ऐसे विश्व रैंकिंग में पिछड़ते हैं भारतीय विश्वविद्यालय : भाग 2

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कुछ दिन पहले मेरे लिये सबसे बड़ी खबर थी कि पैरा ओलम्पिक में गोल्ड मेडल विजेता मारियप्पन थांगवेलु ने तीस लाख रूपये अपने स्कूल को डोनेट कर दिये.

[ऐसे विश्व रैंकिंग में पिछड़ते हैं भारतीय IIT : भाग 1]

ये खबर इतनी बड़ी क्यों है, क्या इसके पहले किसी ने डोनेशन नही दिया, क्या ये रकम बहुत बड़ी है….

नहीं, पर इस खबर के बहाने आप को उस सवाल का जवाब जरूर मिल सकता है जिसे सुन कर हर साल शायद हम सब को शर्म महसूस करनी पड़ती है.

आखिर क्यों हमारी कोई कॉलेज-यूनिवर्सिटी विश्व की टॉप 200 में भी जगह नहीं बना पाती!!!

कारण बहुत से हैं जैसे… यूनिवर्सिटी या कॉलेज जिन में बड़ी संख्या में ग्रेजुएट पास आउट्स नहीं होते उनको कम तवज़्ज़ो दी जाती है, हमारे IIMs जैसे कॉलेज इन कारणों से पीछे रह जाते हैं.

रिसर्च पेपर्स, अपने देश में बड़े कॉलेज मुख्यतः स्पेशलाइज़्ड कोर्स मुहैया कराती हैं जैसे आईआईटी इंजीनियरिंग या आईआईएम मैनेजमेंट में तो इनके रिसर्च का दायरा भी इन्ही कोर्स के दायरे में होता है.

वहीं अधिकतर यूरोपियन और अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ में सभी मुख्य स्ट्रीम्स में कोर्सेज़ होते हैं.

स्टूडेंट्स की संख्या की भी तुलना करें. आईआईटी के पांच हज़ार की तुलना में किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटी में औसतन तीस हजार स्टूडेंट्स होते हैं जिससे रिसर्च का वॉल्यूम बहुत ज्यादा होता है.

एक जो महत्वपूर्ण विषय है वो है यूनिवर्सिटी या कालेज को मिलने वाली रिसर्च ग्रांट.

हमारे एकेडमिक कल्चर में कॉर्पोरेट फंडेड रिसर्च का चलन बहुत कम है, वहीं अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ को गूगल, आईबीएम, फेडेक्स, डिओडी जैसे संस्थानों से भारी रिसर्च ग्रांट्स मिलती है.

इसके अलावा हमारे कल्चर में समाज को वापस देने की भावना की कमी है.

अमेरिका और यूरोप के देशों में पूर्व छात्र अपनी यूनिवर्सिटीज़ को वापस देने की भावना से रिसर्च ग्रांट्स, डोनेशन और कई बार मरने के बाद अपनी पूरी प्रॉपर्टी कॉलेज के नाम कर जाते हैं. इस पैसे का इस्तेमाल स्टार्टअप फंडिंग, रिसर्च फंडिंग आदि में किया जाता है.

हारवर्ड के पास इस समय 32 बिलियन यूएसडी की दान की संपत्ति है, स्टैंडफोर्ड के पास 16 बिलियन और येल के पास 19 बिलियन.

वहीं इसकी तुलना में हमारे यहां सारी उच्च शिक्षा का भार सरकार ढोती है और इसका सालाना बजट 3 बिलियन है.

सवाल सिर्फ फंड्स का नहीं है. सवाल है, क्या हमारे अंदर समाज को वापस देने की भावना ज़िंदा है, आखिरी बार कब हम अपने स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी गये थे.

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