Animal Farm को बैन करने वाले किस मुंह से करते हैं अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात!

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आजकल एक नया ट्रेंड चला है, या यूं कहिए वामी दल चला रहा है. अगर उनकी बात पर गौर करें तो ये लगेगा कि जो कुछ वे कर रहे हैं वो बिलकुल नॉर्मल बातें हैं. बस, ज़रा सा असहमति का प्रदर्शन है जो कि हर लोकतन्त्र में नागरिक का हक़ है और एक विश्वविद्यालय के कैम्पस में कुछ पाँच-छह सौ लोगों ने उसमें भाग लिया तो इसमें विचलित होने की कोई बात ही नहीं है.

ऊपर से चिढ़ाते हैं – क्या सरकार इतनी कमज़ोर है कि इतनी छोटी घटना से डर जाये?

इस सब का मतलब एक ही है, गलती पकड़ी गई है तो पीछा छुड़वाना है. अब इसके बाद वे धीरे से एक और बात चला देते हैं… क्या है वो बात?

वे कहते हैं कि आम भारतीय इनके विरोध में हैं ही नहीं. यह तो बस कुछ गिने चुने हिन्दुत्ववादी हैं, जिन्हें ये संघी कह कर पुकारते हैं. इन वामियों की नज़र में संघी होने से बुरा कुछ भी नहीं.

एक बार कुतर्क इस मेढ़े पर टिका दिया, फिर वहीं से ये शुरू हो जाते हैं. पूरी कवायद ये की जाती है कि संघी बुद्धि के पैदल होते हैं क्यूंकि अभी भी नब्बे साल पुरानी नेकर में घूमते हैं. संघी कूल डूड नहीं है. कुल मिलाकर बात को भटकाने की पुरजोर कोशिश करते हैं.

फिर शुरू हो जाएँगे कि इन्हें तो तर्क देना आता ही नहीं. हम से लड़ने आएंगे तो खदेड़ दिये जाएँगे. हमारे जैसा इनका कोई अभ्यास है ही नहीं. दो मिनट की चर्चा में देश के सामने धज्जियां उड़ा देंगे. पहले हमारे बराबरी में आओ फिर आगे की बात करेंगे.

मकड़जाल यही होता है, और उसे ही तोड़ना है. एक ही मार्के के सवाल से यह तिलिस्म टूटेगा.

इनके जो नित्यस्मरणीय भगवान हैं – लेनिन, चे, कास्ट्रो, माओ, हो चि मिन्ह – इन्होने किससे तर्क किए थे? कितने बुद्धूजीवी थे उनके साथ? या फिर, सत्ता में आने के बाद, कितने लोकतान्त्रिक रहे ये कम्यूनिज़्म के भगवान?

हर किसी ने लोकभावना को जगाया है. एक लहर की ताकत बनाई है और सत्ता हासिल की है. सत्ता में आने के बाद वही किया जो पिछले राज्यकर्ता करते आए, बस क़िबला बदल दिया इतना ही फर्क.

पहले के राजा-रानी अगर पुजारी वर्ग के सहारे खुद को ईश्वरीय अंश वगैरह बताते थे तो यहाँ इन्होने बिकाऊ विद्वानों को प्रश्रय दे कर नए लेबल बनवा लिए. चूंकि कृपा प्रार्थना के लिए कोई भगवान नहीं था, इन्होने शत्रु गढ़ लिए. प्रजा को जो मुश्किलें इनके कारण भुगतनी पड़ती उसके लिए कोई शत्रु जिम्मेदार ठहराया जाता.

सवाल उठाना… द्रोह! देश द्रोह, राज द्रोह जो मन में आए इलज़ाम लगा दो, पूछनेवाला कौन? जो सत्ता के खिलाफ था वो गणशत्रु घोषित हो जाता. अपनी ताकत का बेशर्म उपयोग कर के अन्य मुल्कों में भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन करने में कम्युनिस्ट कभी न हिचकिचाये.

