कई मुखौटे एक चेहरा : ‘मुनव्वर और कुत्ते में नहीं है फ़र्क़ अब कोई’

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शहीदों में नाम लिखवाने के लिये नाख़ून कटा कर हाथ कटवाने का ड्रामा करना सबसे प्रचलित और आसान तरीक़ा है. इसका इस्तेमाल भारत में बहुतायत से होता रहा है. साहित्य अकादमी का नवीनतम त्यागपत्र इसी श्रेणी का सबसे ताज़ा उदाहरण है.

जी, मैं मुनव्वर राना साहब की बात कर रहा हूँ. आइये उनके बारे में उनके किये-कहे-लिखे हुए से कुछ जानें. मेरा उनका लगभग 25-30 बरस का साथ है. वो मेरे बड़े हैं और मुझे इस लेख में उनकी छान-फटक करनी है, इसलिए मैंने उनकी इजाज़त ली है. सफ़ेद-सियाह सब उनकी इजाज़त के सर, मगर हर लफ़्ज़ सच्चा है.

मुनव्वर मूलतः शायर हैं मगर गद्य भी खूब लिखते हैं. पहले कलकत्ता के शायर एज़ाज़ अफ़ज़ल के शागिर्द थे. एज़ाज़ साहब अच्छे शायर थे मगर मुशायरे की चमचमाती, ख़ुराफ़ाती दुनिया से दूर थे. परिणामतः मुनव्वर को वहां ले जाने की पालकी नहीं बन सकते थे.

मुनव्वर ने पलटी मारी और मुशायरे के शायर वाली आसी को दूसरा उस्ताद चुना. इनके दूसरे उस्ताद वाली आसी साहब की अमीनाबाद-लखनऊ में किताबों की दुकान थी जिस पर ये जब लखनऊ में होते थे तो बैठा करते थे.

वाली आसी साहब की दुकान के सामने ही सड़क पार एक और किताबों की दुकान दानिश-महल (बुद्धिमत्ता का स्थान) है. इसकी जोड़ में वाली आसी साहब की दुकान को को उर्दू वाले ग़ीबत-महल (पीठ पीछे बुराई करने का स्थान, परनिंदा-स्थल) कहते थे.

उनकी दुकान मकतबा-ए-दीनो-अदब का ये नामकरण बिलकुल सच्चा था. सारे दिन लखनऊ की उर्दू दुनिया में चलने वाली अफ़वाहों जन्म यहीं से होता था. फब्तियां, छिछोरे जुमले, खिंचाई, होहल्ले का ये केंद्र इन्हीं उस्ताद-शागिर्द की छात्र-छाया में चलता था.

एक समय में मुशायरों की दुनिया में एक चर्चा बड़े ज़ोर-शोर से चली थी कि लखनऊ के एक अच्छे शायर मेराज फ़ैज़ाबादी सलमान रुश्दी के रिश्तेदार हैं. उन्हें मुशायरों से बाहर रखने के लिये इस अफवाह का जन्म इसी ग़ीबत-महल में हुआ था.

दोनों घोर साम्प्रदायिकता से भरे हुए और इस हद तक कि वाली आसी साहब ने अपने एक दूसरे हिंदू शागिर्द भारत भूषण पंत जो अच्छे शायर हैं, को कभी अदब, मुशायरों की दुनिया में दाख़िल नहीं किया.

शुरू से सुल्हे-कुल और क़ौमी-यकजहती (सांप्रदायिक एकता) का ड्रामा करते रहते थे मगर तब सांप्रदायिक एकता का आधार ही यही था कि आप बाबरी मस्जिद कमेटी के दांव-पेच, नारेबाज़ी आँख मूंद कर चुपचाप सहते जायें.

बाबरी ढांचे की बातें, उसके लिये की जाने वाली योजनाएँ तो साम्प्रदायिक एकता का आधार ही थीं. आपको बाबरी ढांचे की दीवार बनना स्वीकार न हो तो ये गैंग आपको उर्दू की नींव में ज़िंदा दबाने को तत्पर रहता था.

इन्हीं ख़ुराफ़ातों के सीमाहीन हो जाने पर प्रतिक्रिया हुई और बाबरी ढांचा ढहा दिया गया. अब साहिबो सबको सांप सूंघ गया. एक्शन कमेटी के लोग सन्नाटे में आ गये. विषैले-वाचाल लोगों का शहर में निकलना रुक गया.

