आतिशी गेंदबाजी, धुआँधार बल्लेबाजी, हद्द है!!!

cricket article by vaishnavi making india

“क्रिकेट” में मुझे बिलकुल इंटेरेस्ट नहीँ, फ़िर भी जब-तब मैं इसे देखने बैठ ही जाती हूँ. कभी ‘विराट की आँखें’ तो कभी ‘सिद्धू की बातें’ मुझे बोर जो नहीं होने देतीं. इन सबसे भी बढ़कर जो मेरे लिये मज़ेदार होता है वो है अगले दिन के न्यूज़ पेपर में इन ‘शानदार’ मैचेज़ की ‘जानदार’ कवरेज़.
जेंटल्मेन का खेल कहलाने वाले इस खेल को देखते हुये मुझे आज तक कोई ऐसा दर्शक नहीं मिला जो इसे जेंटल्मेन की तरह देखता हो. सीटियां बजाना, तालियां पीटना (चाहे अकेले ही क्यों न देख रहे हों) और मैदान में खेलते खिलाड़ी को अपने घर के सोफ़े पर से ही बैठे-बैठे जोर-जोर से कभी शाबाशी तो कभी उलाहना देते देखना मेरे लिये आम नज़ारे हैं.

क्रिकेट प्रेमियों में क्रिकेट की दीवानगी से तो सारी दुनिया वाक़िफ़ है पर मैं आपको बता दूँ कि क्रिकेट और उसकी दीवानगी सिर्फ़ खेल के मैदान में ही देखने नहीं मिलती बल्कि अगले दिन के न्यूज़ पेपर में भी मिलती है.

उसकी कहानी सुनाते हुए न्यूज़ पेपर का ‘खेल जगत’ पृष्ठ भी कुछ ‘क्रेज़ी’ सा हो रहा होता है. आनँद की इतनी रोमांचक कल्पना मैंने किसी और खेल के पत्रकारों की कलम में नहीँ देखी. खेल में होने वाली हर घटना के लिये इनके पास अतिश्योक्ति की तो शब्द रूपी बाढ़ सी होती है.

इनकी कलम से लिखी मैच के घटना क्रम की कहानी में भी मेरे लिये मनोरंजन का खज़ाना होता है. हर एक वाक्य और उसके एक-एक शब्द में फीलिंग्स की तो हाइट होती है. जिसमें कैच होने पर फील्डर का बॉल को लपकना तो समझ आता है पर विकेट कीपर का विकेट लेने पर ‘विकेट झटकना’ काफ़ी मज़ेदार लगता है.

तो वहीँ ‘विकेट झटकना’ उत्साह की अति होने पर झटकने से ‘विकेट चटकना’ हो जाता है. मज़े और रोमांच में यहाँ चौके-छक्के लगाने की जगह ‘उड़ाये’ जाते हैं और अगर उत्साह चरम पर हो तो चौके-छक्के ‘उड़ाने’ से भी बढ़कर चौके-छक्के ‘जड़ देना’ हो जाता है.

प्लेयर के पिच पर टिके रहने को जहाँ मोर्चा सम्हालने की श्रेणी दी जाती है तो वहीं अगर वो अपनी टीम के लिये चौके-छक्के लगा रहा है तो उसकी बल्लेबाजी ‘धुआँधार बल्लेबाजी’ हो जाती है. अब मुझ अनाड़ी के हिसाब से बैट में धार तो होती नहीं और वहाँ धुआँ मुझे कभी दिखा नहीं आपको दिखा हो तो एंजाय कीजिये.

अब रही बात ‘आतिशी गेंदबाजी’ की तो ये तो हद्द ही है कोई पटाखे या फ़िर न जाने कौन सी आतिश होती है वहाँ दिखी तो कभी नहीं, पर मुझे यकीन है क्रिकेट प्रेमियों को ज़रूर नज़र आती होगी.

खैर बात सिर्फ़ इतनी है कि क्रिकेट का आनंद सिर्फ़ आप क्रिकेट प्रेमी नहीं लेते बल्कि मैं भी लेती हूँ. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि आप क्रिकेट का आनंद लेते हैं और मैं क्रिकेट से आनंद लेती हूँ. पर हाँ, “क्रिकेट” में मुझे कोई इंटेरेस्ट नहीं है.

– वैष्णवी लखेरा

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