एक किस्सा बताता हूँ…

आप तो जानते होंगे कि खोमेनी ने बिना पढ़े ही सलमान रश्दी की Satanic Verses को बैन करवाया था. वैसे इस्लाम तो गैर इस्लामियों की अभिव्यक्ति की आजादी वगैरा मानता नहीं कभी. जिंदा रहने देता है, वही मेहरबानी जताता है.

लेकिन वामियों ने Animal Farm को भी बैन करवा रखा था, यह भी आप को पता होना चाहिए. आप के कौन से मुंह से अभिव्यक्ति की आज़ादी के नारे लगा रहे हो कॉमरेड… असहिष्णुता की बू आ रही है.

भारत में इन्होने हिंदुओं की कमज़ोर नस जान ली. शान्तिप्रिय लोग हैं, सहनशील भी हैं. झट से झूठ पर भी विश्वास रख लेते हैं और पकड़े जाने पर भी माफ कर देते हैं. कम से कम जान से तो नहीं मारा करते.

पापी पेट के लिए होता है यह सब… कह कर आगे निकल जाते हैं. कुछ लोगों को छोड़, ज़्यादातर लोग झगड़े में नहीं पड़ना चाहते. ऊपर से त्राताहीन स्थिति. न नेता, न जात, कोई न देगा साथ. इसलिए सरकारी तंत्र से बच कर रहना स्वाभाविक सा हो गया.

Macaulay ने यह बात ठूंस कर भर दी थी कि भारत का ज्ञान तुच्छ है. उसकी Note मिल जाएगी नेट पर, पढ़ लीजिये. बड़ी तुच्छता से लिखता है कि समूचे भारत का ज्ञान जितना है वो यूरोप की किसी सामान्य लाइब्ररी के एक शेल्फ के बराबर है.

यही तुच्छता हिन्दुओं ने कुबूल भी की और जो अंग्रेज़ी जाने वो अधिक शिक्षित, यह समीकरण सा बन गया. अब जो बोले अन्ग्रेज़ी वो वाकई ज्ञानी भी है या बस करे हैं लफ्फाज़ी?

इनकी देशभक्ति (?) को परखने का हक हमें हो न हो, लेकिन दूसरों को विद्वान या मूर्ख ठहराने का टेंडर इन्होने अपने ही नाम निकलवा लिया है. विद्वान तो अपने खेमे से बाहर किसी को भी मानते नहीं – बशर्ते USA में कहीं कोई वृत्ति मिलती हो – लेकिन बाकियों को, सारे लाल कौवों का झुंड इकट्ठा हो कर मूर्ख सर्टिफाई कर देता है.

कहने का तात्पर्य यह है कि एक सोची समझी नीति के तहत भारत के युवा वर्ग में भारत के प्रति घृणा पैदा करने का इनका काम चल रहा है. काफी सफल भी रहे हैं क्यूंकी आज हमें अजीब नहीं लगता अगर कोई कहता है कि ‘इंडिया में रखा ही क्या है.’

इंडिया… भारत या हिंदुस्तान नहीं, यह बात नोट की जाये. फिर भी, यह भूमि और संस्कृति से नाभि-नाल का संबंध ही कहना चाहिये कि अभी भी कोई भारत का नुकसान करने की बात करता है तो NRI के भी खून में उबाल आता है.

इसी नीति के तहत जारी है हिंदुओं का बधियाकरण. अंग्रेज़ ने हिन्दू को नि:शस्त्र किया, काँग्रेस ने निस्तेज! वो भेड़ों की नस्ल बना कर रख दिया जिनके सींग भी नहीं आते.

और इस निस्तेजीकरण में सब से अग्रणी कौन थे? वामी… क्योंकि शिक्षा का महत्व वे जानते हैं.

The Left has played a stellar role in ensuring India has been left behind by a large gap – both physical and mental – behind the erstwhile masters and their colonial cousins who have taken on the White Man’s Burden for the profits it yields.

