स्वविवेक ही उनका धर्म था, धर्मानुकूल परिणाम उनकी ज़िद

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मंथन महाभारत का… अधर्म धृतराष्ट्र, दुर्योधन और कर्ण का… धर्म भीष्म, युधिष्ठिर और कृष्ण का

धृतराष्ट्र – ये जन्म से अंधे थे और बचपन से ही ये बात मन में बैठ गयी कि सिर्फ अंधे होने की वजह से उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किये जाने की कोशिश की जाती रही.

अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के लालच में हमेशा दूसरे के अधिकारों को छीना…. और फिर भी पेट नहीं भरा तो अपने नाजायज़ अधिकारों की भूख अपने बेटे के माध्यम से मिटाने की कोशिश की.

लेकिन वंचित होने की मानसिकता बचपन से ही कुछ ऐसे गहरे धंसी कि वो सब कुछ होने के बावजूद, दूसरों का छीन-छीन कर अपनी झोली भरते रहने पर भी आजीवन खुद को वंचित ही समझते रहे और मरते दम तक वंचित रहे।

दुर्योधन – पिता के विचार इसे विरासत में मिले. दूसरों के अधिकारों को छीनकर अपना एकछत्र एकाधिकार चाहा…. अपना दुःख नहीं बल्कि दूसरों का सुख देखकर आजीवन जलता, कुढ़ता रहा…..

सबसे बड़ी खासियत…. प्रतिभाशाली असंतुष्टों को अपने पक्ष में बटोरना, उनकी प्रतिभा का अपने स्वार्थ के लिये दुरुपयोग करना, उन पर उस वक्त अपने एहसान लादना जब वो समाज में खुद को तिरस्कृत महसूस कर रहे थे…

लोहा गरम देखकर मौके पर चोट करता था….. इस विद्या से उसका सबसे बड़ा हांसिल कर्ण था… भारत के वामपंथियों को चाहिये चे ग्वेरा की जगह अपने इस विशुद्ध भारतीय देवता दुर्योधन की पूजा आराधना करें…

कर्ण – असंतुष्ट… प्रतिभावान… माँ द्वारा त्याग दिये जाने का दर्द शूल की भांति सीने में चुभता रहा, सूतपुत्र कहकर द्रौपदी ने उसे अस्वीकार किया…. प्रतिभावान और योग्य होने के बावजूद उसे महत्व नहीं मिला, अधिकार नहीं मिला….

इन सारी बातों ने मिलकर कर्ण के जीवन को नकारात्मकता की तरफ धकेल दिया…. उसकी सारी प्रतिभा, योग्यता…. खुद को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने, विध्वंस करने में, प्रतिशोध, कुंठा, नकारात्मकता में भस्म हो गयी…. और वो अधर्म के प्रसार का उपकरण बना….

स्वघोषित महादानी होने के बावजूद वो दुनिया को कुछ दे ना सका…. अपनी उपयोगिता को शून्य पर पहुंचा दिया…. सिर्फ अर्जन करता रहा…. कभी धर्म से तो कभी अधर्म से।

भीष्म – वैसे तो भीष्म ने आजीवन धर्म के रास्ते पर चलने की कोशिश की पर वो धर्म के सूक्ष्म रूप को ना समझ सके….. उनका धर्म व्यक्तिगत रहा… उन्होंने सिर्फ त्याग को ही अपना धर्म बना लिया….. परिणाम उचित होगा या अनुचित… समाज उससे कैसे प्रभावित होगा इसी चिंता नहीं की….

भीष्मता का सिंहासन इतना ऊंचा उठ गया कि भीष्म कभी उस सिंहासन का लोभ छोड़ ना सके…. खुद के व्यक्तित्व पर कोई आंच ना आये, महानता पर धब्बा ना लगे… इसलिये आजीवन तटस्थ बने रहे, आँखों के सामने अन्याय होता देख चुप रहे…. लेकिन प्रतिज्ञा बचाने के व्यक्तिगत लोभ को त्याग नहीं सके…. और महाभारत की सबसे बड़ी वजह बने…

महाभारत के बीज उसी दिन पड़ गए थे जब उन्होंने अपने वृद्ध पिता शान्तनु की अनुचित इच्छा को पूरा करने के लिये सौदेबाजी कर सत्यवती से उनका विवाह कराया।

भीष्म ने हमेशा खुद को समाज से ऊपर रखा, खुद का धर्म बचाने के लिये मानव धर्म की क्षति होते देख चुप रहे…. प्रतिज्ञा बचा ली महाभारत करा गये।

युधिष्ठिर – धर्मराज युधिष्ठिर…. धर्म की राह पर चलना जीवन का उद्देश्य बनाया लेकिन आसक्ति नहीं छोड़ सके… धर्म के प्रति आसक्ति, धर्मराज कहलाने के प्रति आसक्ति, रक्त संबंधों की आसक्ति, आचरण की आसक्ति, अपने सिद्धांतों के प्रति आसक्ति….

इनका धर्म भी नितांत व्यक्तिगत रहा…. कभी व्यक्तिगत धर्म से ऊपर ना उठ सके…. समाज पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है, महत्व नहीं दिया, व्यक्तिगत छवि को धर्मपरायण बनाये रखना सर्वोपरि रहा, इनकी सोच खुद के लिये अच्छी और समाज के लिये घातक सिद्ध हुई….. इनके धर्म ने समाज का कुछ भला नहीं किया….

कृष्ण – महाभारत शतरंज की बिसात थी तो कौरव-पांडव, दोनों पक्ष के मोहरे…. हर एक मोहरे की चाल कृष्ण ने तय की….. किसे, कैसे, कब, शह या मात देनी है ये निर्णय कृष्ण का था….

कृष्ण परिस्थितियां बनाते चले गये… मोहरे को उनकी चाल चलने का रास्ता दिखाते रहे और खेल आगे बढ़ता गया…. लेकिन परिणाम कृष्ण ने पहले ही तय कर रखे थे…. खेल शुरु करने का उनका मकसद था…. अधर्म पर धर्म की विजय…

कृष्ण ने धर्म के उस सूक्ष्म रूप को समझा जो युधिष्ठिर और भीष्म कभी नहीं समझ सके… उन्होंने व्यक्तिगत मान सम्मान को कभी महत्व नहीं दिया… कभी नहीं सोचा इतिहास उनकी छवि कैसी लिखेगा….

कृष्ण धर्म की किसी भी परिभाषा में लकीर के फकीर नहीं हुये… स्वविवेक ही उनका धर्म था…. धर्मानुकूल परिणाम उनकी ज़िद…. जैसा परिणाम चाहते थे, पाकर रहते थे… और उसे पाने के लिए अपनाया गया हर रास्ता, धर्म का रास्ता बन जाता था….

कृष्ण और युधिष्ठिर के धर्म में यही अंतर रहा…. कृष्ण का धर्म खुद के लिये नहीं समाज के लिये था…. उन्होंने हमेशा अनासक्त होकर निर्णय लिये… रिश्तों के बंधन भी उन्हें धर्म के मार्ग से विचलित नहीं कर सके…. महाभारत में अधर्म पर जिस धर्म की विजय हुई वो धर्म कृष्ण का था…

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