टोपी शुक्ला : यह उपन्यास अश्लील है, जीवन की तरह!

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टोपी शुक्ला

भूमिका- मुझे यह उपन्यास लिख कर कोई ख़ास खुशी नहीं हुई. क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है. परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूं और मेरे ही जैसे और बहुत से लोग भी हैं. हम लोग कहीं न कहीं किसी न किसी अवसर पर कम्प्रोमाइज़ कर लेते हैं. और इसीलिए हम लोग जी रहे हैं. टोपी कोई देवता या पैग़म्बर नहीं था. किंतु उसने कम्प्रोमाइज़ नहीं किया और इसीलिए आत्महत्या कर ली . परन्तु आधा गाँव की ही तरह यह किसी एक आदमी या कई आदमियों की कहानी नहीं है. यह कहानी भी समय की है. इस कहानी का हीरो भी समय है. समय के सिवा कोई इस लायक नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाय.
आधा गाँव में बेशुमार गालियाँ थीं. मौलाना टोपी शुक्ला में एक भी गाली नहीं है. परन्तु शायद यह पूरा उपन्यास एक गंदी गाली है. और मैं यह गाली डंके की चोट बक रहा हूँ. यह उपन्यास अश्लील है…… जीवन की तरह.
– राही मासूम रज़ा

जासूसी उपन्यास पढ़ने वाले या यूं भी सिर्फ़ उपन्यास पढ़ने वाले को उपन्यास का यह अंत, कि कहानी का हीरो टोपी शुक्ला आख़िर में आत्महत्या कर लेता है, शायद बिलकुल पसंद नहीं आएगा.

लेकिन लेखक ने भूमिका की पहली ही पंक्ति में यह बात उजागर कर दी है तो ज़रूर कोई ख़ास बात होगी. उपन्यास के अंत में मालूम पड़ने वाली बातों को पाठक सामान्यतः रोमांच के रुप में लेता है. कहानी के ताने-बने में पाठक अपनी संभावनाएँ जोड़ने लगता है‌ और कई बार सही निकलने पर खुश भी हो जाता है‌.

लेकिन यहाँ जब पाठक को नायक का अंत पता है‌ तो उपन्यास पढ़ते समय उसकी मनःस्थिति बिलकुल विपरीत होती है‌. अंत को दिमाग में रखकर वह कहानी की संकरी और चौड़ी गलियों में घूमता है‌. यहाँ पाठक की अपनी कल्पना शक्ति के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं. और लेखक अपने सबसे पहले प्रयास में सफल हो जाता है‌ कि कहानियाँ सिर्फ़ कल्पना लोक से नहीं उतरती वह कभी-कभी(और शायद अकसर) यथार्थ की ज़मीन पर रेंगते हुए मिलती है‌ जिसे लेखक सहारा देकर खड़ा करता है‌ और पाठक उसे संभाले हुए आगे बढ़ते हैं.

लेखक पाठक को बौद्धिक स्तर पर लाकर खड़ा करने में सफल हो जाता है जहां उसे कहानी के नायक की आत्महत्या के पीछे के मूल कारण, परिस्थितियों, परिस्थितियों के साथ जूझने की नायक की क्षमता और उन्हीं परिस्थितियों में पाठक की खुद की स्थिति पर विचार करने के लिए पूरी-पूरी जगह मिल जाती है.

और यह बात भूमिका की दूसरी पंक्ति में स्पष्ट है कि यह टोपी मैं भी हूँ और मेरे ही जैसे और बहुत से लोग भी है

उपन्यास की कुछ पंक्तियाँ—-

इश्क का तअल्लुक दिलों से होता है और शादी का तनख़्वाहों से. जैसी तनख्वाह होगी वैसी ही बीवी मिलेगी.

अरे तो क्या यह लैला-मजनूं और हीर-रांझा की कहानियाँ केवल प्रोपेगेण्डा हैं?

यह कहानियाँ मिडिल क्लास के पैदा होने से पहले की है.

लेखक ने भूमिका में जिस कम्प्रोमाइज़ की बात की है उसकी उपन्यास में जगह-जगह पुष्टि भी की है कम्प्रोमाइज़ जैसा शब्द सामान्यतः मिडिल क्लास लोगों के जीवन में ही इश्तिहार की तरह ही चिपका रहता है. क्योंकि मिडिल क्लास आदमी कहने को तो जीवन और उसकी हर परिस्थिति के साथ (जिसमें उसकी अपनी पंगुता अधिक होती है.) कम्प्रोमाइज़ करता नजर आता है. लेकिन अंदर ही अंदर वह उस रेंगती हुई कहानी की तरह होता है जिसे कोई लेखक और पाठक नहीं मिल पाता और वह अपने जीवन की झूठी कहानियों को अपने चेहरे पर मुखौटों की तरह चढ़ा कर घूमता रहता है. बकौल लेखक- ….. और इसलिए हम लोग जी रहे हैं.