शिक्षा को प्रगति का मार्ग बनाया लेकिन मार्ग का टोल टैक्स काफी है, सो अपने आप इसी मार्ग को अपनाने वालों की संतति की संख्या कम हो गई. संतान बहुत बड़ी लागत हो गई जिसको हर झगड़े से सुरक्षित रखना माँ-बाप के लिए सब से अहम मुद्दा बन गया. इसमें संतान नर न रहकर nerd (पढ़ाकू / बुद्धिमान किंतु एकनिष्ठ व्यक्ति) बन गई लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि यही ठूंसा जा रहा था कि आप सही जा रहे हैं.

इस पीढ़ी को यह बताया जा रहा है कि संघर्ष केवल वैचारिक होते हैं और विचारों से ही विचारों का मुक़ाबला किया जा सकता है, और आप अगर भारतीय राष्ट्रभक्त हैं तो आप वामी नहीं हैं इसलिए ऑटोमैटिकली आप क्वालिफ़ाई भी नहीं करते. पहले कुछ पढ़िये, हमारे बराबरी में आइये, फिर सोचते हैं.

एक मिनट! विचारों से ही विचारों का मुक़ाबला किया जा सकता है यह बात एक हद तक ही सही होती है. अपना विचार, सबका विचार बनाकर सत्तारूढ़ पक्ष का विकल्प बना जाता है, लेकिन मुक़ाबला दोनों विरोधी विचारों से प्रेरित फौजों का होता है, दो लफ्फाजी करनेवालों का नहीं.

भारत लोकतन्त्र है इसलिए डिबेट सत्तान्तर में सहायक होती है. और इसीलिए ये वामी आप का केवल उपहास उड़ाते रहते हैं कि आप हमसे चर्चा के भी लायक नहीं. लेकिन केवल चर्चा ही सब से बड़ी बात नहीं होती.

इसीलिए मैंने शुरुवात में इन वामियों की प्रात:स्मरणीय विभूतियों की बात की थी. आज ये वामी वही बात देख रहे हैं कि ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारों से देश सुलग उठा है. और ये नारों के समर्थन में ये खुलकर बाहर आए तो जनमत यह भी बन गया कि देशद्रोही का साथी भी कम देशद्रोही नहीं होता.

किसी को यह बनाना जरूरी नहीं पड़ा, और मीडिया इनके ताबे में हो कर भी यह इस जनमत को बदल न सके. जितना भी इन्होने देशद्रोह या देशद्रोहियों का समर्थन किया, इनके भी चरित्र खुलने शुरू हुए.

आज इन्हें डर एक ही बात का है कि वक़्त के पहले ही इनका प्लान फूटा.

वक़्त?

हाँ, वो घड़ी जब भारत के पास इनके हमले से खुद को संभालने का वक़्त न बचा रहे. क्या आप तैयार भी हैं ऐसे वक़्त के लिए?

खैर, बात इनके डर की थी. इन्हें डर है पिटने का और इसीलिए वैचारिक युद्ध की बातों में उलझाए रखना चाहते हैं ताकि मूल बात साइड लाइन हो जाये.

यह गलती मत करिएगा और इन्हें भी याद कराइएगा कि लेनिन, माओ, चे, कास्ट्रो की क्रांतिया हिंसक ही थी. याद दिलाने का तरीका आप पर निर्भर होगा.

और हाँ, क्या आप ने कभी देखा है उन्हें मुसलमानों को या इसाइयों को कुछ कहते हुए? क्या कहा, कुत्ता मालिक पर नहीं भौंकता?

चलिये, आप को एक बात बताऊँ, चलते चलते…

1400 वर्षों में इस्लाम ने 270 मिलियन जानें लीं. और 100 वर्ष भी पूरे नहीं हुए तो कम्यूनिज़्म 95 मिलियन जाने लील गया है. एक मिलियन = 10,00,000 (दस लाख).

और हाँ, यह मत कहिएगा कि ‘इंडिया में रखा ही क्या है?’ हजारों सालों से आज तक लगातार हमलावर यूं ही टाइम पास के लिए नहीं आ रहे थे.

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