स्थापित मीडिया की ज्ञानशून्यता

आज सुबह हिंदुस्तान हिंदी अखबार के संपादकीय पर नजर गयी, अखबारों का यह पन्ना मैं सबसे पहले खोलने का आदी रहा हूँ.

आज का संपादकीय लेख विमुद्रीकरण (नोटबंदी) पर है, जिसमे केंद्र सरकार के पुराने 5 सौ और हजार रूपये के नोटों की तय संख्या और उससे ज्यादा रखने पर दंड और सजा के प्रावधानों के साथ कल आये अध्यादेश के बारे में बात की गयी है.

अखबार के प्रधान संपादक श्री शशिशेखर को इस संपादकीय का जिम्मेदार मानते हुए, सोशल मीडिया के मंच ट्वीटर के जरिये यह बात सीधे संपादक जी तक पहुंचाने के साथ ही कुछ बातें यहां कहना चाहूंगा.

अखबार, नोटबन्दी और इस अध्यादेश के बारे में कई झूठी बातों के साथ यह भी कहता है कि : सरकार को यह अध्यादेश लाने की क्या जरूरत थी? पूरा संपादकीय ई-पेपर के माध्यम से संलग्न है.

सोशल मीडिया में इस अध्यादेश की चर्चा के बाद नारेबाजियों और विरोध के मारों की कई अफवाही पोस्टें पिछले दो दिनों से देख रहा था और अर्थशास्त्र पर कमअक्ली के उन तमाम चुटकुलों को नजरअंदाज करता रहा, लेकिन जब आज एक स्थापित मीडिया की ज्ञानशून्यता, वह भी उसके संपादकीय में देखी तो यह जरुरी समझता हूँ कि इस बार बात की जाए.

भारतीय रिज़र्व बैंक एक रूपये के नोट को छोड़ कर बाकी सभी नोटों पर “मैं धारक को अमुक रूपये देने का वचन देता हूँ” आरबीआई के गवर्नर की दस्तखत के साथ हमारे-आपके हाथों में देता है.

इसका अर्थ हुआ कि आरबीआई इस बात के लिए वचनबद्ध है कि ऐसे हर नोट रखने वाले को उसकी कीमत अदा की जाए. ऐसा करने के लिए आरबीआई और भारत की सरकार संवैधानिक रूप से बाध्य है.

अब जबकि आरबीआई ने अपने जारी किये गए 5 सौ और हजार के नोटों को अवैध घोषित करते हुए उसका चलन बंद कर दिया है तो उसके सामने यह संवैधानिक बाध्यता आ जाती है कि वह इस अध्यादेश के जरिये “धारक को अमुक रूपये अदा करने के वचन” की बाध्यता को अंतिम रूप से खत्म करे. ताकि कोई भी धारक अब आरबीआई से नोट की कीमत अदा करने का अधिकार न मांग सके, क्योंकि यह मुद्रा अब अवैध हो चुकी है.

यह एक बेहद सामान्य संवैधानिक और तकनीकी प्रक्रिया है, जिसे औपचारिक तौर पर पूरी दुनिया में हर विमुद्रीकरण (नोटबंदी) के बाद किया ही जाता है, करना जरुरी होता है.

देश में जनता पार्टी की सत्ता के दौरान भी हुई नोटबंदी के समय इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन किया गया.

डीमॉनिटाइज़ेशन यानी विमुद्रीकरण की प्रक्रिया इस औपचारिकता के बाद ही अंतिम तौर से पूरी मानी जाती है, संवैधानिक और विधिक रूप से.

यही कारण है कि सरकार ने बंद किये जा चुके 5 सौ और हजार के 10-10 नोट शौकिया या यादगार के तौर पर रखने की सीमा तय करते हुए जुर्माने और सजा का प्रावधान किया है.

साथ ही उचित और कुछ तय कारणों के साथ मार्च के महीने तक आरबीआई अब भी नोट बदलती रहेगी.

ऐसे में एक तथाकथित रूप से स्थापित और स्तरीय होने के दावे वाले किसी अखबार का संपादकीय पन्ना इस जरुरी और सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया पर न सिर्फ भ्रम फैलाये बल्कि झूठ और लफ्फाजी लिखे तो इसे क्या कहिएगा?

मुझे लगता ही नहीं बल्कि सीधा आरोप है कि यह संपादकीय खुद श्री शशिशेखर जी ने नहीं लिखा बल्कि किसी औसत से भी कम जानकार ने लिखा है.

और अगर शशि जी ने लिखा है तो बिना किसी खेद के यह कहूंगा कि उन्हें अर्थशास्त्र, विमुद्रीकरण और उसकी संवैधानिक, विधिक प्रक्रिया की शून्य जानकारी है. निश्चित ही यह स्थापित मीडिया के लिए एक गंभीर और शोचनीय स्थिति है.

सच लिखने का सामर्थ्य न हो तो झूठ, अफवाह और लफ्फाजी ऐसे विषयों पर मत लिखिए : वरना लोकतंत्र का कथित चौथा खंभा…. जानवर विशेष के लिए टांग उठा कर शारीरिक आर्द्रता विसर्जन मात्र का पाया बन कर रह जाएगा.

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