विमुद्रीकरण के कारण बजट में शामिल हो सकेंगी कई कल्याणकारी योजनाएं

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यही अंतर है कांग्रेस और इस सरकार में, और इसीलिए मैं हूं मोदी सरकार के साथ लेख पर आई दो टिप्पणियों ने बात को और विस्तार से कहने का मौका दे दिया. पहली टिप्पणी एक जिज्ञासु की है और दूसरी एक मोदी-विरोधी मित्र की.

टिप्पणी 1 – नोट बंदी की बाद जो पैसा सरकार को बैंक के जरिये वापिस मिला, उसकी तो कोई वैल्यू नही, पुराने नोट तो किसी काम के रहे नही. फिर कैसे सरकार का खज़ाना भरेगा?

मेरी कहन – जैसे हम लोग बैंकों में पुराने नोट जमा कर रहे हैं तो हमारे अकाउंट में उतने पैसे चढ़ रहे हैं. उनकी वैल्यू तो है ही. बस वापस नए नोट मिलेंगे.

इन जमा नोटों से सरकार को फायदा नहीं है. लेकिन बैंको को होगा. कुछ लाख करोड़ जो बैंको में आ गए हैं वो मेन इकॉनमी में बने रहेंगे.

काले धन की पैरेलल इकॉनमी पर ब्रेक लगेंगे. कैशलेस लेनदेन से ज्यादा से ज्यादा मेन इकॉनमी फले फूलेगी. सरकार का टैक्स वसूलने का दायरा बढ़ेगा.

जमा नोटों से सरकार को डायरेक्ट नहीं इनडायरेक्ट फायदा है. और जो नोट जमा नहीं होंगे वो सरकार का डायरेक्ट फायदा है.

एक लाख, दो लाख, जितने नोट कम जमा होंगे, सरकार की देनदारी (liability) ख़तम होगी और वो सीधी कमाई होगी.

इन पैसों से वो समाज के लिए नए कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू कर सकेगी. जैसे सभी के लिए घर योजना है. इस बजट में हम ऐसे कई नए कार्यक्रम देखेंगे.

पिछले साल सरकार ने पेट्रोल डीज़ल के दामों में हुई कमी का फायदा उठाया था, इस साल विमुद्रीकरण का फायदा उठाएगी.

बिना नए टैक्स लगाए धूर्त मोदी सरकार जनकल्याण के नए कार्यक्रम चला रही है. और विपक्षी छाती पीट रहे हैं.

टिप्पणी 2 – सरकार के बचाव में मेहनत आप को करनी है. संघर्ष आप तेज रखिए हमारी धार तेज होती जाएगी. आपका संघर्ष सत्ता के लिए है और मेरा संघर्ष हर रोज जिंदा रहने के लिए है.

मेरी कहन – इसीलिए संघर्ष है जिन्दा रहने के लिए क्योंकि हर बार आपके अज़ीज़ों ने आपको बेचा है. इतनी गरीबी किसलिए, जब आपकी मेहनत में कमी नहीं. इतनी असमानता किसलिए है.

कैसे लोग बिना मेहनत किये अमीर बने और बने रहे हैं. आखिर कैसे ये लोग कामयाब हुए. क्यों आपके अज़ीज़ ऐसे मुद्दों पर चुप रहते हैं.

70 साल का जो लूट का मॉडल खड़ा हुआ है उसे जनता की निगाह से छुपाने का काम आपके अज़ीज़ों ने ही किया है. पूछिये उनसे… ऐसा क्यों किया उन्होंने.

क्या मैं ये समझूं कि आपको गरीबों की दिक्कतों का कोई अंदाज नहीं है. आपके पास सवाल ही नहीं हैं.

ये गरीबों के नाम पर सिर्फ नौटंकी है, विरोध के बहाने हैं. दरअसल गरीबों की मुश्किलों का आपको कोई अंदाज़ ही नहीं है?

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