पहला पत्थर वही मारे जो पापी न हो

0
48

पिछले महीने की 8 तारीख रात आठ बजे नरेंद्र मोदी जी ने ईमानदारी का बिगुल क्या फूंका, देश में ईमानदारी और पारदर्शिता के प्रहरियों की एक बड़ी जमात पैदा हो गई. कोई लिख रहा है, मैंने पहले ही कहा था बैंककर्मियों को इतनी जल्दी सैल्यूट मत ठोको. एक दूसरा लिख्र रहा है, भ्रष्टाचारी बैंककर्मियों ने मोदी जी के इस अभियान की हवा निकाल दी. कोई कह रहा है कि 8 तारीख के बाद के सारे नए पाप के जिम्मेदार बैंक वाले हैं.

बैंक इंडस्ट्री में इस समय दस लाख से अधिक कर्मचारी हैं. बमुश्किल 50 से 100 बैंक वालों पर भ्रष्टाचार के आरोप अब तक साबित हुए हैं. आगे ये आंकड़े बढ़ सकते हैं इसलिये इसे बढ़ा कर 200 कर लीजिये और प्रतिशत निकालिये कि दस लाख से अधिक बैंक कर्मचारियों में कितने भ्रष्ट साबित हुए हैं?

अरे, जिस देश में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सुप्रीम कोर्ट में झूठा हलफनामा डालते हों, जहाँ कोयले की कालिख में बड़े-बड़े लोग पुते हों, जहाँ के अन्तर्राष्ट्रीय सुविधाओं वाले अस्पतालों में मरे हुए व्यक्ति का तीन दिन इलाज चलता हो, जहाँ बीएसएफ वालों की मिलीभगत ने न जाने कितनी गायें बांग्लादेश के कत्लखानों में पहुंचा दी हो, जिस देश में सीमा सुरक्षा बल और भ्रष्ट अधिकारियों की मेहरबानी से साढ़े पांच करोड़ से अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियें पल रहे हो, जहाँ कस्टम अधिकारियों के भ्रष्टाचार के कारण मुंबई में सीरियल ब्लास्ट हुए हों, जहाँ की संसद और विधानसभायें दागियों, बलात्कारियों, भ्रष्टाचारियों और हत्यारों से सुसज्जित रही हों वहां किसी विभाग के बमुश्किल 0.02% कर्मचारियों के पाप को तुमने दस लाख से अधिक बैंक कर्मचारियों के ऊपर डाल दिया.

जिस दिन इस देश के संसद या किसी भी विभाग में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का प्रतिशत 0.02% के स्तर पर आ गया उस दिन रामराज्य हासिल करने से हम बस दो कदम ही पीछे रहेंगे.

बकवास करने से पहले तुमको बैंक और उसके बारे में कुछ पता भी है? अगर कुछ पता होता तो जानते कि सरकारी या अर्धसरकारी जितनी भी संस्थायें हैं उनमें बैंक अकेला है जो टेक्नोलॉजी का सबसे अधिक इस्तेमाल करता है और प्रायः बैंक की हर शाखा में CCTV लगा है इसलिये 8 नवंबर के बाद जिसने भी नये पाप किये हैं, उनमें से कोई भी बचने वाला नहीं है.

सरकारी या अर्धसरकारी जितनी भी संस्थायें हैं उनमें सबसे अधिक पारदर्शिता अगर कहीं है तो बैंक में है इसलिये किसी ने कोई भी पाप किया हो तो उसे सजा मिलेगी और ये सजा सरकार से पहले खुद बैंक देगी.

तुम दस लाख बैंक कर्मचारियों को पापी घोषित कर रहे हो, इसलिये बैंक वालों के बारे में कुछ बातें तुमको जरूर जाननी चाहिए ताकि तुमको एहसास हो कि हम किन परिस्थितियों में काम करते हैं.

जिस समय मोदी जी ने नोटबदली की घोषणा की उस दौरान मैं डेंगू बुखार से पीड़ित था और अपोलो में एडमिट था. डॉक्टर ने प्लेटलेट और WBC कम होने के चलते मुझे पन्द्रह दिन आराम करने को कहा.

मेरी शाखा में मेरे नीचे जो अधिकारी हैं उनमें दो पी.ओ. हैं जिनकी उम्र भी कम है और बैंकिंग करिअर में अनुभव भी, इनमें एक लड़की है. तीसरे अधिकारी रिटायर होने की कगार पर हैं पर मेरी अनुपस्थिति में इन तीनों ने और बाकी स्टाफ ने बेहतरीन तरीके से ब्रांच चलाया.

