बलूचिस्तान की घर वापसी से दिक्कत है इन्हें

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balochistan and modi making india

शायद आपने बच्चों को गोद लेने सम्बन्धी प्रचार कभी, कहीं देखे होंगे. अनाथ बच्चों को गोद लेने वाले कभी सामान्य लोग नहीं होते. ऐसे लोगों से सचमुच कम ही लोग मिले होते हैं. अगर ऐसे लोगों को ढूंढने निकलेंगे तो एक अजीब सी चीज़ जो सबसे पहले दिखेगी वो ये होगी कि अमीर या गरीब होने से इन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

सुष्मिता सेन को अमीर माना जा सकता है, उनके पास भी कुछ बच्चियां हैं. अख़बारों में कई गरीब लोगों की खबर भी आपने पढ़ी होगी. उनके अपने रहने खाने का कोई पुख्ता इंतज़ाम ना होने पर भी अस्पताल में छोड़ दिए बच्चे या बच्ची को वो अपनी ममता की छाँव में समेट लेते हैं.

अगर लगता हो कि जिनके पास बच्चे नहीं होते वो लोग बच्चे गोद लेते हैं तो ऐसा भी नहीं है. दोबारा सुष्मिता सेन को देखिये तो उनके पास एक बच्ची तो पहले से थी, फिर दूसरी भी गोद ली. सलमान खान की एक बहन का टीवी पर दिखा रहे होते थे, उनके पिता के घर में भी तीन बच्चे थे, विदेशी एंजेलिना जॉली और ब्रैड पिट का भी ऐसा ही है. जिन गरीब दम्पतियों का कभी अख़बार में पढ़ा होगा उनके भी बच्चे होते हैं फिर भी वो किसी को अपने घर ले आते हैं.

तो कुल मिलकर ये मामला इस बात का नहीं होता कि आपका बैंक बैलेंस, आपका घर कितना बड़ा है. ये मामला है कि आपका दिल कितना बड़ा है.

अब याद कीजिये हरियाणा चुनाव के समय का फ़र्ज़ी राष्ट्रवादियों का शोर. ये वही लोग थे जो कहते थे मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में आना सिर्फ देश की शांति के लिए ही नहीं बल्कि पूरे आस पास के देशों का भी अमन चैन बिगाड़ देगा. ये एक के बदले दस मारो, सर काट लाओ, जैसे बयान दे रहे थे ! इन्होने, कहाँ है 56 इंच, जैसे सवाल कर के युद्धोन्माद भड़काने की पूरी कोशिश की. मरता कौन इस लड़ाई में ? गरीब सैनिक मारे जाते. जिन सैनिकों में से कोई एक भी इन बुद्धिजीवियों का दूर दराज का रिश्तेदार भी नहीं है.

बात चीत शुरू होने का जरा सा जिक्र भी चल पड़े तो इनके पेट में दर्द शुरू हो जायेगा. इन्हें sovereignty of nations की भी याद आने लगती है. राष्ट्र की संप्रभुता इन्हें कोरिया की दिवार गिरते समय भी देखनी चाहिए थी. बहुत बुरा हुआ तो क्या होगा ? सारा पाकिस्तान शायद हमारे साथ ना आना चाहे ! इनके जैसे ही कुछ अलगाववादी, कुछ छद्म बुद्धिजीवी उधर भी होंगे. वो नहीं आने देंगे सबको, यही ना ?

तो हम कम से कम बलूचिस्तान को तो अपने साथ ले ही सकते हैं. रावी, चेनाब जैसी एक दो नदियां फिर से भारत में बहें इसका सपना किस भारतवासी ने नहीं देखा. समस्या ये है कि अंग्रेज़ अपने कुछ गुलाम यहीं छोड़ गए थे. फिरंगी मानसिकता वाले ये भूरे साहिब सप्त सिंधु को दोबारा सप्त सिंधु नहीं होने देना चाहते. इन्हें मोदी के पाकिस्तान जाने से शिकायत है. 120 लोगों को वीसा ऑन अराईवल मिलने से समस्या है. बलूचिस्तान नाम के बच्चे के आने की आहट से दिक्कत हो रही है इन्हें. घरों के बीच की ये दीवारें ये अलगाव पसंद है इन्हें !

बाकि जब सब कहते हैं कि इन्हें किसी की “घर-वापसी” से शिकायत है तो जरूर सही ही कहते होंगे.

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