ख़ुद मुसलमान पूछने लगे कि आप सबने इतने भड़काऊ बयान दिये. बकवादी तलवारें भांजीं, काग़ज़ी तोपें चलायीं मगर जब कुछ कर दिखाने का नंबर आया तो सब नदारद हो गए? कोई धरना, प्रदर्शन, आमरण अनशन तक नहीं किया?

अंततः ये इस अवसाद से उबरे और लेखों की झड़ी लगा दी. ‘सफ़ेद जंगली कबूतर’ इनके 24 निबंधों का संग्रह है. इन लेखों का विषय दुनिया जहान है मगर हर लेख में बाबरी ढांचा कंधे से कंधा लगाये शरीक होता है.

इनकी ग़ज़ल के फ़ॉर्मेट में कही गयी एक लम्बी नज़्म की किताब मुहाजिरनामा है. मुहाजिरनामा में भारत को छोड़ कर पाकिस्तान चले गए लोगों का दर्द बयान किया गया है.

मैं सदैव आश्चर्य करता रहा हूँ कि सांप्रदायिक एकता चाहने वाले किसी भारतीय शायर को मातृभूमि को त्याग कर जाने वालों के दर्द में कैसे दिलचस्पी हो सकती है?

मुहाजिरनामा की भूमिका से कुछ वाक्य पेश हैं –

मैं हिन्दुस्तान की तक़सीम को ज़मीन का बंटवारा बिलकुल नहीं समझता. मैं इसे दुनिया की एक ज़हीन क़ौम और अज़ीम हिंदुस्तान से यहूदियों और ईसाइयों का ख़ौफ़नाक इंतक़ाम समझता हूँ. अगर हिंदुस्तान की तक़सीम न हुई होती तो रूस और अमरीका, ईराक़ और अफ़ग़ानिस्तान को तबाह नहीं कर सकते थे. अगर हिंदुस्तान की तक़सीम नहीं हुई होती तो अरब के तेल ठिकानों पर अमरीका की इजारेदारी नहीं हुई होती.’

ऐसी आहें भरते शब्द? ऐसी सिसकियाँ भरते वाक्य? ऐसी हूहूकारी वाचाली करते हुए इन्हें कभी यह नहीं सुझा कि इसका ज़िम्मेदार कौन है? किसने भारत माता के दोनों हाथ काट डाले?

इनकी नज़र में सदियों से शिक्षा से दूर मुस्लिम समाज ज़हीन क़ौम है, जिससे यहूदी और ईसाई इंतक़ाम लेना चाहते हैं? इनके अनुसार भारत का विभाजन न हुआ होता तो ईराक़, अफ़ग़ानिस्तान को तबाही से बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी होती???

इन्हें अरब के तेल ठिकानों पर अमरीकी प्रभुत्व दिखाई पड़ता है. इन्हें सांप्रदायिक धर्मान्धता के चलते ये तक नहीं सूझता कि अरबी देशों में तेल निकालने में अरबों की क्या भूमिका है.

परले सिरे के अय्याश अरब नाकारा, निकम्मे हैं जिनकी हर व्यवस्था विदेशियों के हाथ में है मगर धर्मान्धता आँखों पर पट्टी बांध देती है.

इनकी लेखनी ने कभी हिंगुलाज भवानी के खंडहर होते जा रहे मंदिर पर दुःख प्रकट नहीं किया. ननकाना साहब के गुरूद्वारे और ऐसी ही हज़ारों स्मृतियों पर इनकी क़लम कभी नहीं रोई.

उसका कारण ही यह था कि एक कवि का भावुक मन होते हुए भी उनके बचपन से सिखाये-पढ़ाये गए घोर सांप्रदायिक संस्कार उनके भावुक मन पर हावी हो जाते हैं. उसकी आँख हमेशा मस्जिद, मुस्लिम मुहल्लों, बचकानी और बेतुकी मुस्लिम मांगों को सहानुभूति से देखती है.

वो इन सारी समस्याओं का मूल कारण मुस्लिम नेतृत्व को नहीं समझते और दुनिया भर को इसके लिये ज़िम्मेदार ठहराते हैं. इस किताब की बानगी के लिए दो शेर हाज़िर हैं –

बहुत रोई थी हमको याद करके बाबरी मस्जिद
उसे फ़िरक़ापरस्तों में अकेला छोड़ आये हैं.

गले में हाथ डाले घूमते थे मुख़्तलिफ़ मज़हब
वो काशी छोड़ आये हैं वो मथुरा छोड़ आये हैं.

यहाँ इनसे पूछा जाना चाहिये कि काशी और मथुरा की मस्जिद और ईदगाह तो भगवान विश्वनाथ के मंदिर और कृष्ण जन्मभूमि को तोड़ कर बलात बनायीं गयी है. ये किस तरह से क़ौमी यकजहती है?

अपनी धुन में इन आक्रमणकारियों की दुष्टताओं को महिमामंडित करते हुए इनका सांप्रदायिक एकता का मुखौटा बार बार सरक जाता रहा है मगर ये हमेशा ही चयनित साम्प्रदायिक एकता के व्यक्ति रहे हैं.

इनकी किताब ‘माँ’ की भूमिका में इनके कुछ वाक्य देखिये –

सियासत की बिसात पर दुनिया की सबसे ज़हीन क़ौम मुहरा बन कर रह गयी. ये कैसी तक़सीम थी जिसका हिस्सा आज तक नहीं लग सका. ये कैसा फ़ैसला था जिसने ताजमहल के टुकड़े कर दिये. कश्मीर के दो हिस्से हो गये. जामा मस्जिद आधी हो गयी.”

साहब जी आपके ताजमहल के टुकड़े, जामा मस्जिद आधी हो जाने से क्या तात्पर्य है? इन्हें किसने कुछ किया? इनका क्या नुकसान हुआ? बांग्ला देश, पाकिस्तान में छूटे मंदिरों, गुरुद्वारों की तरह इन्हें कब तोड़ डाला गया? ढाकेश्वरी के मंदिर का तोड़ा जाना आपकी आँखों को नहीं दिखाई देता? आपकी क़लम उस पर मौन क्यों रह जाती है.

आप शायरी में बहुत माँ-माँ करते हैं, बल्कि आप सायास अपनी पहचान माँ की शायरी को बना चुके हैं. आप भावुक और कविहृदय हैं मगर आपको भारत माता, गौ माता क्यों नहीं दिखाई देती?

आपका एक चर्चित किया गया शेर है. मुझे जब भी ये शेर याद आता है मैं सोच में डूब जाता हूँ –

ये ऐसा क़र्ज़ मैं जिसको अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूं मेरी माँ सजदे में रहती है

इसका कारण ये है कि हम सब अपने-अपने कामों के लिये बाहर निकलते हैं मगर हममें से किसी की माँ जब तक हम न लौटें सजदे में नहीं रहती, भगवन से प्रार्थना नहीं करती रहती.

इसका सीधा सा कारण ये है कि हम न तो चरस-हशीश बेचते हैं, न डकैती डालते हैं, न चोरी करते हैं, न गिरहकट हैं. आप क्या करते हैं जो आपकी माँ आपके लौटने तक सजदे में पड़ी रहती हैं? उनका मन धुक-धुक करता रहता है? आप कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ करते हैं?

आप पुरस्कार के ख़िलाफ़ शेर कहते हैं –

सियासत मुंहभराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
वो हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है.

मगर आप ऐसा कहने के बाद स्वयं भी पुरस्कार ले लेते हैं जिस पर असलम इलाहाबादी साहब ने जवाबी शेर भी कहा था –

मुनव्वर और कुत्ते में नहीं है फ़र्क़ अब कोई
हुकूमत ने इन्हें भी शाही टुकड़े से नवाज़ा है.

आपके इस सलेक्टिव विरोध को कैसे समझा जाये. आप स्वयं साम्प्रदियकता से भरे हुए हैं. भारत के वातावरण को विषाक्त करने में लगे रहे हैं.

आपकी शायरी, गद्य साम्प्रदायिकता फैलाती है और आपको अब भारत में साम्प्रदायिकता बढ़ती दिखाई दे रही है? आपके साहित्य एकेडमी से त्यागपत्र को और कैसे देखा जाये?

मेरे जैसे व्यक्ति के देखे तो भारत में पहली बार एक ऐसा व्यक्ति प्रधानमंत्री बन गया है जिसके न बनने देने के लिये इस्लामी नेतृत्व ने पूरा ज़ोर लगाया था, यहाँ-वहाँ… कहाँ-कहाँ के सारे घोड़े खोल दिए थे मगर असफलता हाथ लगी थी.

अब अभिव्यक्ति के सारे संभव मंचों पर ये खिसियाया हुआ नेतृत्व और उनके बग़ल-बच्चे कड़वे-कसैले हो गए हैं और हमलावर हैं. बिहार चुनाव के सन्दर्भ में इनके वोट के शिकारी इस आक्रोश को हवा दे रहे थे और आप मुनव्वर राना साहब जैसे घोर सांप्रदायिक सोच के लोग इनकी कठपुतली बने हुए थे/ हैं.

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