हिन्दुओं में आक्रामकता की कमी

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हिन्दू समाज एक ऐसा समाज है जो यह झूठा दावा नहीं करता कि उसके नाम का अर्थ “शान्ति” है, फिर भी उसे संसार का सबसे अधिक शान्तिप्रिय समाज समझा जाता है. संसार में एक भी देश ऐसा नहीं है, जहां हिन्दू कम या अधिक संख्या में रहते हों और उनके कारण वहां के मूल निवासियों या किसी अन्य समुदाय को कोई समस्या या शिकायत उत्पन्न हुई हो.

इसका कारण यह है कि सब जानते हैं कि हिन्दू समाज ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के सिद्धान्त का मात्र प्रचार नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से पालन भी करते हैं. इसी कारण संसार के सभी लोग हिन्दुओं का सम्मान करते हैं. हालांकि इसी सिद्धान्त का अगला भाग ‘धर्म हिंसा तथैव च’ भी है, लेकिन उसका उपयोग कोई नहीं करता. इसी प्रकार ‘शठे शाठ्यम् समाचरेत्’ भी हिन्दुत्व के मूल सिद्धान्तों में से एक है, लेकिन इसका प्रयोग बहुत मजबूरी होने पर ही किया जाता है.

कहावत है कि अति हर चीज की बुरी होती है. यह कहावत हिन्दुओं पर सही बैठती है. अत्यधिक शान्तिप्रियता की भारी कीमत हिन्दुओं को भूतकाल में चुकानी पड़ी है और आज भी चुका रहे हैं. हिन्दुओं की शान्तिप्रियता का अनुचित लाभ कुछ ऐसे तत्व या समुदाय उठाते रहे हैं, जो येन-केन-प्रकारेण अपने तथाकथित धर्म को विश्व के सभी लोगों पर थोपने का सपना देखते हैं.

संसार के धर्मांध व्यक्ति अपने तथाकथित धर्म को सही ठहराने के लिए हिन्दुओं का अपमान कर देते हैं. वे हिन्दुओं को अपमानित और पीड़ित करने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते. उनको यकीन है कि हिन्दू समाज यदि अपने अपमान या अत्याचार का प्रतिरोध करेगा भी तो केवल शाब्दिक तौर पर या प्रदर्शन आदि करके. वे जानते हैं कि हिन्दू समाज में कोई आक्रामकता नहीं है इसलिए वह अपने बड़े से बड़े अपमान को ‘पागलों की बकवास’ कहकर भूल जाता है या ‘भाग्य’ मानकर सहन कर लेता है.

येरूशलम में किसी मस्जिद पर किसी आतंकवादी गुट ने हमला किया, तो वे इसका बदला भारत में हैदराबाद में हिन्दुओं के मन्दिरों को तोड़कर चुकाते हैं. बामियान में महात्मा बुद्ध की मूर्तियों को तोप से तोड़ने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता. एक समुदाय को हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र जूते-चप्पलों पर या टाइलेट पेपर पर छापने में कोई शर्म नहीं आती. एक तथाकथित कलाकार को हिन्दू धर्म की पूज्य देवियों के नग्न और अश्लील चित्र कैनवास पर उकेरने में कोई झिझक महसूस नहीं होती, क्योंकि उसे पता है कि हिन्दू समाज इसके लिए उसके खिलाफ कोई ‘मौत का फतवा’ जारी नहीं करेगा.

जब हम हिन्दू समाज की इस प्रवृत्ति की तुलना अन्य समाजों से करते हैं, तो उनका अन्तर स्पष्ट हो जाता है. यूरोप के किसी छोटे से देश के किसी नामालूम से अखबार में पैगम्बर मोहमद का एक कार्टून छप जाने पर पूरी दुनिया में मुसलमान सड़कों पर उतर आये और तबाही मचा दी. एक लेखक ने अपने एक उपन्यास में किसी धार्मिक ग्रंथ का हवाला देकर एक कहानी लिखी, तो उसके खिलाफ ‘मौत का फतवा’ जारी कर दिया गया. बेचारे लेखक को अपनी जान बचाने के लिए नाम और वेष बदलकर अज्ञातवास करना पड़ा. एक फिल्म में ईसा की जिन्दगी की छिपी हुई कहानी दिखाई गयी, तो पूरी दुनिया के ईसाई उस फिल्म के पीछे पड़ गये.

इन और ऐसी सभी घटनाओं का विश्लेषण करने से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि सबको यह विश्वास है कि हिन्दुओं के साथ चाहे जैसा व्यवहार कर लो और उनका चाहे जितना अपमान कर लो, उनकी तरफ से कोई हिंसक प्रतिक्रिया होने की कोई संभावना नहीं है. हालांकि हिन्दू समाज कायर या शक्तिहीन नहीं है, लेकिन उसे यह सिखाया गया है कि अपनी शक्ति का प्रयोग कम से कम करो. उसको यह बताया जाता है कि जब संसार में पाप बढ़ जायेगा, तो भगवान स्वयं अवतार लेकर पापियों को दण्ड दे देगा, इसलिए उसे स्वयं कुछ करने की आवश्यकता नहीं है. यह प्रवृत्ति ही हिन्दुओं की वर्तमान समस्याओं का कारण है. यदि हिन्दुओं में दूसरे समाजों की तुलना में अंशमात्र भी आक्रामकता होती, तो उसकी ये समस्यायें बहुत कम हो जातीं.

इसलिए हिन्दुओं को अब अपने अपमान और अपने ऊपर किये जाने वाले अत्याचारों का प्रतिकार स्वयं ही करना चाहिए, किसी भगवान या अवतार के भरोसे नहीं बैठे रहना चाहिए. दूसरे शब्दों में, हिन्दुओं को कुछ मात्रा में आक्रामक होने की आवश्यकता है. यह आक्रामकता मात्र उतनी ही होनी चाहिए जितनी अपने सम्मान की रक्षा के लिए आवश्यक है.

किसी को पीड़ित या आतंकित करने के लिए इसका उपयोग कभी नहीं होना चाहिए. हिन्दू युवकों को ऐसा संगठन बनाना चाहिए, जो हिन्दुत्व का अपमान करने पर अपमानकर्ता को उचित और आवश्यक दंड दे सके. बजरंग दल ऐसा संगठन हो सकता था, परन्तु राम मंदिर का जोश ठंडा पड़ जाने पर यह संगठन भी शक्तिहीन होकर रह गया है. अब या तो इस संगठन को पुनर्जीवित किया जाये या एक नया रक्षक दल बनाया जाये, जिसमें हिन्दू युवकों को स्वास्थ्य निर्माण के साथ ही शक्ति के प्रयोग का भी प्रशिक्षण दिया जाये. अगर हम धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा.

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