यार पिता और सुनाओ! कैसे हो?

ma jivan shaifaly with father Late Arvind Topiwala
Ma Jivan Shaifaly with father Late Arvind Topiwala

पिता को लिखे ख़त में
न चाहते हुए भी मैंने…
पितावश …सम्बोधित किया था
‘प्रिय पिता’
पिता हमेशा से ही जटिल बने रहते हैं
मेरे शब्दों में
जैसे भावनात्मक चक्रव्यूह
में होते हैं
जब मेहमान के आधी रात आगमन पर
माँ असमंजस में पड़ जाती है
कि दाल में नमक बढ़ाऊं कि पानी
वे जटिल बने रहते हैं
उतने ही
कि मैं नहीं पूछ पाती उनसे
लम्बे अंतराल पर मिलते ही
….”यार पिता और सुनाओ! कैसे हो?”…
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जैसे माँ की छातियों से
चिपका रहता है वात्सल्य
पिता संग परछाईं सा लगा रहता है
पितापना
आजकल… पिता तनकर
नहीं खड़े होते
बस स्मृतियों के कोने से
लुढ़कते चले आते हैं
ऊन के गोले की तरह बिना बताये
और उनके पीछे -पीछे घिसटती चली आती है
एक पूरी सर्द उम्र …..
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मेरे आकार लेते व्यक्तित्व में
पिता डेरा डाले रहते हैं
अधिकार सहित
जैसे पुश्तैनी मक़ान की
एकलौती दीवार घड़ी
भाँय भाँय वाले सन्नाटे के साथ
परिधि की सीमा में
करती रहती है दो दो हाथ अकेले
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पिता को चढ़ गया था एक बार मीठा पान
उन्हें बेसलीक़ा लगती थीं
ठट्ठाकर हंसने वाली लड़कियां
ये जानते हुए भी
मुझे कई बार पड़ते हैं बेतहाशा हंसी के दौरे
दुनिया को कई दफा मैंने
अस्सी घाट की सीढ़ियों पर बैठ
उड़ाया है बैक टु बैक क्लासिक रेगुलर में
यार पिता ! ये बताओ
मध्यम वर्गीय लड़कियां क्यों नहीं कर पाती
प्रेयस को टूटकर प्यार
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माँ देखो तुम भौंचक्की मत हो जाना
मेरी इस ढीठ स्वीकारोक्ति से
कि तुलनात्मक रूप से मुझे
पिता की बेटी कहलाना अधिक पसंद है
दोष तुम्हारे उस ताने का भी उतना ही है
‘ कि बिलकुल अपने बाप पर गयी है’
——————
अचानक कुछ भी नहीं होता
जैसे तय होता है
बच्चे का रोना सुनकर
माँ को जागना होता है
पहले
जैसे पहलौठी का बच्चा
बाप पर थोड़ा ज़्यादा पड़ता है
और बुढ़ापे में
उम्र कराहती है घुटनों से
संपत्ति के बंटवारे के बाद
जैसे मान लिया जाता है
पिता ऊंचा सुनेंगे
अचानक कुछ भी नहीं होता
तय होता है सब पहले से ….
माँ से मिलने होते हैं
सांप कि केंचुल से उतरते
महीने के वो पांच दिन
जो आप नहीं दे सकते
पिता मुआफ़ करना कि
मुझमें बची हुयी है थोड़ी माँ

– मृगतृष्णा

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