समय के सिवा कोई इस लायक नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाय. इस अद्भुत पंक्ति में जीवन का पूरा दर्शन, मनोविज्ञान और सत्य छुपा है. कवि, कहानीकार, उपन्यासकार या किसी भी तरह का, कैसा भी लेखक जब कलम उठाता है तो उसकी कलम से लिखा जाने वाला एक-एक अक्षर समय को पिघलाकर लिखा गया होता है.

और वो समय कोई आसानी से पिघलने वाली धातु नहीं होती बल्कि इस्पात से बनी हुई पटरियां होती हैं जिस पर से जब घटनाओं की रेल अपनी चरम गति से गुज़रती है तो उसके घर्षण की गर्मी से समय की दो पटरियों के बीच की जगह भर जाती है. फिर समय आज का या कल का नहीं होता वो सिर्फ़ समय होता है जो, किसी भी काल की बात करें, अपने पूरे वर्चस्व के साथ मज़बूती से खड़ा होता है. फिर इंसान या तो घटनाओं की रेल के नीचे कुचल कर कीड़े-मकोड़ों की तरह ख़त्म हो जाता है या फिर ख़ुद को इस्पात की उन पटरियों में ढाल लेता है जिन पर से घटनाएँ चाहे जिस गति से गुज़र जाएँ उनका अस्तित्व ख़त्म नहीं होता.

यह पूरा उपन्यास एक गंदी गाली है और मैं यह गाली डंके की चोट बक रहा हूँ.. जब तथाकथित धर्म इंसानियत से बड़ा हो जाता है, जब आदमी, आदमी नहीं होता बल्कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हो जाता है, वहां सिर्फ़ यह उपन्यास ही नहीं, इंसान खुद एक गंदी गाली हो जाता है. जो, जब आम जीवन में बकी जाने लगती है तो, भाषा का एक हिस्सा हो जाती है, जिस पर कोई बुरा नहीं मानता फिर चाहे वो विभाजन के पहले बकी गई हो, विभाजन के बाद बकी गई हो या स्वतंत्रता के 70वें साल के बाद भी उतने ही गर्व से बकी जाती हो.

यहां इंसान कोई नुकसान नहीं उठा रहा. नुकसान उठा रहा है समय, और वह हर युग में नुकसान उठाएगा. वो चाहे कितने ही रुप, कितने ही चरित्र बदल कर कहानियों के नायक के रुप में आता रहे लेकिन उसको बकी गई गाली की प्रतिक्रिया को छुपा नहीं पाएगा. उसके चेहरे से, उसकी चाल से, उसकी बातों से बल्कि समय के चेहरे की हर लकीर पर उसका क्रोध उसकी निराशा, उसकी विवशता प्रकट होती रहेगी. शायद यही कारण है कि चाहे कहानी किसी भी युग की हो, पाठक हर युग में समय के चेहरे पर अपना मुखौटा लगाकर खड़े होने में सफल हो जाता है.

हर कहानीकार की तरह, इस उपन्यास में डॉ. राही मासूम रज़ा के भी अपने जीवन के अनुभवों की खिड़कियाँ खुली हुई मिलती है, जहां से पाठक आसानी से झांक सकता है. लेकिन खिड़कियाँ खुली होने के बावजूद लेखक दरवाज़ा हमेशा बंद रखता है. खिड़कियों से आप सीमित दृश्य देख पाते हैं और यदि दरवाजे खोल कर देखना हो तो पाठक को लेखक की लेखन शैली के साथ एकाकार होना पड़ता है, उसकी हर रचना के चरित्रों से मिलना पड़ता है, उनसे दोस्ती करना होती है.

और यदि इस उपन्यास के नायक टोपी शुक्ला से दोस्ती करना है तो उसके लिए आपको उपन्यास पढ़ना होगा. हो सकता है आप उसे आत्महत्या से बचा सकें. उपन्यास के बारे में बहुत कुछ लिखने के बाद भी उसके नायक टोपी शुक्ला के बारे में कहना अभी बाकी है. क्योंकि डॉ. राही मासूम रज़ा द्वारा लिखे गए इस उपन्यास की भूमिका की आखिरी पंक्ति के बारे में कहना अभी बाकी है.

और वह हमेशा बाकी रहेगा क्योंकि उसे कहा नहीं जा सकता उसे तो जीना होता है, लेखक के साथ, उसके उपन्यास के साथ, उपन्यास के चरित्रों के साथ, और यदि नहीं तो कभी अकेले में इस उपन्यास को पढ़कर देखिएगा क्योंकि यह उपन्यास अश्लील है…… जीवन की तरह.

– माँ जीवन शैफाली

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