हम हैं दिव्यांग!

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modi divyand part of divine

देश के प्रधान सेवक मोदी जी ने विकलांगों को ‘दिव्यांग’ नाम देकर हम सबका दिल जीत लिया है. हालाँकि मैंने स्वयं को कभी भी विकलांग नहीं माना, फिर भी मोदी जी के इन उद्गारों से मैं गद्गद हूँ, अभिभूत हूँ. जिस व्यक्ति के मन में अपने देशवासियों के प्रति इतना प्यार है और उनकी क्षमताओं पर इतना विश्वास है, उसके लिए संसार में कोई भी उपलब्धि असंभव नहीं है.

उस समय मैंने कक्षा 9 की परीक्षा दी थी, जब किसी बीमारी से मेरे दोनों कान हमेशा के लिए ख़राब हो गए थे और उनको ठीक करने के सभी प्रयास और इलाज व्यर्थ रहे. मैं उससे पहले अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता था और सभी को यह विश्वास था कि मैं अपने जीवन में कुछ विशेष करके दिखाऊंगा. मेरे कान ख़राब हो जाने पर सबने यही सोचा कि अब इस लड़के की जिंदगी बेकार हो गयी.

लेकिन मैंने अपनी इस बीमारी को एक चुनौती के रूप में लिया. मैंने अपनी शिक्षा में और अधिक परिश्रम करने का निश्चय किया. सामान्य विद्यालयों में पढाई करते हुए मैंने लगभग सभी परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त किये और अनेक बार अपनी कक्षा में प्रथम रहा. बीएससी के बाद मास्टर ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स, फिर कम्प्यूटर विज्ञान में जेएनयू से एम.फिल. की उपाधि भी मैंने अपनी कक्षा में प्रथम रहते हुए प्राप्त की.

मैंने अपनी विकलांगता के आधार पर कोई सुविधा और आरक्षण कभी नहीं माँगा. एचएएल लखनऊ में सामान्य कैंडिडेट के रूप में मैं अधिकारी बना और उसके कुछ साल बाद इलाहाबाद बैंक में मैनेजर के रूप में सेवारत हुआ. बैंक में दो बार सामान्य रूप से प्रोन्नति पाते हुए आज मैं मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के रूप में सेवा कर रहा हूँ.

लेकिन मेरी उपलब्धियां केवल नौकरी करने तक सीमित नहीं हैं. अपने कम्प्यूटर ज्ञान और लेखन कला का लाभ उठाते हुए मैंने लगभग ८० पुस्तकें कंप्यूटर सम्बंधित विषयों पर लिखीं हैं जो विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित हुई हैं और अनेक कक्षाओं तथा कोर्सों में चल रही हैं. पुस्तक लेखन के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महामना मालवीय मिशन के कार्यकर्त्ता के रूप में मैं सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहा हूँ. मिशन द्वारा संचालित महामना बाल निकेतन के सञ्चालन और उसके बच्चों के विकास में मैंने भी यत्किंचित योगदान दिया है, जिसका मुझे हार्दिक संतोष है.

वर्तमान में मैं लेखन कार्य और बैंक सेवा के अतिरिक्त योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा के शिक्षक के रूप में भी समाज को स्वस्थ बनाने का कार्य कर रहा हूँ तथा ‘जय विजय’ नाम से एक मासिक साहित्यिक पत्रिका और उसकी वेबसाइट का भी सफल सञ्चालन कर रहा हूँ.

कृपया इसे आत्मप्रशंसा न समझें. यह सब मैंने इसलिए लिखा है कि यदि मेरे संघर्षपूर्ण जीवन से किसी व्यक्ति को लेशमात्र भी प्रेरणा मिलेगी तो मैं स्वयं को धन्य मानूंगा. मैंने अपनी पूरी आत्मकथा भी चार भागों में लिखी है.

जो सज्जन उसे पढ़ना चाहें वे मुझे अपना ईमेल पता भेजकर उसे प्राप्त कर सकते हैं. मेरा ईमेल पता यह है- vijaysinghal27@gmail.com

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