुप्त प्रज्ञा को झकझोर के जगाया जाए.

अब उन्हें वो पढ़वाया जाए जिस पर हमारी संस्कृति की नींव पडी थी… फिल्मों के द्वारा वो दिखलाया जाए जिससे वो विलासिता में मदहोश होकर अपना वास्तविक “धर्म” न भूल जाए.

वैसे सम्भोग से समाधि के लालच में तो महेश भट्ट भी गए थे ओशो आश्रम.. लेकिन समाधि घटित होने से पहले ही केवल सम्भोग की यात्रा करके लौट आये थे वो. वैसे भी ओशो की दीक्षा-माला को टॉयलेट के फ्लश में बहा देने वाला क्या जाने ‘रक्त-दीक्षा’ क्या होती है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY