क्या कॉमनवेल्थ गेम्स और इराक-खाद्यान्न घोटाले में छुपा है अफसर सुधीर नाथ की मौत का रहस्य?

जी हाँ, 1974 बैच के मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अफसर सुधीर नाथ एक कुशल प्रशासक, बहुत ही उच्च कोटि के नेक और ईमानदार अधिकारी माने जाते थे. उनका पूरा खानदान प्रशासनिक सेवा में रहा. उनके पिता और भाई आईएएस ऑफिसर रहे.

उनकी पत्नी श्रीमति सुषमा नाथ विख्यात आईएएस अफसर रहीं हैं. उनका पुत्र भारतीय विदेश सेवा में अभी भी कार्यरत है. ई-वन अरेरा कालोनी भोपाल के निवासी नाथ परिवार की धाक ईमानदार कुशल और देशभक्त परिवार के रूप में पूरे मध्यप्रदेश में जानी जाती है.

मेरा सुधीर नाथ जी से पहला सम्पर्क उस समय हुआ जब उनकी नियुक्ति इन्दौर के पास महू में बतौर आईएएस अफसर हुई. उनके पास उस समय एनफील्ड कम्पनी की बनी मिनी बुलेट क्रुसेडर थी. मेरे पास भी काले रंग की ऐसी ही क्रुसेडर फटफटी थी.

सुधीर के पास सरकारी गाड़ी थी, पर वह हमेशा अपने निजी काम से महू से इन्दौर अपनी फटफटी पर ही आया करते थे. निजी काम के लिए सरकारी गाड़ी का कभी उपयोग नहीं करते थे. उनकी यही सादगी और ईमानदारी मेरे दिल में उनके प्रति अगाध स्नेह और आकर्षण का कारण बन गई, जो मेरे पास एक अमूल्य धरोहर के रूप में आज भी सुरक्षित है.

मेरी और सुधीर नाथ के बीच में एक और महत्वपूर्ण कड़ी रही है. इन्दौर के सुप्रख्यात अस्थि रोग चिकित्सक और योगाचार्य डॉ रतन चन्द्र वर्मा. डॉ वर्मा के यहॉ फोटोग्राफी का पूरा का पूरा एक सुसज्जित डार्क रूम था. उसमें ब्लैक एण्ड व्हाईट फोटो को डेवलप करना, फिक्स करना और प्रिन्ट करने की पूरी व्यवस्था मौजूद थी.

उन दिनों रंगीन फोटोग्राफी का चलन नहीं था. सुधीर को भी फोटोग्राफी का बेहद शौक था, मुझे भी इसका चस्का था. हम दोनों ने डॉ वर्मा के इस डार्करूम में कई रातें फोटो प्रिन्ट करने में साथ साथ गुजारते रहते थे.

रील डेव्हलप करने, फिक्स करने, फिर फोटो एन्लार्ज करने फोकस करके अच्छा प्रिन्ट निकालने में बहुत समय लगता था. इस बीच सुधीर और मेरी घण्टों बातें अलग-अलग विषयों पर होती रहती थीं.

मैंने सुधीर के दिल में एक सच्चा नेक इन्सान पाया जो बेईमानी और अव्यवस्था से कभी कोई समझौता नहीं कर सकता था. उसी समय मुझे लग गया था सुधीर और सुषमा की जोडी एक श्रेष्ठ और पूरी तरह राष्ट्र को समर्पित प्रशासकीय स्तर पर सफल जोड़ी है.

इसके बाद जब सुधीर की पोस्टिंग कलेक्टर के रूप में मेरे जन्मस्थान गुना में हुई, तब मेरे ग्रामवासियों से मैंने उनके बारे में सुना, मैं गदगद हो गया. गरीबों के सच्चे मसीहा, कठिन से कठिन हालात में समस्या का निराकरण करने में माहिर, तेज तर्रार, दिखने में सख्त और दिल से अत्यन्त कोमल सुधीर जल्दी ही पूरे गुना जिले में अत्यन्त लोकप्रिय हो गए.

सुधीर की पोस्टिंग जब इन्दौर में कलेक्टर के रूप में हुई उस समय भी मेरा उनका निकट सम्पर्क रहा. डॉ वर्मा को वह पिता तुल्य मानते थे. डॉ वर्मा और मेरे पारिवारिक सम्बंध बहुत करीबी के होने के कारण मैं भी सुधीर के नजदीकी परिचितों में बना रहा. सुधीर की पोस्टिंग जब राष्ट्रपति भवन में थी तब भी मुझे मुगल गार्डन की सैर करने का आनंद उठाने का मौका उन्ही के कारण मिला था.

लेकिन 17 मार्च 2009 को वह अभागा दिन आ गया जब समाचार आया कि सुधीर नाथ की मैसिव ‘हार्ट अटैक’ के कारण मृत्यु हो गई. उस समय उनकी आयु महज 56 साल की थी.

मेरी जानकारी में सुधीर को कभी किसी तरह की कोई हृदय संबंधी या अन्य प्रकार की कोई तकलीफ नहीं रही थी. सुधीर और डॉ वर्मा के छोटे चिरंजीव आश्विन वर्मा के अत्यन्त ही गहरे दोस्ताना ताल्लुकात रहे हैं. आश्विन को हम लोग पप्पू कहते हैं.

सुधीर और पप्पू हम-उम्र होने के कारण बहुत ही अधिक घुले मिले थे. पप्पू की भी जानकारी में ऐसी एक भी बात चिकित्सीय दृष्टि से नजर नहीं आ रही थी जिससे यह सन्देह किया जा सके कि सुधीर को कभी भी कोई मैसिव हार्ट अटैक भविष्य में आ सकता है.

पूरी तरह से हृष्ट पुष्ट सुधीर अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत सजग रहा करते थे. इस कारण यह विश्वास करना असम्भव लगता है कि सुधीर नाथ की मौत हृदयाघात से स्वाभाविक रूप की रही होगी. पर कोशिश करने पर भी उनकी मृत्यु को रहस्यमय मानने का कोई ज्ञात-अज्ञात कारण नजर नहीं आ रहा था.

प्राप्त जानकारी के अनुसार जहॉ तक सुधीर की मृत्यु का वाकया है, सबेरे आठ-सवा आठ बजे तक वह पूरी तरह स्वस्थ थे. चाय पीने के तुरन्त बाद सुधीर को एक उल्टी हुई और वह छटपटाकर तत्काल मर गए.

तुरन्त हड़कंप मच गया. डाक्टर ने तस्दीक कर दी कि उनकी मृत्यु मैसिव हार्ट अटैक से हो गई. सुधीर की मां भी दिल्ली में रहती हैं. मृत्यु की खबर के साथ ही सुरेश कलमाड़ी मौके पर आ गए. ताबड़तोड़ दाह संस्कार का इन्तजाम किया गया.

किसी तरह की कोई शंका-सन्देह नहीं होने के कारण, न तो कोई पोस्टमार्टम किया गया, न किसी ने उनके विसरा को सुरक्षित रखा गया. पर सुधीर के अन्तिम संस्कार में कौन से अज्ञात कारण थे कि ताबड़तोड़ तरीके से उनका दाह संस्कार कर दिया गया. यह आज भी गंभीर रहस्य नजर आता है.

सुधीर की इकलौती सन्तान, उनके पुत्र सिद्धार्थ का जन्म इन्दौर के वर्मा यूनियन अस्पताल में हुआ था. सुधीर की मृत्यु के समय सिद्धार्थ बीजिंग (चीन) में पदस्थ थे. उनको जैसे ही समाचार मिला, सिद्धार्थ चीन से एकदम दिल्ली के लिए निकल गए. पर पता नहीं क्यों, किसी ने दाह संस्कार में उनके आने तक की प्रतीक्षा नहीं की.

कितने आश्चर्य की बात है, इकलौते पुत्र द्वारा पिता को अग्नि देने के समय तक के लिए भी इन्तजार नहीं किया गया. बताया जाता है कि सुधीर का शवदाह सिद्धार्थ के आने के पूर्व ही जल्दबाजी में निगम बोध घाट पर कर दिया गया. इकलौते बेटे को उसके मृत पिता का चेहरा भी देखने का अवसर नहीं दिया गया.

सुधीर के शवदाह में सुरेश कलमाड़ी और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित मौजूद थी. इस जानकारी से सन्देह होने लगा कि सुधीर नाथ की मृत्यु में और सुरेश कलमाड़ी का घटना स्थल पर तत्काल मौजूदगी में कहीं कोई गहरा रहस्य तो नहीं छिपा है?

पर यह रहस्य क्या हो सकता है, पता लगाना बहुत कठिन है. शक की सुई इस कारण भी गहरी होना स्वभावाविक है, क्योंकि सुधीर नाथ मृत्यु के पूर्व भारत सरकार के खेल मंत्रालय में सचिव पद पर वह पदस्थ थे.

कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले की बारीकियों को जितनी अच्छी तरह से सुधीर नाथ जानते होंगे उतनी बारीकी से तो सीबीआई के जासूस भी नहीं समझ सकते होंगे. यहाँ आकर शंका एक निश्चित ठिये पर ठहर जाती है कि, क्या कामनवेल्थ खेल के हुए अरबों रूपयों के काले कारनामों को छुपाकर रखने तथा उसके अपराधियों को कानूनी सजा मिलने के ड़र से महत्वपूर्ण साक्षी के रूप में सुधीर नाथ अदालत में हाजिर न हो पाये इस कारण से जानबूझकर किन्हीं अज्ञात अपराधियों की मदद से षड़यन्त्रपूर्वक सुधीर नाथ को रास्ते से हटाने के लिए उनकी ऐसी युक्ति से हत्या कर दी गई हो जिसे मैसिव हार्ट अटैक बताकर हमेशा हमेशा के लिए छुपा दिया गया हो.

अगर इस शंका में सचमुच कुछ आधार है तो यह भारत के प्रजातन्त्र और तत्कालीन सरकार के खाते में अपराधयुक्त भ्रष्ट राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा सिद्ध होगा .

जब मैंने अपनी पुरानी यादों को खंगाला तो दो महत्वपूर्ण स्मृतियां मेरी आँखों के सामने झूमने लगी. एक तो सुधीर नाथ की मृत्यु के लगभग एक महीने पहिले वह जब इन्दौर आए थे, तो वह मुझे हमेशा की तरह सामान्य और हंसमुख नजर नहीं आए. पूछने पर वह सिर्फ इतना कह कर टाल गए कि ‘आजकल काम का बोझ जरूरत से ज्यादा है इस कारण थोड़ी परेशानी रहती है.’

दूसरा वाकया मुझे याद आ रहा है, जब मैंने कुछ वर्ष पूर्व एक सामान्य चर्चा में पूछा था कि संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव कोफी अन्नान ने जो पॉल वॉल्कर जांच कमेटी बनाई है, उसका भारत से क्या सरोकार है. सुधीर जवाब टाल गए थे, सिर्फ इतना ही कहा था, ‘बड़े लोगों के बड़े गड्ढे होते हैं, नहीं जानो तो ही अच्छा है.’ मेरे बहुत पूछने पर भी उन्होंने कुछ नहीं बताया .

अभी एक दिन डॉ वर्मा के परिवार के साथ एक मित्र की बीमार पत्नी को देखने देवास जा रहा था, तभी रास्ते में मेरी सुधीर की मृत्यु के बारे में चर्चा हुई. हम सबका एक ही शक पुख्ता हो गया कि कहीं कॉमनवेल्थ घोटाले और सुधीर की मृत्यु में कोई रहस्यमय तार तो नहीं जुडे हैं?

सुरेश कलमाड़ी का सुधीर की मौत के बाद दाह संस्कार कराने में सक्रिय होना और बिना उनके इकलौते पुत्र सिद्धार्थ का इन्तजार किए, शवदाह करवा देना, यह बात हम सब के गले के नीचे उतर नहीं रही थी. पूरे प्रकरण में शंका और रहस्य का अन्देशा मुझे बार-बार टोक रहा था, कि जरूर कहीं न कहीं, कुछ तो गड़बड़ है.

मैंने सबसे पहिले इन्टरनेट पर सुधीर नाथ के मृत्यु के समाचारों के अखबारों को खंगाला. पता चला कि सुधीर नाथ इराक में हुए ‘तेल के बदले खाद्यान्न (Oil for Food)’ घोटाले में नटवर सिंह और सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की भूमिका की भारत सरकार द्वारा कराई गई प्राथमिक जांच समिति के ‘डायरेक्टर एन्फोर्समेन्ट’ के रूप में भी काम कर चुके थे.

जैसे ही मैंने सद्दाम हुसैन के जमाने में हुए ‘ऑइल फॉर फूड’ घोटाले के बारे में उपलब्ध जानकारी को देखा मेरे सामने एक-एक करके अनेक रहस्यमयी परतें खुल कर आगे आने लगीं.

मुझे लगा कि अकेले इस मुद्दे पर तो 1500 पेजों से अधिक की एक महत्वपूर्ण किताब लिखी जा सकती है. जिसका शीर्षक हो ‘इराक के तेल के बदले खाद्यान्न घोटाले में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भूमिका’.

मुझे समझ में आने लगा कि शशि थरूर को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन मंत्रिमंडल में क्यों मंत्री बनाया गया. एक भूतपूर्व उपराष्ट्रपति के चिरंजीव को ईनाम के बतौर अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में न्यायाधीश कैसे बनाया गया.

भोपाल की गैस त्रासदी में मरे 3500 लोगों के मुआवजे की रकम जो कि अमेरिकन कानून के हिसाब से तीन अरब तीस करोड़ डालर होती थी, उस प्रकरण में अर्जुन सिंह के दखल से अपराधी को सरकारी विमान में बैठाकर भोपाल और भारत से भगा कर ‘आऊट ऑफ़ कोर्ट’ समझौता करके तीन अरब तीस करोड़ डालर के दावे को महज चार करोड़ सत्तर लाख डालरों में समझौता कराया दिया गया और अपराधी एण्डरसन तथा उसकी कम्पनी युनियन कारबाईड़ के विरूद्द आपराधिक प्रकरण से मुक्त कर दिया गया.

पता नहीं टेबल के नीचे हाथ मिलाने पर इस समझौते से किन-किन लोगों की हथेलियों में गरम खुजली चली होगी. भोपाल गैस त्रासदी के ‘आऊट आफ कोर्ट’ समझौता करने वाले वही सज्जन थे, जो किसी जमाने में इलाहाबाद में वकालत करते थे.

कहा जाता है कि अपने महामहिम पिताश्री के रूतबे के कारण पहले हाइकोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिये गए. भारत की सुप्रीम कोर्ट ने बाद में उनके इस समझौते को दरकिनार करके एन्डरसन को भगोड़ा घोषित कर दिया. पर इन महानुभाव को तो इनाम के बतौर तत्कालीन सरकार ने तरक्की देकर हेग भेज दिया.

अपना खास जज होने के कारण आगे चल कर इन्हें एक और जिम्मेदारी सौंपी गई, इराक के ‘ऑयल फॉर फूड’ घोटाले में फंसी सत्तारूढ़ पार्टी को साफ सुथरा बचाने की.

हुआ इस प्रकार था कि कुवैत पर आक्रमण करके सद्दाम हुसैन ने जब कुवैत पर कब्जा कर लिया तब अमेरिकन फौजों ने हमला करके सद्दाम हुसैन की फौजों को इराक वापिस भेज कर कुवैत को मुक्त करा दिया था.

इसके बाद सद्दाम हुसैन के इराक की आर्थिक नाकेबन्दी कर दी गई. उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन थे. नाकेबन्दी के कारण सद्दाम हुसैन तेल बेच नहीं पा रहे थे. इसके फलस्वरूप इराक में आम जनता को खाने पीने के सामान की कमी आ गयी. लोग भूख और दवाईयों की कमी के कारण पर बड़ी संख्या में मरने लगे.

मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उछला. नियमानुसार आवश्यकता के अनुरूप इराक को खाद्य पदार्थ और नागरिकों को दवाईयॉ देने के लिए आवश्यक धनराशि के बराबर की कीमत का तेल बेचने की अनुमति दी गई.

सद्दाम हुसैन ने फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका के दलालों को भारी कमीशन की रिश्वत देकर जमकर नियत सीमा से भी ज्यादा तेल बेच दिया. इस षड़यन्त्र में इंग्लैंड के मेम्बर आफ पार्लियामेन्ट तक शामिल पाये गए थे.

भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री कुंवर नटवर सिंह ने भी अपने बेटे के नाम की आड़ लेकर बहती गंगा मे हाथ धोने का मौका नहीं छोड़ा. इराक पर अमेरिका के कब्जे की तारीख तक अर्थात 21 नवम्बर 2003 तक इराक पर यह आर्थिक प्रतिबन्ध लागू रहे.

इस दौरान दुनिया की 248 कम्पनियों के नाम पर 64 अरब 20 करोड़ ड़ालर का इराकी तेल बेचा गया. बदले में दुनिया भर की 3614 रजिस्टर्ड कम्पनियों से इराक की सरकार ने खाद्य सामग्री दवाईयॉ और अन्य आवश्यक जरूरी सामान खरीदा.

लगभग नौ महिने बाद 25 जनवरी 2004 को प्रकाशित अल-मादा नामक इराक के एक अरबी अखबार ने सनसनीखेज़ भंडाफोड़ किया और बताया कि ‘ऑयल फॉर फूड’ प्रोग्राम में दुनिया भर के दिग्गज बेईमानों ने संयुक्त राष्ट्र संघ की आड़ में अरबों डालरों का घपला किया है.

अखबार ने घपला करने वाले और बेईमानी से कमीशन-रिश्वत लेने वालों के नाम भी छाप दिए. फिर क्या था… पूरी दुनिया के अखबार इसकी जानकारी से भर गए.

इंग्लैंड के सांसद जार्ज गलोवे (George Galloway), फ़्रांस के मिनिस्टर चार्ल्स पस्कुआ(Charles Pasqua) और अमेरिका का इराकी व्यापारी शकेर अल कफाजी (Shaker al-Kaffaji), भारत के विदेश मंत्री नटवर सिंह और सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी का नाम घूसखोरों और बेईमानी से अरबों का घपला करने वालों के नामों की काली सूची में छप गए.

पर अल मादा अखबार के उस अभागे रिपोर्टर की घपले का भण्डाफोड़ करने के ‘अपराध’ में गोली मार कर हत्या कर दी गई. इस घपले की सबसे पहिले खबर देने वाले खबरनवीस को शहीद कर दिया गया.

यूएनओ के महासचिव ने अप्रेल 2004 में संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव नम्बर 1538 के अन्तर्गत इराक के ‘तेल के बदले अनाज’ योजना के भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की जांच करने के लिए एक आयोग बनाया.

इस आयोग के अध्यक्ष अमेरिका की सर्वोच्च न्यायालय के जज पॉल वॉल्कर (Paul Volcker) बनाए गए. अन्य दो सदस्य दक्षिण अफ्रीका के जज रिचर्ड गोल्डस्टोन और स्विट्ज़रलैंड के बैंकिग मामले के विशेषज्ञ प्रोफेसर मार्क पीथ बनाए गए.

29 अगस्त 2005 को वॉल्कर रिपोर्ट ने बताया कि कांग्रेस पार्टी और नटवर सिंह को लगभग 20 लाख गैलन तेल इराक से सस्ते दामों में खरीद कर चोर बाजार में भारी मुनाफा कमाकर खुद ही हजम करने और अपनी सत्तारूढ पार्टी को घूस के रूप में देने का दोषी पाया गया है.

अर्थात कांग्रेस पार्टी और नटवर सिंह ने छ: करोड़ बयालीस लाख डालर अर्थात 441 करोड़ रूपयों की अफरातफरी करके इतनी भारी भरकम धनराशि खुद ही ड़कार ली.

कहा जाता है कि वॉल्कर रिपोर्ट के अनुसार भारत की कांग्रेस पार्टी इराक का दस लाख बैरल तेल अकेले ही पी गई. इस 500 पेजी रिपोर्ट में 66 देशों की 2200 कम्पनियों का ऑडिट किया गया था.

वॉल्कर रिपोर्ट की खबर लगते ही भारत के हिन्दू, टाइम्स आफ इंडिया सहित सभी अखबारों में हो हल्ला मच गया. राजनीतिक गलियारे गूंजने लगे. इंडिया टुडे ने अपना एक विशेष अंक ही प्रकाशित कर दिया.

मनमोहन सरकार भी चौंक गई. सबके सामने एक ही प्रश्न था कि कांग्रेस पार्टी यानि सोनिया गांधी की इज्जत इस वॉल्कर कमेटी की रिपोर्ट से कैसे बचाई जाए. रणनीति बनाई गई. पार्टी के धुरन्धर दिग्गजों ने इज्जत बचाने का रास्ता खोजा.

नटवर सिंह को बलि का बकरा बनाकर पार्टी से निकाल दिया गया. मंत्री पद भी छीन लिया. लीपापोती करने के लिए ताबड़तोड़ शशि थरूर को न्यू यॉर्क से भारत बुलाया गया, और यूएन रिपोर्ट की काट ढूंढने की तिकड़म खोजी जाने लगी.

थरूर, प्रधानमंत्री से 10 नवम्बर 2005 को इस मसले पर चर्चा करने के लिए लगभग आधा घन्टा मनमोहन सिंह के साथ रहे. पार्टी के हितैषी और कानूनी जामा ओढ़कर एण्डरसन प्रकरण के खतरों से रक्षा करने वाले महानुभाव को इस संकट से कांग्रेस को उबारने के लिए फिर से याद किया गया. पाठक इन्क्वायरी कमेटी बनाई गई.

वॉल्कर रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण करने की जिम्मेदारी स्व सुधीर नाथ की ही थी. एक ईमानदार अफसर सुधीर ने पाठक अथॉरिटी के सामने सही-सही तथ्य ही रखे होंगे. इसकी पुष्टि उनकी नोट-शीटों से आज भी की जा सकती है.

साफ मामला था, भारत की 129 कम्पनियों से घूस ली गई, ठेके दिए गए, नटवर सिंह के बेटे जगत सिंह का नाम उजागर किया गया, 19 लाख बैरल तेल सीधे-सीधे स्विस कम्पनी मेसफेल्ड को बेच दिया गया.

बिचौलियों का नाम हमदीद एक्सपोर्ट और अन्दलीब सहगल बताया गया. पर घपले का पूरा ठीकरा नटवर सिंह के सिर पर फोड़कर कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी को बचा लिया गया. जबकि वॉल्कर रिपोर्ट में कांग्रेस पार्टी यानि सोनिया गांधी की घपले में भागीदारी साफ-साफ दर्शायी गई है.

आम चर्चा है कि पाठक इन्क्वायरी रिपोर्ट 7 अगस्त 2006 को सबके सामने लीपा पोती करके प्रस्तुत कर दी गई, जिससे कि इस रिपोर्ट के आधार पर घपले से कांग्रेस की भूमिका को शून्य करके, उसका घपले से पल्ला झाड़ने का मौका दे दिया जाए.

पर वॉल्कर रिपोर्ट गलत नहीं हो सकती. अब अगर करोड़ो रूपयों की घूसखोरी कांग्रेस पार्टी ने नहीं की तो किसने की है.. क्या सोनिया गॉधी ने? इसका उत्तर पाने के लिए शायद नटवर सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘एक ही जिन्दगी काफी नहीं है’ के पन्ने पलटना पड़ेंगे. जिसके बारे में पुस्तक को सोनिया गांधी ने ‘रबिश’ (बकवास) की संज्ञा दी है.

अभी वॉल्कर रिपोर्ट की आग ठंडी नहीं हुई थी कि कॉमनवेल्थ गेम्स का समय आ गया. इस ऐतिहासिक घोटाले के समय खेल विभाग के सचिव के तौर पर सुधीर नाथ ही कार्यरत थे. अरबों-खरबों रूपयों की हेराफेरी पकड़ी गई. सुरेश कलमाड़ी को जेल की हवा भी खानी पड़ी.

सीबीआई की जांचों में जो पुख्ता सबूत मिले होंगे उन नोटशीटों को सुधीर नाथ ने ही तैयार कराया होगा. पुख्ता सबूतों के महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में अदालत में सुधीर नाथ की गवाही निश्चित ही बहुत महत्वपूर्ण रही होगी. पर यदि महत्वपूर्ण गवाह की हत्या करके उसे रास्ते से हटा दिया जाए तो अपराधियों को शंका का लाभ देकर अदालत से छुटकारा मिलने की सम्भावना बढ़ ही जाती है.

ऐसे में इस परिकल्पना को आधार मानकर यदि यह निष्कर्ष निकाला जाए कि चूंकि स्पोर्ट सेक्रेटरी होने के नाते कॉमनवेल्थ गेम्स के घोटाले की सब बारीकियों से सुघीर वाकिफ रहे होंगे, इस कारण अज्ञात तरीके से उनकी हत्या इस प्रकार कर दी गई कि वह हत्या न लगते हुए हृदय गति रूकने के हादसे के रूप मे दर्शाई जा सके और घोटालेबाजों को बचने का मौका मिल सके.

तो फिर क्या सुधीर नाथ की हत्या की गई थी? यह आज भी एक अबूझी पहेली है.

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