हर दिन शायद 800 से 1100 की औसतन भीड़ जुटती थी. न ऑफिस आने का समय निश्चित था और न वापस घर जाने का. उस महिला अधिकारी को घर लौटते हुए रात के दस बजते थे. काम के अत्यधिक दबाब में कई बार तो दिन में खाने का भी अवसर नहीं मिलता था.

भीड़ बढ़ती जा रही थी और स्थिति संभालनी मुश्किल इसलिये मुझे किसी दूसरे डॉक्टर से फिटनेस सर्टिफिकेट लेकर चार दिन बाद ही कम प्लेटलेट और WBC नार्मल रेंज से काफी नीचे होते हुए भी ऑफिस ज्वाइन करना पड़ा और मैं उसी हालत में बिना छुट्टी आज तक लगातार काम कर रहा हूँ और मोदी जी के इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ.

ऐसा नहीं है कि ये अकेले मेरी या मेरे ब्रांच की कहानी है. सारे भारत वर्ष में बैंक वाले ऐसे ही त्याग के साथ कष्ट सहते हुए इस राष्ट्ररक्षा यज्ञ में अपनी आहुति दे रहें हैं. मेरे कई मित्र हैं जो छठ के अवसर में छुट्टी पर घर गये हुए थे पर जैसे ही नोटबंदी अभियान शुरू होने की उन्हें सूचना मिली उन्होंने खुद से ही अपनी छुट्टी खत्म कर वापस बैंक ज्वाइन कर लिया ताकि जनता को दिक्कत न हो.

हमारे कई रिटायर कर्मचारी आकर सारा दिन बिना किसी वेतन काम करते थे. कुछ के घर में परिवार वाले बीमार हुए तब भी उन्होंने छुट्टी नहीं ली, कुछ महिलायें अपने दूध पीते बच्चे को छोड़कर रात के दस-दस बजे तक काम करती थी, कुछ बीमारी की हालत में भी काम कर रहे थे तो कईयों को उनकी अजीजों के विवाह-समारोह में भी जाने का अवसर नहीं मिला. इस बीच हमने अपनी कई छुट्टियाँ भी कुर्बान की और कुर्बानियों के ऐसे उदाहरण हजारों में होंगे.

मुझे एक बैंक कर्मचारी होने के नाते गर्व है कि मैंने या मेरे साथियों ने काम के अचानक कई गुना बड़े बोझ और तमाम दूसरी परेशनियों के बाबजूद एक बार भी इस अभियान की निंदा नहीं की बल्कि मोदी जी के इस स्वच्छ भारत अभियान में हर तरह से अपना सहयोग दिया.

बैंकों में बहुत कम शाखायें ऐसी हैं जहाँ सिक्यूरिटी गार्ड दिये जाते हैं, इसलिये हमारी सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं था. हमने काउंटर पर आक्रोशित कस्टमर की गालियाँ सुनी, पब्लिक का गुस्सा झेला, गुंडों, नेताओं और दबंगों की धमकियाँ झेली पर अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे.

पाप और भ्रष्टाचार देश की उन्नति में सबसे अधिक बाधक है, इसलिये जिसने भी लोभ या लालच के चलते इस पवित्र अभियान को खराब करने की कोशिश की है उसे बेशक सूली पर चढ़ा दीजिये पर भगवान के लिये उन चंद लोगों के पाप को दस लाख बैंक कर्मचारियों से मत जोड़िये.

आपकी ईमानदारी भले 8 तारीख के बाद जगी हो और आप भ्रष्टाचार के विरुद्ध नए पहरुआ बने हों पर देश के लिये ईमानदारी से काम करने का जज्बा हमसे बहुत पहले से है.

जैसे कुछ बीएसएफ वालों के कुकृत्यों के चलते पूरी बीएसएफ को करप्ट नहीं कहा जा सकता, जैसे कुछ कस्टम वालों के भ्रष्ट होने से वो पूरा विभाग भ्रष्ट नही हो जाता, जैसे कुछ डॉक्टरों के गलत काम करने से पूरी डॉक्टर बिरादरी का सम्मान नहीं कम हो जाता उसी तरह कुछ बैंक वालों के गलत काम करने से पूरी बैंकिंग इंडस्ट्री करप्ट नही हो जाती.

यहाँ ईमानदारी में हरिश्चन्द्र बन रहे लोगों में ऐसे भी होंगे जिन्होंने इस बीच अपने पाप को उजला करने के लिये किसी बैंकर मित्र की मिन्नतें की होगी. खैर जीसस ने कहा था, पहला पत्थर वही मारे जो पापी न हो…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY